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Acharya Mukesh

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Monday, 18 May 2020

वट सावित्री व्रत 2020, Pujan Vidhi, #Muhurat | वट सावित्री व्रत की पूजा विधि

Vat Savitri Vrat 2020



वट सावित्री व्रत सौभाग्य को देने वाला और संतान की प्राप्ति में सहायता देने वाला व्रत माना गया है। भारतीय संस्कृति में यह व्रत आदर्श नारीत्व का प्रतीक बन चुका है। इस व्रत की तिथि को लेकर भिन्न मत हैं। स्कंद पुराण तथा भविष्योत्तर पुराण के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को यह व्रत करने का विधान है, वहीं निर्णयामृत आदि के अनुसार ज्येष्ठ मास की अमावस्या को व्रत करने की बात कही गई है।

वट सावित्री🌕पूर्णिमा व्रत शुक्रवार, जून 5, 2020 को

वट सावित्री 🌑अमावस्या शुक्रवार, मई 22, 2020 को
अमावस्या तिथि प्रारम्भ - मई 21, 2020 को 09:35 पी एम बजे
अमावस्या तिथि समाप्त - मई 22, 2020 को 11:08 पी एम बजे

पूजन सामग्री

वट वृक्ष के नीचे मिट्टी की बनी सावित्री और सत्यवान तथा भैंसे पर सवार यम की मूर्ति स्थापित कर पूजा करनी चाहिए तथा बड़ की जड़ में पानी देना चाहिए। पूजा के लिए जल, मौली, रोली, कच्चा सूत, भिगोया हुआ चना, फूल, सत्यवान-सावित्री की मूर्ति, बांस का पंखा, लाल धागा, मिट्टी का दीपक, धूप और पांच फल जिसमें लीची अवश्य हो आदि होनी चाहिए।

पूजा विधान

जल से वट वृक्ष को सींच कर तने को चारों ओर सात बार कच्चा धागा लपेट कर तीन बार परिक्रमा करनी चाहिए। साथ ही पंखे से वट वृक्ष को हवा करें इसके बाद सत्यवान−सावित्री की कथा सुननी चाहिए। इसके बाद भीगे हुए चनों का बायना निकाल कर उस पर यथाशक्ति रुपए रखकर अपनी सास को देना चाहिए तथा उनके चरण स्पर्श करने चाहिएं। घर आकर जल से अपने पति के पैर धोएं और आशीर्वाद लें। उसके बाद अपना व्रत खोल सकती हैं।

कथा

मद्र देश के राजा अश्वपति ने पत्नी सहित संतान के लिए सावित्री देवी का विधिपूर्वक व्रत तथा पूजन करके पुत्री होने का वर प्राप्त किया। सर्वगुण संपन्न देवी सावित्री ने पुत्री के रूप में अश्वपति के घर कन्या के रूप में जन्म लिया। कन्या के युवा होने पर अश्वपति ने अपने मंत्री के साथ सावित्री को अपना पति चुनने के लिए भेज दिया। सावित्री अपने मन के अनुकूल वर का चयन कर जब लौटी तो उसी दिन महर्षि नारद उनके यहां पधारे। नारदजी के पूछने पर सावित्री ने कहा कि महाराज द्युमत्सेन जिनका राज्य हर लिया गया है, जो अंधे हो गए हैं और अपनी पत्नी सहित वनों की खाक छानते फिर रहे हैं, उन्हीं के इकलौते पुत्र सत्यवान की कीर्ति सुनकर उन्हें मैंने पति रूप में वरण कर लिया है।

नारदजी ने सत्यवान तथा सावित्री के ग्रहों की गणना कर अश्वपति को बधाई दी तथा सत्यवान के गुणों की भूरि−भूरि प्रशंसा की और बताया कि सावित्री के बारह वर्ष की आयु होने पर सत्यवान की मृत्यु हो जाएगी। नारदजी की बात सुनकर राजा अश्वपति का चेहरा मुरझा गया। उन्होंने सावित्री से किसी अन्य को अपना पति चुनने की सलाह दी परंतु सावित्री ने उत्तर दिया कि आर्य कन्या होने के नाते जब मैं सत्यवान का वरण कर चुकी हूं तो अब वे चाहे अल्पायु हों या दीर्घायु, मैं किसी अन्य को अपने हृदय में स्थान नहीं दे सकती।

