Friday, 31 January 2020

मौनी अमावस्या 2020


माना जाता है कि मौनी अमावस्या के दिन गंगा का जल अमृत बन जाता है. इसलिये माघ स्नान के लिये मौनी अमावस्या को बहुत ही खास माना गया है. इस दिन व्रती को मौन धारण करते हुए दिन भर मुनियों सा आचरण करना पड़ता है, इसी कारण यह अमावस्या मौनी अमावस्या कहलाती है. इस साल मौनी अमावस्या का यह त्यौहार 24 जनवरी को है.

ज्योतिष शास्त्र व धार्मिक दृष्टि से यह तिथि बहुत महत्वपूर्ण होती है. कुंडली के पितृदोष से मुक्ति पाने के लिये इस तिथि का विशेष महत्व होता है क्योंकि इस तिथि को तर्पण, स्नान, दान आदि के लिये बहुत ही पुण्य फलदायी माना जाता है.

इस बार की मौनी अमावस्या बहुत खास है. इस दिन ग्रहों का एक विशेष संयोग बन रहा है. मौनी अमावस्या के पर्व पर मकर राशि में सूर्य, चंद्रमा और बुध की युति होगी जो विशेष फलदायी होगी.


इसके अलावा इस दिन ही शनि अपनी मकर राशि में भी प्रवेश करेंगे. इसके साथ ही, गुरु और केतु की युति धनु राशि में होगी.

इस मौनी अमावस्या पर तीर्थ स्थलों पर स्नान करना विशेष फलदायी हो जाएगा.

मौनी अमावस्या पर करें ये दिव्य प्रयोग

सूर्य उदय होने से पहले उठें और जल में दो बूंद गंगाजल डालकर स्नान करें तथा साफ वस्त्र पहनें.

एक साफ आसन पर बैठकर पूर्व दिशा की तरफ मुंह करें और एक तांबे के लोटे में गंगाजल भरकर रखें.
लाल चंदन या रुद्राक्ष की माला से गायत्री मंत्र का 3 माला जाप करें, इसके बाद लोटे के गंगाजल को सारे घर में छिड़क दें.
घर में कोई व्यक्ति बीमार हो तो उसके स्वस्थ होने के बाद जरूरतमंद लोगों को पितरों के नाम से भोजन जरूर कराएं.
मौनी अमावस्या सुबह के समय कच्चे दूध में काला तिल, जौ और गंगाजल मिश्री मिलाकर पीपल के पेड़ की जड़ में जरूर अर्पण करें.
जरूरतमंद लोगों को गर्म कपडे़, तिल के लड्डू , आंवला, दूध से बनी मिठाई, सफेद कपड़े, फल, सब्जियां और दवाई का दान जरूर करें.


गरुण पुराण के अनुसार मौनी अमावस्या के दौरान शारीरिक संबंध बनाना दांपत्य जीवन के लिए अच्छा नहीं होता है. मौनी अमावस्या की पूरी अवधि में ख्याल रखें कि आपके मन में यौन संबंधों को लेकर कोई विचार न आए.

मौनी अमावस्या पर पीपल की पूजा करना शुभ माना जाता है. इस दिन पीपल की पूजा करते वक्त उसे स्पर्श नहीं करना चाहिए. यदि मौनी अमावस्या शनिवार के दिन पड़ रही है तब आप पीपल का स्पर्श कर सकते हैं. इस दिन पीपल की 108 बार परिक्रमा करने से शुभ फल प्राप्त होता है.

षटतिला एकादशी तिथि व मुहूर्त/ व्रत व पूजा विधि, सोमवार, जनवरी 20, 2020,षटतिला एकादशी व्रत व पूजा विधि


एकादशी व्रत कथा व महत्व के बारे में तो सभी जानते हैं। हर मास की कृष्ण व शुक्ल पक्ष को मिलाकर दो एकादशियां आती हैं। यह भी सभी जानते हैं कि इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। माघ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को षटतिला एकादशी पड़ती है। इस दिन व्रत रखने से भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है। साथ ही आरोग्यता तथा सम्पन्नता आती है। इस दिन दान का बहुत महत्व है। तिल के दान की महत्ता है। इस महान दिवस का श्रद्धा पूर्वक व्रत रखने से कई जन्मों के पापों का नाश होता है। इस एकादशी (Ekadashi) में तिल का भी बेहद खास महत्व है. पूजा से लेकर दान करने और हवन करने तक, हर चीज़ में तिल का इस्तेमाल किया जाता है। 

जो लोग रोग इत्यादि से बहुत परेशान रहते हों उनको आज के दिन व्रत रह कर सवा किलो तिल तथा गुड़ का दान करने से स्वास्थ्य में सुधार होता है। षटतिला एकादशी के दिन व्रत करने के बाद तिलों का हवन करने के बाद रात को जागरण किया जाता है।

 षटतिला एकादशी तिथि व मुहूर्त
षटतिला एकादशी सोमवार, जनवरी 20, 2020 को

एकादशी तिथि प्रारम्भ - जनवरी 20, 2020 को 02:50 बजे
एकादशी तिथि समाप्त - जनवरी 21, 2020 को 02:05 बजे


षटतिला एकादशी व्रत व पूजा विधि
नारदपुराण के अनुसार, जातक ब्रह्म मुहूर्त में स्नान आदि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लें। इसके बाद घट स्थापना करें और उसके ऊपर भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर रखें और गंगाजल के छींटे दें। भगवान की तस्वीर या मूर्ति पर रोली और अक्षत से तिलक करें और सफेद फूल चढ़ाएं। इसके बाद घी का एक दीपक जलाएं और उनकी आरती उतारें। इसके बाद उनका भोग लगाएं। फिर ब्राह्मण को भोजन कराकर दान व दक्षिणा देते हैं। इस दिन किसी भी एक समय फलाहार किया जाता है।

 

षटतिला एकादशी व्रत में तिल का महत्‍व 


षटतिला एकादशी में तिल का विशेष महत्‍व है तिल का प्रयोग ही इस एकादशी को अन्‍य एकादशियों से पृथक करता है 
इस दिन छह तरीकों से तिल का इस्‍तेमाल किया जाता है:
1- तिल स्नान 
2- तिल का उबटन 
3- तिल का हवन 
4- तिल का तर्पण 
5- तिल का भोजन 
6- तिल का दान 

छह तरीकों से तिल के प्रयोग के कारण ही इसे षटतिला एकादशी कहा जाता है. इस व्रत रखने वालों के अलावा सभी को लोगों कुछ इस तरह छह तरीकों से तिल का इस्‍तेमाल करना चाहिए: 

तिल का पहला प्रयोग: स्‍नान के पानी में तिल का प्रयोग करें और पीले कपड़े पहनें
तिल का दूसरा प्रयोग: तिल का उबटन लगाएं
तिल का तीसरा प्रयोग: पूर्व दिशा की ओर बैठ जाएं फिर पांच मुट्ठी तिल लेकर 108 बार "ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र" का जाप करें
तिल का चौथा प्रयोग: दक्षिण दिशा की ओर खड़े होकर पितरों को तिल का तर्पण दें
तिल का पांचवां प्रयोग: एकादशी के दूसरे दिन यानी कि द्वादश को ब्राह्मणों को तिल युक्‍त फलाहारी भोजन कराना चाहिए
तिल का छठा प्रयोग: दूसरे दिन ब्राह्मणों को तिल का दान देंमान्‍यता है कि इस दिन जो जितना अधिक तिल का दान करेगा उसे स्‍वर्ग में रहने का उतना ही अवसर मिलेगा