सावित्री ने नारदजी से सत्यवान की मृत्यु का समय ज्ञात कर लिया। दोनों का विवाह हो गया। सावित्री अपने श्वसुर परिवार के साथ जंगल में रहने लगी। नारदजी द्वारा बताये हुए दिन से तीन दिन पूर्व से ही सावित्री ने उपवास शुरू कर दिया। नारदजी द्वारा निश्चित तिथि को जब सत्यवान लकड़ी काटने जंगल के लिए चला तो सास−श्वसुर से आज्ञा लेकर वह भी सत्यवान के साथ चल दी। सत्यवान जंगल में पहुंचकर लकड़ी काटने के लिए वृक्ष पर चढ़ा। वृक्ष पर चढ़ने के बाद उसके सिर में भयंकर पीड़ा होने लगी। वह नीचे उतरा। सावित्री ने उसे बड़ के पेड़ के नीचे लिटा कर उसका सिर अपनी जांघ पर रख लिया। देखते ही देखते यमराज ने ब्रह्माजी के विधान की रूपरेखा सावित्री के सामने स्पष्ट की और सत्यवान के प्राणों को लेकर चल दिये। 'कहीं−कहीं ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि वट वृक्ष के नीचे लेटे हुए सत्यवान को सर्प ने डंस लिया था।' सावित्री सत्यवान को वट वृक्ष के नीचे ही लिटाकर यमराज के पीछे−पीछे चल दी। पीछे आती हुई सावित्री को यमराज ने उसे लौट जाने का आदेश दिया। इस पर वह बोली महाराज जहां पति वहीं पत्नी। यही धर्म है, यही मर्यादा है।

सावित्री की धर्म निष्ठा से प्रसन्न होकर यमराज बोले कि पति के प्राणों के अतिरिक्त कुछ भी मांग लो। सावित्री ने यमराज से सास−श्वसुर के आंखों की ज्योति और दीर्घायु मांगी। यमराज तथास्तु कहकर आगे बढ़ गए। सावित्री यमराज का पीछा करती रही। यमराज ने अपने पीछे आती सावित्री से वापस लौट जाने को कहा तो सावित्री बोली कि पति के बिना नारी के जीवन की कोई सार्थकता नहीं। यमराज ने सावित्री के पति व्रत धर्म से खुश होकर पुनः वरदान मांगने के लिए कहा। इस बार उसने अपने श्वसुर का राज्य वापस दिलाने की प्रार्थना की। तथास्तु कहकर यमराज आगे चल दिये। सावित्री अब भी यमराज के पीछे चलती रही। इस बार सावित्री ने यमराज से सौ पुत्रों की मां बनने का वरदान मांगा। तथास्तु कहकर जब यमराज आगे बढ़े तो सावित्री बोली आपने मुझे सौ पुत्रों का वरदान दिया है, पर पति के बिना मैं मां किस प्रकार बन सकती हूं। अपना यह तीसरा वरदान पूरा कीजिए।

सावित्री की धर्मिनष्ठा, ज्ञान, विवेक तथा पतिव्रत धर्म की बात जानकर यमराज ने सत्यवान के प्राणों को अपने पाश से स्वतंत्र कर दिया। सावित्री सत्यवान के प्राण को लेकर वट वृक्ष के नीचे पहुंची जहां सत्यवान का मृत शरीर रखा था। सावित्री ने वट वृक्ष की परिक्रमा की तो सत्यवान जीवित हो उठा। प्रसन्नचित सावित्री अपने सास−श्वसुर के पास पहुंची तो उन्हें नेत्र ज्योति प्राप्त हो गई। इसके बाद उनका खोया हुआ राज्य भी उन्हें मिल गया। आगे चलकर सावित्री सौ पुत्रों की मां बनी। इस प्रकार चारों दिशाएं सावित्री के पतिव्रत धर्म के पालन की कीर्ति से गूंज उठीं।