षटतिला एकादशी के दिन पुष्य नक्षत्र में गोबर, कपास, तिल मिलाकर उनके कंडे या पिंड‍िका बनानी चाहिए. उन कंडों से 108 बार हवन करें।


आचार्य मुकेश के अनुभवों के आधार पर कुछ सुझाव:

एकादशी के व्रत की तैयारी दशमी तिथि को ही आरंभ हो जाती है। उपवास का आरंभ दशमी की रात्रि से ही आरंभ हो जाता है। इसमें दशमी तिथि को सायंकाल भोजन करने के पश्चात अच्छे से दातुन कुल्ला करना चाहिये ताकि अन्न का अंश मुंह में शेष न रहे। इसके बाद रात्रि को बिल्कुल भी भोजन न करें। अधिक बोलकर अपनी ऊर्जा को भी व्यर्थ न करें। रात्रि में ब्रह्मचर्य का पालन करें। एकादशी के दिन प्रात:काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सबसे पहले व्रत का संकल्प करें। नित्य क्रियाओं से निपटने के बाद स्नानादि कर स्वच्छ हो लें। भगवान का पूजन करें, व्रत कथा सुनें। दिन भर व्रती को बुरे कर्म करने वाले पापी, दुष्ट व्यक्तियों की संगत से बचना चाहिये। रात्रि में भजन-कीर्तन करें। जाने-अंजाने हुई गलतियों के लिये भगवान श्री हरि से क्षमा मांगे। द्वादशी के दिन प्रात:काल ब्राह्मण या किसी गरीब को भोजन करवाकर उचित दान दक्षिणा देकर फिर अपने व्रत का पारण करना चाहिये। इस विधि से किया गया उपवास बहुत ही पुण्य फलदायी होता है।


एकादशी करते हों तो ध्यान रखें कुछ बातों का :


🚫1. एकादशी के दिन सुबह दातुन या ब्रश न करें!नींबू, जामुन या आम के पत्ते लेकर चबा लें और अंगुली से कंठ साफ कर लें, वृक्ष से पत्ता तोड़ना भी ‍वर्जित है। अत: स्वयं गिरा हुआ पत्ता लेकर सेवन करें। * यदि यह संभव न हो तो पानी से बारह बार कुल्ले कर लें।

🚫2. एकादशी के दिन झाड़ू पोछा इत्यादि बिलकुल न करें! क्योंकि चींटी आदि सूक्ष्म जीवों की मृत्यु का भय रहता है।

🚫3. एकादशी के दिन तुलसीदल न तोड़ें, भगवन को भोग लगाने हेतु एक दिन पहले ही तोड़ कर रख लें।

🚫4. अगर घर में दक्षिणावर्ती शंख हो तो उसमे जल लेकर भगवान शालिग्राम को स्नान करवाएं, या पंचामृत से स्नान करवाएं!इस से सारे पाप उसी समय नष्ट हो जाते हैं तथा माता लक्ष्मी के साथ भगवान् हरि भी अति प्रशन्न होते हैं।

🚫5.एकादशी के दिन भगवान् श्री हरि को पीली जनेऊ अर्पित करें। पान के पत्ते पर एक सुपारी, लौंग, इलायची, द्रव्य, कपूर, किसमिस तुलसीदल के साथ इत्यादि अर्पित करें, साथ ही ऋतुफल भी अर्पित करें! एक तुलसीदल भगवान् पर भी चढ़ाएं पर रात्रि में उसे हटाना न भूले।

🚫6.एकादशी के दिन सुबह संकल्प लें, मन में मनोकामना करते हुए श्री हरि से व्रत में रहने का संकल्प करें!

🚫7. एकादशी के दिन रात्रि जागरण का विशेष महत्व है, कोशिश करें की इस एकादशी जरूर जागरण करें, इस से व्रत फल 100 गुणा बढ़ जाता है!

🚫8. एकादशी के दिन चावल भूल से भी न छुएं, न ही घर में चावल बनें, इस दिन चावल खाने से बेहद नकरात्मक फल प्राप्त होते हैं, भाग्य खंडित होता है! एकादशी (ग्यारस) के दिन व्रतधारी व्यक्ति को गाजर, शलजम, गोभी, पालक, इत्यादि का सेवन नहीं करना चाहिए। * केला, आम, अंगूर, बादाम, पिस्ता इत्यादि अमृत फलों का सेवन करें। * प्रत्येक वस्तु प्रभु को भोग लगाकर तथा तुलसीदल छोड़कर ग्रहण करना चाहिए।

🚫9. एकादशी के दिन कम से कम बोलें, पापी लोगों से बात न करें, जिनके मन में लालच, पाप या कोई भी अनैतिक तत्व दिखे कम से कम इस दिन उन सभी से दूर रहने का प्रयत्न करें! परनिंदा से बचें!

🚫10.श्री हरि की विशेष कृपा हेतु ॐ नमो भगवते वासुदेवाय की 11 माला सुबह और 11 माला शाम में करें, साथ ही विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ जरूर करें! एकादशी व्रत कथा कहे या सुनें।

🚫11. शाम में केले के पेड़ के नीचे एवं तुलसी में दीपक जलाना न भूले, इसे दीप-दान कहते हैं!

🚫12. माता लक्षमी के बिना विष्णु अधूरे हैं इसलिए माता की भी आरती अवश्य करें, सुबह और शाम शंखनाद एवं घंटियों की ध्वनि में ॐ जय जगदीश हरे की आरती करना न भूले!

🚫13. एकादशी के दिन केले के पेड़ की 7 परिक्रमा करने से धन में बढ़ोतरी होती है!

🚫14. व्रत पंचांग के समयानुसार ही खोलें अन्यथा लाभ की जगह नुक्सान भी हो सकता है, व्रत एवं पूजा के नियमों में करने से ज्यादा कुछ बातें जो हमे नहीं करनी चाहिए वो ही ज्यादा महत्व रखती है. अतः सावधानी से की गई पूजा सर्वश्रेष्ठ फल प्रदान करती है.

🚫15 .आज के दिन किसका त्याग करें- 

🍁मधुर स्वर के लिए गुड़ का। 
🍁दीर्घायु अथवा पुत्र-पौत्रादि की प्राप्ति के लिए तेल का। 🍁शत्रुनाशादि के लिए कड़वे तेल का। 
🍁सौभाग्य के लिए मीठे तेल का। 
🍁स्वर्ग प्राप्ति के लिए पुष्पादि भोगों का। 

प्रभु शयन के दिनों में सभी प्रकार के मांगलिक कार्य जहाँ तक हो सके न करें। पलंग पर सोना, भार्या का संग करना, झूठ बोलना, मांस, शहद और दूसरे का दिया दही-भात आदि का भोजन करना, मूली, पटोल एवं बैंगन आदि का भी त्याग कर देना चाहिए।


🚫16. दोनों ही दिन शाम में संध्या आरती कर दीपदान करें। अखंड लक्षमी प्राप्त होगी। पैसा घर में रुकेगा।

🚫17. शंख ध्वनि से भी माता लक्ष्मी के साथ भगवान् हरि भी अति प्रसन्न होते हैं। अतः पूजा के समय जरूर शंख का उपयोग करें । पूजा के पहले शुद्धिकरण मंत्र तथा आचमन करना न भूलें क्योंकि इसके बिना पूजा का फल प्राप्त नहीं हो पाता।

🚫18. तुलसी की विधिवत पूजा करके उसकी 7 
परिक्रमा करें।


षटतिला एकादशी व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार नारदजी ने भगवान श्रीविष्णु से षटतिला एकादशी कथा के बारे में पूछा. भगवान ने नारदजी से कहा, "हे नारद! मैं तुमसे सत्य घटना कहता हूं. ध्यानपूर्वक सुनो. प्राचीन काल में मृत्युलोक में एक ब्राह्मणी रहती थी. वह सदैव व्रत किया करती थी. एक समय वह एक मास तक व्रत करती रही. इससे उसका शरीर अत्यंत दुर्बल हो गया. वो ब्राह्नणी कभी अन्न दान नहीं करती थी एक दिन भगवान विष्णु खुद उस ब्राह्मणी के पास भिक्षा मांगने पहुंचे. 

वह ब्राह्मणी बोली, "महाराज किसलिए आए हो?" मैंने कहा- "मुझे भिक्षा चाहिए." इस पर उसने एक मिट्टी का ढेला मेरे भिक्षापात्र में डाल दिया. मैं उसे लेकर स्वर्ग में लौट आया. 

कुछ समय बाद ब्राह्मणी भी शरीर त्याग कर स्वर्ग में आ गई. उस ब्राह्मणी को मिट्टी का दान करने से स्वर्ग में सुंदर महल मिला, परंतु उसने अपने घर को अन्नादि सब सामग्रियों से शून्य पाया. घबरा कर वह मेरे पास आई और कहने लगी, "भगवन् मैंने अनेक व्रत आदि से आपकी पूजा की, परंतु फिर भी मेरा घर अन्नादि सब वस्तुओं से शून्य है. इसका क्या कारण है?" 

इस पर मैंने कहा, "पहले तुम अपने घर जाओ. देवस्त्रियां आएंगी तुम्हें देखने के लिए. पहले उनसे षटतिला एकादशी का पुण्य और विधि सुन लो, तब द्वार खोलना." मेरे ऐसे वचन सुनकर वह अपने घर गई. जब देवस्त्रियां आईं और द्वार खोलने को कहा तो ब्राह्मणी बोली- "आप मुझे देखने आई हैं तो षटतिला एकादशी का माहात्म्य मुझसे कहो."

उनमें से एक देवस्त्री कहने लगी, "मैं कहती हूं." जब ब्राह्मणी ने षटतिला एकादशी का माहात्म्य सुना तब द्वार खोल दिया. देवांगनाओं ने उसको देखा कि न तो वह गांधर्वी है और न आसुरी है वरन पहले जैसी मानुषी है. उस ब्राह्मणी ने उनके कथनानुसार षटतिला एकादशी का व्रत किया. इसके प्रभाव से वह सुंदर और रूपवती हो गई तथा उसका घर अन्नादि समस्त सामग्रियों से युक्त हो गया.

अत: मनुष्यों को मूर्खता त्याग कर षटतिला एकादशी का व्रत और लोभ न करके तिलादि का दान करना चाहिए. इससे दुर्भाग्य, दरिद्रता तथा अनेक प्रकार के कष्ट दूर होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है.


पारण (व्रत तोड़ने का) समय एवं नियम 

21st को, पारण (व्रत तोड़ने का) समय = 08:00 से 09:24
पारण तिथि के दिन हरि वासर समाप्त होने का समय = 08:00

एकादशी के व्रत को समाप्त करने को पारण कहते हैं। एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण किया जाता है। एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति आवश्यक है। यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के बाद ही होता है। द्वादशी तिथि के भीतर पारण न करना पाप करने के समान होता है।

एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए। जो श्रद्धालु व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत तोड़ने से पहले हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि है। व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है। व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए। कुछ कारणों की वजह से अगर कोई प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं है तो उसे मध्यान के बाद पारण करना चाहिए।

कभी कभी एकादशी व्रत लगातार दो दिनों के लिए हो जाता है। जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब स्मार्त-परिवारजनों को पहले दिन एकादशी व्रत करना चाहिए। दुसरे दिन वाली एकादशी को दूजी एकादशी कहते हैं। सन्यासियों, विधवाओं और मोक्ष प्राप्ति के इच्छुक श्रद्धालुओं को दूजी एकादशी के दिन व्रत करना चाहिए। जब-जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब-तब दूजी एकादशी और वैष्णव एकादशी एक ही दिन होती हैं।





एकादशी - आरती 

ॐ जय एकादशी, जय एकादशी, जय एकादशी माता।
विष्णु पूजा व्रत को धारण कर, शक्ति मुक्ति पाता॥
ॐ जय एकादशी...॥

तेरे नाम गिनाऊं देवी, भक्ति प्रदान करनी।
गण गौरव की देनी माता, शास्त्रों में वरनी॥
ॐ जय एकादशी...॥

मार्गशीर्ष के कृष्णपक्ष की उत्पन्ना, विश्वतारनी जन्मी।
शुक्ल पक्ष में हुई मोक्षदा, मुक्तिदाता बन आई॥
ॐ जय एकादशी...॥

पौष के कृष्णपक्ष की, सफला नामक है।
शुक्लपक्ष में होय पुत्रदा, आनन्द अधिक रहै॥
ॐ जय एकादशी...॥

नाम षटतिला माघ मास में, कृष्णपक्ष आवै।
शुक्लपक्ष में जया, कहावै, विजय सदा पावै॥
ॐ जय एकादशी...॥

विजया फागुन कृष्णपक्ष में शुक्ला आमलकी।
पापमोचनी कृष्ण पक्ष में, चैत्र महाबलि की॥
ॐ जय एकादशी...॥

चैत्र शुक्ल में नाम कामदा, धन देने वाली।
नाम बरुथिनी कृष्णपक्ष में, वैसाख माह वाली॥
ॐ जय एकादशी...॥

शुक्ल पक्ष में होय मोहिनी अपरा ज्येष्ठ कृष्णपक्षी।
नाम निर्जला सब सुख करनी, शुक्लपक्ष रखी॥
ॐ जय एकादशी...॥

योगिनी नाम आषाढ में जानों, कृष्णपक्ष करनी।
देवशयनी नाम कहायो, शुक्लपक्ष धरनी॥
ॐ जय एकादशी...॥

कामिका श्रावण मास में आवै, कृष्णपक्ष कहिए।
श्रावण शुक्ला होय पवित्रा आनन्द से रहिए॥
ॐ जय एकादशी...॥

अजा भाद्रपद कृष्णपक्ष की, परिवर्तिनी शुक्ला।
इन्द्रा आश्चिन कृष्णपक्ष में, व्रत से भवसागर निकला॥
ॐ जय एकादशी...॥

पापांकुशा है शुक्ल पक्ष में, आप हरनहारी।
रमा मास कार्तिक में आवै, सुखदायक भारी॥
ॐ जय एकादशी...॥

देवोत्थानी शुक्लपक्ष की, दुखनाशक मैया।
पावन मास में करूं विनती पार करो नैया॥
ॐ जय एकादशी...॥

परमा कृष्णपक्ष में होती, जन मंगल करनी।
शुक्ल मास में होय पद्मिनी दुख दारिद्र हरनी॥
ॐ जय एकादशी...॥

जो कोई आरती एकादशी की, भक्ति सहित गावै।
जन गुरदिता स्वर्ग का वासा, निश्चय वह पावै॥

ॐ जय एकादशी...॥

आरती श्री जगदीशजी 

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी ! जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥
ॐ जय जगदीश हरे।

जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का।
स्वामी दुःख विनसे मन का।
सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥
ॐ जय जगदीश हरे।

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी।
स्वामी शरण गहूँ मैं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥
ॐ जय जगदीश हरे।

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी।
स्वामी तुम अन्तर्यामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥
ॐ जय जगदीश हरे।

तुम करुणा के सागर, तुम पालन-कर्ता।
स्वामी तुम पालन-कर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥
ॐ जय जगदीश हरे।

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
स्वामी सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति॥
ॐ जय जगदीश हरे।

दीनबन्धु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
स्वामी तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठा‌ओ, द्वार पड़ा तेरे॥
ॐ जय जगदीश हरे।

विषय-विकार मिटा‌ओ, पाप हरो देवा।
स्वमी पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ा‌ओ, सन्तन की सेवा॥
ॐ जय जगदीश हरे।

श्री जगदीशजी की आरती, जो कोई नर गावे।
स्वामी जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख संपत्ति पावे॥
ॐ जय जगदीश हरे।


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सरस्वती पूजा 2020 (बसंत पंचमी 2020) 30 जनवरी 2020/वसंत पंचमी पर 14 साल बाद सर्वार्थसिद्धि योग


देवी सरस्वती विद्या, बुद्धि, ज्ञान और वाणी की अधिष्ठात्री देवी हैं। सृष्टि की रचना के लिए देवी शक्ति में अपने आप को पांच भागों में विभक्त कर लिया। वे देवी राधा, पार्वती, सावित्री, दुर्गा और सरस्वती के रूप में भगवान श्री कृष्ण के विभिन्न अंगों से प्रकट हुईं। उस समय श्री कृष्ण के कंठ से उत्पन्न हुए देवी को सरस्वती के नाम से जाना जाने लगा। देवी सरस्वती के अनेक नाम हैं। जिनमें से वाक्, वाणी, गी, गिरा, बाधा, शारदा, वाचा, श्रीश्वरी, वागीश्वरी, ब्राह्मी, गौ, सोमलता, वाग्देवी और वाग्देवता आदि प्रसिद्ध नाम है।

सरस्वती देवी सौम्य गुणों की दात्री और देवों की रक्षक हैं। सृष्टि का निर्माण इनकी मदद से हुआ है। इसीलिए माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को सरस्वती पूजा के नाम से मनाया जाता है। माना जाता है इस दिन देवी सरस्वती का पूजन करने से विद्या और वाणी का वरदान मिलता है।

आमतौर पर हिंदू धर्म में बसंत पंचमी बहुत धूमधाम से मनायी जाती है। इस दिन विभिन्न स्थानों पर विद्या की देवी वीणावादिनी मां सरस्वती की प्रतिमा स्थापित की जाती है। विद्यार्थियों के साथ आम लोग भी मां सरस्वती की पूजा करते हैं और विद्या, बुद्धि और ज्ञान अर्जित करने की प्रार्थना करते हैं। 

लेकिन क्या आपको मालूम है कि बसंत पंचमी के दिन सिर्फ मां सरस्वती ही नहीं बल्कि प्रेम के देवता कामदेव की भी पूजा की जाती है। इसके साथ ही इसी दिन भगवान विष्णु की भी पूजा का बहुत महत्व है। वास्तव में वसंत ऋतु को कामदेव की ऋतु मानी जाती है। कहा जाता है कि इस मौसम में प्रत्येक मनुष्य के शरीर में विभिन्न तरह के बदलाव होते हैं। इसलिए वसंत ऋतु को खुशनुमा और प्यार का मौसम भी माना जाता है।

इस वजह से पूजे जाते हैं कामदेव

वास्तव में बसंत पंचमी वसंत ऋतु का आगमन होने के कारण मनायी जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार वसंत और कामदेव काफी घनिष्ठ मित्र थे। जिसके कारण बसंत पंचमी पर कामदेव की पूजा की जाती है। आपको बता दें कि बसंत पंचमी को रतिकाम महोत्सव भी कहा जाता है क्यों कि इस दिन कामदेव के साथ ही उनकी पत्नी रति की भी पूजा होती है।

बसंत पंचमी पर ऐसे करें भगवान विष्णु की पूजा

इस विशेष अवसर पर मां सरस्वती और कामदेव के साथ ही भगवान विष्णु की भी पूजा की जाती है। बसंत पंचमी के दिन तड़के सुबह उठकर सर्वप्रथम पूरे शरीर पर तेल की मालिश करने के बाद नहा लेना चाहिए। 

इसके बाद पीला वस्त्र पहनकर भगवान विष्णु की मूर्ति रखकर अच्छी तरह से श्रृंगार करना चाहिए और भगवान को भी पीले रंग का वस्त्र पहनाकर विभिन्न तरह के फलों का भोग लगाना चाहिए और विधि विधान से या पंडित के बताये अनुसार पूजा करना चाहिए। मां सरस्वती की पूजा करने से पहले भगवान गणेश, सूर्य देवता, विष्णु और शिव सहित अन्य देवताओं की पूजा करनी चाहिए।

बसंत पंचमी का शुभ मुहूर्त

अबूझ मुहूर्त के रूप में


ज्योतिष के अनुसार, वसंत पंचमी (सरस्वती पूजा) के दिन को सभी मांगलिक कार्यों के लिए शुभ माना जाता है। इसलिए इस दिन को अबूझ मुहूर्त के रूप में भी जानते हैं। नए कार्यों की शुरुवात के लिए इस दिन को बहुत शुभ माना जाता है। विवाह और उससे जुड़े कार्यों के लिए बसंत पंचमी का अबूझ मुहूर्त बहुत शुभ होता है। इस दिन कई लोग विवाह सूत्र में बांधते हैं। माना जाता है बसंत पंचमी के दिन विवाह करने वालों का दाम्पत्य जीवन सुखमय रहता है।

सरस्वती पूजा 2020 (बसंत पंचमी 2020)

नक्षत्र मेखला की गणना से माघ मास के शुक्ल पक्ष की वसंत पंचमी 30 जनवरी को गुरुवार के दिन उत्तरा भाद्रपद उपरांत रेवती नक्षत्र की साक्षी में आ रही है। साथ ही सिद्ध योग व मीन राशि के चंद्रमा की साक्षी भी रहेगी। गुरुवार के दिन रेवती नक्षत्र होने से सर्वार्थसिद्धि योग का निर्माण होगा।

रेवती को पंचक का पांचवां नक्षत्र कहा जाता है। यह नक्षत्र अगर शुक्ल पक्षीय होकर शुभ पर्वकाल से युक्त हो, तो इसका पांच गुना शुभफल प्राप्त होता है। पंचागीय गणना की यह श्रेष्ठ स्थिति वसंत पचंमी पर किए गए मांगलिक कार्यों का कई गुना श्रेष्ठ फल प्रदान करेगी।

2020 में बसंत पंचमी (सरस्वती पूजा) 30 जनवरी को मनाई जाएगी। 

पञ्चमी तिथि प्रारम्भ = 29 जनवरी 2020 को 10:45 बजे
पञ्चमी तिथि समाप्त = 30 जनवरी 2020 को 13:18 बजे (उदया तिथि में पंचमी )

इस दिन मां सरस्वती की पूजा का विशेष दिन माना जाता है और मां सरस्वती ही बुद्धि और विद्या की देवी हैं। मान्यता है कि जिस छात्र पर मां सरस्वती की कृपा हो उसकी बुद्धि बाकी छात्रों से अलग और बहुत ही प्रखर होती है। 
सरस्वती पूजा विधि और मंत्र 

मां सरस्वती की प्रतिमा अथवा तस्वीर को सामने रखकर उनके सामने धूप-दीप, अगरबत्ती, गुगुल जलाएं जिससे वातावरण में सकारात्मक उर्जा का संचार हो और आसपास से नकारात्मक ऊर्जा दूर हो जाएगी। 

प्रात:काल स्नानादि कर पीले वस्त्र धारण करें. मां सरस्वती की प्रतिमा को सामने रखें तत्पश्चात क्लश स्थापित कर भगवान गणेश और नवग्रह की विधिवत पूजा करें. फिर मां सरस्वती की पूजा करें. मां की पूजा करते समय सबसे पहले उन्हें आचमन और स्नान कराएं. फिर माता का श्रृंगार कराएं. माता श्वेत वस्त्र धारण करती हैं इसलिए उन्हें श्वेत वस्त्र पहनाएं. प्रसाद के रुप में खीर अथवा दूध से बनी मिठाईयां अर्पित करें. श्वेत फूल माता को अर्पण करें.

कुछ क्षेत्रों में देवी की पूजा कर प्रतिमा को विसर्जित भी किया जाता है. विद्यार्थी मां सरस्वती की पूजा कर गरीब बच्चों में कलम और पुस्तकों का दान करें. संगीत से जुड़े व्यक्ति अपने साज पर तिलक लगा कर मां की आराधना करें व मां को बांसुरी भेंट करें.

इस मंत्र से प्रसन्न होंगी मां सरस्वती 

''एमम्बितमें नदीतमे देवीतमे सरस्वति! अप्रशस्ता इव स्मसि प्रशस्तिमम्ब नस्कृधि! ''😊

😊अर्थात - मातृगणो में श्रेष्ठ, देवियों में श्रेष्ठ हे ! मां सरस्वती हमें प्रशस्ति यानी ज्ञान, धन व संपति प्रदान करें।

यदि पूर्व में दिए मंत्र को पढ़ने में परेशानी हो तो इस सरल मंत्र को पढ़कर मां सरस्वती को प्रसन्न कर ज्ञान का आशीर्वाद प्राप्त करें।
सरस्वति नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि ।
विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा ॥

सरस्वती मंत्र - 1

ॐ ऐं सरस्वत्यै ऐं नमः।

सरस्वती मंत्र - 2

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महासरस्वती देव्यै नमः।

सरस्वती मंत्र - 3

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं वीणा पुस्तक धारिणीम् मम् भय निवारय निवारय अभयम् देहि देहि स्वाहा।

सरस्वती मंत्र - 4

ऐं नमः भगवति वद वद वाग्देवि स्वाहा।

सरस्वती मंत्र - 5

शारदा शारदाभौम्वदना। वदनाम्बुजे।

सर्वदा सर्वदास्माकमं सन्निधिमं सन्निधिमं क्रिया तू।

श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा।

सरस्वती मंत्र - 6

ॐ ह्रीं ऐं ह्रीं सरस्वत्यै नमः।

सरस्वती मंत्र - 7

शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमां आद्यां जगद्व्यापिनीं

वीणा पुस्तक धारिणीं अभयदां जाड्यान्धकारापाहां|

हस्ते स्फाटिक मालीकां विदधतीं पद्मासने संस्थितां

वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धि प्रदां शारदां||

पूजन विधि

वसंत पंचमी पर अगर विधि-विधान से देवी सरस्वती की पूजा की जाए तो विद्या और बुद्धि के साथ सफलता भी निश्चित मिलती है। वसंत पंचमी पर मां सरस्वती की पूजा इस प्रकार करें-

> सुबह स्नान कर पवित्र आचरण, वाणी के संकल्प के साथ माता सरस्वती की पूजा करें।

> पूजा में गंध, अक्षत (चावल) के साथ खासतौर पर सफेद और पीले फूल, सफेद चंदन तथा सफेद वस्त्र देवी सरस्वती को चढ़ाएं।

> प्रसाद में पीले चावल, खीर, दूध, दही, मक्खन, सफेद तिल के लड्डू, घी, नारियल, शक्कर और मौसमी फल चढ़ाएं।

> इसके बाद माता सरस्वती से अपने लिए और अपने बच्चों की बुद्धि और कामयाबी की कामना करें, घी के दीप जलाकर आरती करें।

देवी सरस्वती की आरती

जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता।

सद्गुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता।। जय सरस्वती...।।

चंद्रवदनि पद्मासिनी, द्युति मंगलकारी।

सोहे शुभ हंस सवारी, अतुल तेजधारी।। जय सरस्वती...।।

बाएँ कर में वीणा, दाएं कर माला।

शीश मुकुट मणि सोहे, गल मोतियन माला।। जय सरस्वती...।।

देवि शरण जो आए, उनका उद्धार किया।

पैठि मंथरा दासी, रावण संहार किया।। जय सरस्वती...।।

विद्या ज्ञान प्रदायिनि ज्ञान प्रकाश भरो।

मोह, अज्ञान और तिमिर का, जग से नाश करो।। जय सरस्वती...।।

धूप दीप फल मेवा, मां स्वीकार करो।

ज्ञानचक्षु दे माता, जग निस्तार करो।। जय सरस्वती...।।

मां सरस्वती जी की आरती, जो कोई नर गावे।

हितकारी सुखकारी, ज्ञान भक्ति पावे।। जय सरस्वती...।।

Monday, 20 January 2020

माघ गुप्त नवरात्रि 2020 में कब है, दस महाविद्या साधना , जानिए घट स्थापना मुहूर्त, महत्व, पूजा विधि, कथा


देवी भागवत के अनुसार वर्ष में चार बार नवरात्रि आते हैं और जिस प्रकार नवरात्रि में देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है, ठीक उसी प्रकार गुप्त नवरात्रि में दस महाविद्याओं की साधना की जाती है। गुप्त नवरात्रि के दौरान साधक माँ काली, तारा देवी, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, माता छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, माँ धूमावती , माँ बगलामुखी, मातंगी और माता कमला देवी की पूजा करते हैं। जहां नवरात्रि में देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है उसी तरह गुप्त नवरात्र में दस महाविद्याओं की पूजा होती है। इस समय देवी भगवती के भक्त बेहद कड़े नियमों से देवी की आराधना करते हैं। विधिपूर्वक पूजा-अर्चना देवी से आर्शीवाद लेते हैं।

ज्योतिषाचार्य मुकेश के अनुसार इस वर्ष माघ गुप्त नवरात्रि में 5 वर्षों बाद सर्वार्थ सिद्धि योग बन रहा है, जिसका लाभ माता के साधको को मिलने वाला है.


गुप्त नवरात्रि विशेषकर तांत्रिक क्रियाएं, शक्ति साधना, महाकाल आदि से जुड़े लोगों के लिए विशेष महत्त्व रखती है। इस दौरान देवी भगवती के साधक बेहद कड़े नियम के साथ व्रत और साधना करते हैं। इस दौरान लोग लंबी साधना कर दुर्लभ शक्तियों की प्राप्ति करने का प्रयास करते हैं।


गुप्त नवरात्रि पूजा विधि GUPT NAVRATRI POOJA VIDHI

प्राचीन मान्यताओं के अनुसार गुप्त नवरात्रि में की गयी पूजा को गोपनीय रखा जाता है नवरात्रि के पहले दिन स्नान आदि से निवृत होकर व्रत का संकल्प ले और नौ दिनों के लिए शुभ मुहूर्त में कलश की स्थापना करे यदि आप कलश स्थापना करते है तो सुबह शाम देवी मंत्र जाप, चालीसा या सप्तशती का पाठ जरूर करे. देवी मां को दोनों वेला के समय लौंग और बताशे का भोग लगाएं, गुप्त नवरात्रो के दौरान मां को लाल रंग के फूल चढ़ाना सर्वोत्तम मन जाता है नवरात्रि के पूरे नौ दिनों तक अपना खान पान और आहार सात्विक रखें. गुप्त नवरात्री में गुप्त रूप से की गयी देवी की आराधना जल्द ही फलीभूत होती है और व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी करती है।

सिद्धिकुंजिकास्तोत्र का 18 बार पाठ करें।


माघ गुप्त नवरात्रि शुभ मुहूर्त 2020 
*साल 2020 में गुप्त नवरात्रि का पर्व 25 जनवरी से शुरू होकर 3 फ़रवरी तक चलेगा.
*25 फ़रवरी के दिन कलश स्थापना की जायेगी|

साल 2020 में गुप्त नवरात्रि का पर्व 25 जनवरी शनिवार से शुरू होकर 3 फ़रवरी तक चलेगा.
घटस्थापना का शुभ मुहूर्त होगा – 25 जनवरी प्रातःकाल 09:39 मिनट से प्रातःकाल 10:38 मिनट तक|
मुहूर्त की कुल अवधि होगी – 59 मिनट की होगी|
घटस्थापना का अभिजित मुहूर्त होगा – दोपहर 12:03 मिनट से 12:46 मिनट तक |
मुहूर्त की कुल अवधि – 43 मिनट की होगी|
प्रतिपदा तिथि शुरू होगी – 25 जनवरी सुबह 03:11 मिनट पर |
प्रतिपदा तिथि समाप्त होगी – 26 जनवरी सुबह 04:31 मिनट पर |



माघ गुप्त नवरात्रि कथा (Magha Gupt Navratri Story/ Katha)

माघ गुप्त नवरात्रि कथा के अनुसार एक समय ऋषि श्रृंगी अपने भक्तों को दर्शन दे रहे थे और अचानक ही भीड़ से एक स्त्री निकलकर बाहर आई और उसने ऋषि श्रृंगी से कहा कि मेरे पति सदैव दुर्व्यसनों से घिरे रहते हैं। जिसकी वजह से मैं कोई भी पूजा पाठ नहीं कर पाती धर्म और भक्ति से जुड़े कार्यों का संपादन भी नहीं कर पाती। यहां तक कि ऋषियों को भी उनके हिस्से का अन्न भी समर्पित नहीं कर पाती। मेरे पति मंसाहारी और जुआरी हैं।

लेकिन मैं मां दुर्गा की सेवा करना चाहती हूं। उनकी भक्ति साधना से अपने और अपने परिवार के जीवन को सफल बनाना चाहती हूं।ऋषि श्रृंगी महिला के भक्ति भाव से बहुत प्रभावित हुए और उसे इसका उपाय बताते हुए कहा कि चैत्र और शारदीय नवरात्रि को सब आमजन जानते हैं। लेकिन इसके अतिरिक्त दो नवरात्र और भी होते हैं। जिन्हें गुप्त नवरात्रि कहा जाता है। उन्होंने कहा कि प्रकट नवरात्रि में नौ देवियों की उपासना होती है और गुप्त नवरात्रि में दस महाविद्याओं की साधना की जाती है।

इस नवरात्रि में यदि कोई मां दुर्गा की उपासना करता है तो मां उसके जीवन को सफल बना देती हैं। ऋषि श्रृंगी ने आगे कहा कि लोभी, कामी, व्यसनी, मांसाहारी अथवा पूजा पाठ न कर सकने वाला भी यदि गुप्त नवरात्रि में मां की पूजा करता है तो उसे जीवन में कुछ और करने की आवश्यकता नहीं रहती। उस स्त्री ने ऋषि श्रृंगी के वचनों पर पूर्ण श्रद्ध करके गुप्त नवरात्रि की पूजा की। जिसके बाद मां उस स्त्री पर प्रसन्न हुई और उसके जीवन में परिवर्तन आने लगा। उसके जीवन में सुख शांति आने लगी और पति जो गलत रास्ते पर था वह सभी मार्ग पर आ गया।

दशमहाविद्या साधना गुप्त नवरात्रों में मुख्य रुप से की जाती है. मंत्र साधना एवं सिद्धि हेतु दश महाविद्या की उपासना का बहुत महत्व बताया गया है. माता की उपासना विधि में मंत्र जाप का बहुत महत्व होता है. किसी भी साधक के लिए आवश्यक है की वह उपासना में शुद्धता शुचिता का ध्यान रखे. संपूर्ण एकाग्रता के साथ देवी का ध्यान करते हुए मंत्र जाप द्वारा देवी की साधना करे.

दशमहाविद्या मंत्र साधना में कई मंत्रों का उल्लेख मिलता है. साधक अपने अनुकूल मंत्र को ग्रहण करके उसके जाप द्वारा सिद्धि प्राप्ती के मार्ग पर चल सकता है. किसी भी मंत्र का अपना महत्व और शक्ति होती है.


महाविद्या काली | Kali
माँ काली तंत्र साधना की मुख्य देवी हैं, इनका स्वरुप भयावह एवं शत्रु का संहार करने वाला होता है. मां काली दस महाविद्याओं मे से एक मानी जाती हैं. तंत्र विद्या हेतु काली के रूप की साधना की जाती है.

मंत्र
'ऊँ क्रीं कालिकायै नमः'


महाविद्या तारा | Tara
माँ तारा दशमहाविद्याओं में से एक हैं, इन्हें भी तंत्र साधना के लिए भी बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है.मां तारा सर्वसिद्धिकारक हैं एवं उग्र तारा, नील सरस्वती और एकजटा इन्हीं के रूप हैं. यही राज-राजेश्वरी हैं. देवी माँ तारा कला-स्वरूपा और मुक्ति को प्रदान करने वाली हैं.
मंत्र
ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट


महाविद्या ललिता | Lalita

माँ ललिता गौर वर्ण की, कमल पर विराजमान हैं उनके तेज से दिशाएं प्रकाशित हैं. इनकी साधना द्वारा साधक को समृद्धि की प्राप्त होती है. माँ के मंत्र जाप साधक को माता का आशीर्वाद प्रदान करने में सहायक होते हैं.

मंत्र
'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौ: ॐ ह्रीं श्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौ: ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं नम:।'


महाविद्या भुवनेश्वरी | Bhuvaneswari

देवी भुवनेश्वरी को सर्वोच्च सत्ता की प्रतीक कहा गया है. दिव्य प्रकाश से युक्त माता भुवनेश्वरी साधक को शुभता का वरदान देती हैं. माँ भुवनेश्वरी के मंत्र जाप द्वारा उपासक को सुख और ऎश्वर्य की प्राप्ती होती है.

मंत्र
“ऐं हृं श्रीं ऐं हृं”


महाविद्या त्रिपुर भैरवी | Tripura Bhairavi

माँ त्रिपुर भैरवी की साधना द्वारा साधक को सुख और सौभगय की प्राप्ती होती है. माता की पूजा में लाल रंग का उपयोग किया जाता है. मां के मंत्र जाप द्वारा इनकी सिद्धि और शक्ति की प्राप्ति संभव है.

मंत्र
ऊँ ऎं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नम:


महाविद्या छिन्नमस्तिका॒ | Chinnamasta

माँ छिन्नमस्तिका॒ को मां चिंतपूर्णी के नाम से भी जाना जाता है. शत्रुओं का नाश करने और साधक को भय मुक्ति करके सुख एवं शांति प्रदान करती हैं. माता भक्त की सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करती है. सभी चिंताओं का हरण कर लेने के कारण ही इन्हें चिंतपूर्णी कहा जाता है.

मंत्र
ॐ श्रीं ह्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचिनिये ह्रीं ह्रीं फट स्वाहा ॥


महाविद्या धूमावती | Dhumavati

मां धूमावती दशमहाविद्याओं में एक हैं. इनके दर्शन मात्र से अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है. माँ धूमावती में शत्रु का संहार करने की सभी क्षमताएं निहित हैं. इनकी साधना द्वारा साधक को शक्ति एवं सामर्थ्य की प्राप्ती होती है.

मंत्र
ॐ धूं धूं धूमावती स्वाहा

महाविद्या बगलामुखी | Maa Baglamukhi

माँ बगलामुखी स्तंभव की अधिष्ठात्री देवी हैं. इन्हें पीताम्बरा भी कहा जाता है. देवी बग्लामुखी की साधना शत्रु का स्तंभन करने, वाकसिद्धि, विवाद में विजय के लिए की जाती है.

मंत्र
ॐ ह्लीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय, जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा’

महाविद्या मातंगी | Matangi

माता मातंगी वाणी और संगीत की देवी मानी जाती हैं. सुखी जीवन एवं समृद्ध की प्राप्ती के लिए मातंगी माता की उपासना का विधान है. माँ मातंगी को उच्छिष्टचांडालिनी, महापिशाचिनी, राजमांतगी, सुमुखी, वैश्यमातंगी, कर्णमातंगी स्वरुप में भी दर्शाया गया है.

मंत्र
‘क्रीं ह्रीं मातंगी ह्रीं क्रीं स्वाहा:’


महाविद्या कमला | Kamla
माँ कमला कमल पर आसीन हुए स्वर्ण से सुशोभित हैं. सुख समृद्धि और अतुल सामर्थ्य की प्रतीक हैं. इनकी साधना से उपासक को सुख समृद्धि का भंडार मिलता है. धन की कभी कमी नहीं रहती है. चारों दिशाओं में उसका यशोगान होता है

मंत्र
श्रीं क्लीं श्रीं नमः॥


Acharya
Mukesh

Tuesday, 14 January 2020

मकर संक्रांति 2020



मकर संक्रांति महज एक खगोलीय राशि परिर्वतन नहीं है. इसके ज्योतिषीय महत्व भी हैं. इस दिन सूर्य मकर राशि में गोचर करते हैं. वहीं सूर्य अपने पुत्र यानि शनि से मिलने उनके घर आते हैं. व्यक्ति के जीवन में इस परिर्वतन का बहुत असर होता है. इसीलिए इस पर्व को इतना महत्व दिया जाता है. सूर्य की गति इस दिन से बढ़ने लगती है. खरमास खत्म हो जाता है और शुभ और मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं. ऐसा सब सूर्य के गोचर के कारण ही होता है.

सूर्य का मजबूत होना बहुत जरूरी है. जिस व्यक्ति के जीवन में सूर्य कमजोर होते हैं उसे मेहनत करने के बाद भी सम्मान नहीं मिलता है और हर क्षेत्र में तरक्की की रफ्तार में वह पीछे रह जाता है. सूर्य को प्रभावशाली ग्रह माना गया है. जिस व्यक्ति के जीवन में सूर्य मजबूत स्थिति में होते हैं सूर्य उस व्यक्ति को मान सम्मान, पद- प्रतिष्ठा, उच्च पद सभी कुछ प्रदान करते हैं.

जिन लोगों को जीवन में इस तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है उन लोगों के लिए मकर संक्रांति का दिन बेहद महत्वपूर्ण है. इस दिन सूर्य की पूजा करने से कई तरह के कष्ट और संकट मिट जाते हैं. 
सूर्य भगवान के लिए हवन करने से सूर्य की शुभता बढ़ जाती है।
इस दिन स्नान करने के बाद सूर्य भगवान को याद करते हुए सूर्य मंत्र 'ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय नम:' का जप करना चाहिए. पूजा करने के बाद जल में गंगा जल मिलाकर उसमें चंदन का पाउडर मिलकर सूर्य भगवान को अर्घ्य देना चाहिए. इस दिन गायत्री मंत्र का जाप करने से भी सूर्य की अशुभता दूर होती है.

Monday, 13 January 2020

नीच एवं अशुभ सूर्य को शुभ करने का महा-उपाय आचार्य मुकेश के द्वारा


वैदिक ज्योतिष सूर्य-पूजा एवं गायत्री-हवन का सुझाव मुख्य रूप से किसी कुंडली में अशुभ रूप से कार्य कर रहे सूर्य की अशुभता को कम करने के लिए, अशुभ सूर्य द्वारा कुंडली में बनाए जाने वाले किसी दोष के निवारण के लिए अथवा किसी कुंडली में शुभ रूप से कार्य कर रहे सूर्य की शक्ति तथा शुभ फल बढ़ाने के लिए देता है। 

यदि आपकी कुंडली में सूर्य नीच अथवा अशुभ हैं या अशुभ सूर्य की दशा चल रही हो आपके लिए 15 जनवरी से अच्छा दिन हो ही नहीं सकता। मकर संक्रांति के दिन अपने घर में एक छोटे से हवन का आयोजन करें और सपरिवार मिलकर गायत्री मन्त्रों से सूर्य के शुभ प्रभाव हेतु संकल्प लेकर हवन करें। हवन करना न भी आये तो सामान्य तरीके से यथाशक्ति हवन करें !

मकर-संक्रांति के दिन सूर्य अपने पुत्र शनि के घर पधारते हैं। अतः आज  के दिन सूर्य हवन से सूर्य देव विशेष रूप से  प्रसन्न होते हैं और जातक को अपनी शुभता का वरदान भी देते हैं।

यदि यज्ञ की व्यवस्था न हो तो गैस जला कर उस पर तवा रख कर गर्म करें, फ़िर मन्त्र पढ़ते हुए यज्ञ की आहुति तवे पर डाल दें। यज्ञ के बाद गैस बन्द कर दें और उस यज्ञ प्रसाद को तुलसी या किसी पौधे के गमले में डाल दें।
हवन 

नारदपुराण के अनुसार हवन के बिना कोई भी पूजा अधुरी मानी जाती है। आज विधि की जानकारी के अभाव में अक्सर लोग मंत्रों के बिना ही यह हवन करते हैं।

अब बात करते हैं दैनिक हवन विधि का जिसका उपयोग आप स्वयं भी कर सकते हैं। सबसे पहलेपूजा के बाद एक पात्र (कड़ाही या मिट्टी के बर्तन) में अग्नि स्थापना करें। उसमें आम की लकड़ी व कपूर रखकर जला दें।

फिर पूरब दिशा की ओर मुंह करके बैठ जाये ! शुभ कार्यों के लिए हमारे हिंदू धर्म में पूर्व दिशा और उत्तर दिशा को शुभ माना गया है ! हवन करने के लिए हमें पूर्व दिशा या उत्तर दिशा की ओर मुंह कर बैठ जाना होगा !


ओं भूर्भुव: स्वः ।।
इस मंत्र का उच्चारण करके अग्नि जला अगले मंत्र से आह्वाहन करे। वह मंत्र यह है-

ओं भूर्भुवः स्वर्धौरिव भूम्ना पृथिवीव वरिम्णा ।
तस्यास्ते पृथिवी देवयजनि पृष्ठेऽग्निमन्नादमन्नाधायादधे ।।

ओम् उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टापूर्ते संसृजेथामयं च ।
आस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन् विश्वे देवा यजमानश्च सीदत ।।

इस मंत्र से जब अग्नि समिधाओं में प्रविष्ट होने लगे तब तीन लकड़ी आठ-आठ अंगुल की घृत में डूबो उनमें से नीचे लिखे एक-एक मंत्र से एक-एक समिधा को अग्नि में चढ़ावें। वे मंत्र ये हैं -

इस मंत्र से एक समिधा अग्नि में चढ़ाएं :-

ओम् अयं त इध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वर्धस्व चेद्ध वर्धय चास्मान् प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन समेधय स्वाहा ।

इदमग्नये जातवेदसे-इदं न मम् ।

इससे और अगले अर्थात् दोनों मन्त्रों से दूसरी समिधा अग्नि में चढ़ावें :-

ओं समिधाग्निं दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथिम् ।
आस्मिन् हव्या जुहोतन, स्वाहा ।।

इस मंत्र से तीसरी समिधा अग्नि में चढ़ावें :-

ओं तं त्वां समिदि्भरड़ि्गरो घृतेन वर्द्धयामसि ।
बृहच्छोचा यविष्ठय स्वाहा ।। 

इदमग्नयेऽड़ि्रसे-इदन्न मम ।।


जलप्रोक्षण-मन्त्र

ओम् आदितेऽनुमन्यस्व । इससे पूर्व दिशा में
ओम् अनुमतेऽनुमन्यस्व । इससे पश्चिम दिशा मे
ओं सरस्त्वयनुमन्यस्व । इससे उत्तर दिशा मे जल छिड़कें ।
तत्पश्चात अंजलि में जल लेके वेदी के पूर्व दिशा आदि चारों ओर छिड़कें । 

इसके मंत्र है :-
ओं देव सवित: प्रसुव यज्ञं प्रसुव यज्ञोपतिं भगाय ।
दिव्यो गन्धर्व: केतपू: केतं न: पुनातु वाचस्पतिर्वाचं न: स्वदतु ।।

                         

शुद्ध देशी घी का प्रयोग करें। उसके बाद निम्न मंत्रों से हवन शुरू करें:

ऊं आग्नेय नम: स्वाहा (ओम अग्निदेव ताम्योनम: स्वाहा),
ऊं गणेशाय नम: स्वाहा 11 आहुति
ऊं गौरियाय नम: स्वाहा, 
ऊं वरुणाय नम: स्वाहा, 
ऊं सूर्यादि नवग्रहाय नम: स्वाहा, 
ऊं दुर्गाय नम: स्वाहा, 
ऊं महाकालिकाय नम: स्वाहा
ऊं हनुमते नम: स्वाहा, 
ऊं भैरवाय नम: स्वाहा, 
ऊं कुल देवताय नम: स्वाहा, 
ऊं स्थान देवताय नम: स्वाहा 
ऊं ब्रह्माय नम: स्वाहा, 
ऊं विष्णुवे नम: स्वाहा, 
ऊं शिवाय नम: स्वाहा.

अब सूर्य के लिए हवन 24 या 108  गायत्री-मंत्र के साथ स्वाहा लगाकर करें ! 


‘ऊँ भूर्भव स्व: तत्सवितुर्वरेण्यम् भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात।’ स्वाहा :


इदं गायत्री इदं न मम् !!


इसके पश्चात 


ऊं जयंती मंगलाकाली भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा शिवाधात्री स्वाहा, स्वधा नमस्तुति स्वाहा:, 

ओम ब्रह्मामुरारी त्रिपुरांतकारी भानु: क्षादी: भूमि सुतो बुधश्च: गुरुश्च शक्रे शनि राहु केतो सर्वे ग्रहा शांति कर: स्वाहा:,

ओम गुर्रु ब्रह्मा, गुर्रु विष्णु, गुर्रु देवा महेश्वर: गुरु साक्षात परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नम: स्वाहा !


उपरोक्त मंत्रो का जप करने के बाद नारियल में हवन की बची सामग्री डाल ,कलावा बांधकर उसे अग्नि में समर्पित कर दें, इस विधि को वोलि कहते हैं। फिर पूर्ण आहूति के रूप में नारियल, घी, लाल धागा, पान, सुपारी, लौंग, जायफल आदि स्वाहा करें।

स्विष्टकृतहोम:- चमच्च में मीठा और घी लेकर अग्निदेव को अर्पित करें।



पूर्णाहुति मंत्र: गड़ी गोला काट कर उसमें बची हवन सामग्री,घी, पान पत्ता , सुपारी इत्यादि डाल ये मंत्र बोलते हुए अर्पित करें:-




वसोरधारा:-
इस मंत्र से घी नीचे से ऊपर धार बनाते हुए गोले पर डाल दें:-


अब अंत में पानी की सहायता से आचमनी करेंगे ! जो कि कम से कम तीन बार होनी चाहिए ! आचमनी करने के लिए पानी को आम के पत्ते से लेकर तीन बार हवन के ऊपर से घुमा कर बगल में गिरा देंगे. यह प्रक्रिया तीन बार करेंगे उसके बाद हमारी हवन की प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है.

आचार्य मुकेश