Acharya Mukesh
#Vat_Savitri_Vrat_2020

Sunday, 15 March 2020

Shani Transit 2020:जानें नए साल में आपकी राशि पर शनि का कैसा रहेगा प्रभाव


पाया या मूर्तिनिर्णय गोचर में ग्रहो के अनुसार फलकथन करने के लिए एक विशेष विधि है | किसी भी व्यक्ति की जन्म राशि से शनि जिस भी भाव में गोचर कर रहा होता है| उसके अनुसार शनि के पाया अर्थात मूर्तिनिर्णय के फल का विचार किया जाता है| मूर्तियां चार प्रकार की होती है (1) स्वर्ण (2) रजत (3) ताम्र (4) लोह | इनमें स्वर्ण मूर्ति सबसे अधिक शुभ होती है और घटते हुए क्रम के अनुसार लोह मूर्ति सबसे कम शुभ मानी जाती है |
शनि के साथ-साथ यह भी अवश्य विचार करे की उसे समय गोचर में चन्द्रमा किस राशि में स्थित है |
स्वर्ण मूर्ति - जब शनि गोचर में किसी व्यक्ति की जन्म राशि से 1, 6, 11 भाव में भ्रमण करते है तो शनि के पाये स्वर्ण के माने जाते है| यह जातक के लिए अत्यधिक शुभ एवं स्वर्णिम परिणाम देने वाला होता है |
रजत मूर्ति – जब शनि गोचर में किसी व्यक्ति की जन्म राशि से 2, 5, 9 भाव में भ्रमण करते है तो शनि के पाद रजत के माने जाते है| यह जातक को जीवन में आगे बढ़ने के अच्छे अवसर प्रदान करता है |
ताम्र मूर्ति – जब शनि गोचर में किसी व्यक्ति की जन्म राशि से 3, 7, 10 भाव में भ्रमण करते है तो शनि के पाये  ताम्र के माने जाते है| यह जातक को मध्यम होकर मिश्रित फल प्रदान करता है |
लोह मूर्ति -  जब शनि गोचर में किसी व्यक्ति की जन्म राशि से 4, 8, 12 भाव में भ्रमण करते है तो शनि के पाये लोह के माने जाते है| यह जातक को परेशानियां और समस्याएं देता है |






तुला राशि शनि की ढैय्या 2020 /24 जनवरी 2020 शनि का मकर राशि में प्रवेश / LIBRA SATURN TRANSIT 2020


सक्रीय हो जाइए आपको शनि की ढैय्या लगने वाली है आप समझ गए होंगे की हम किस राशि की बात कर रहे है| जी हां आज हम तुला राशि वालो का 2020 का वार्षिक राशिफल लेकर उपस्थित हुए है| तुला राशि वालो को शनि की ढैय्या लगने वाली है इसीलिये आप अपने सभी कार्यो में सचेत हो जाइये शनिदेव बुरे कर्मो का बुरा और अच्छे कर्मो का अच्छा परिणाम आपको देते है| इसीलिये शनि की ढैय्या में ऐसा कोई भी कार्य नही करे जिससे शनि देव रुष्ट हो जाये और आप दंड के भागी हो सबसे पहले हम आपको बताते है की इस साल ग्रहों की स्थिति कैसी रहेगी क्युकी ग्रहों की स्थिति जैसी रहेगी राशियों के जो परिवर्तन होंगे उसी के बर्ताव पर आपका आने वाला वर्ष निर्भर करेगा तो सबसे पहले बात करते है ग्रह गोचर की स्थिति की साल की शुरुआत में आपकी राशि से चतुर्थ भाव में शुक्र विराजित है द्वितीय भाव में मंगल विराजित है, और तृतीय भाव में सूर्य, केतु, शनि, बुध, और गुरु ये सभी ग्रह एक साथ आकर बैठे है| गुरु स्वग्रही होकर बैठा है| अच्छा है आपके लिये भाग्य स्थान में राहू का विराजित होना थोडा सा आपके कार्य में रूकावट डालेगा आपके कर्म क्षेत्र में आपके भाग्य में थोडा सा कम करेगा| परन्तु 24 जनवरी से जगह बदलेगी ग्रहों की स्थितिया बदलेगी जब 24 जनवरी 2020 से शनि का मकर राशि में यानि आपके चतुर्थ भाव में प्रवेश होगा| उस समय स्थितिया परिवर्तन होगी और आपके सुख में वृद्धि होगी आपकी माता के साथ आपका रिश्ता अच्छा रहेगा किसी भी तरह का कोई भी आप कार्य भूमि, वाहन से सम्बंधित करते है| तो आपको उसमे सफलता हासिल होंगी| इसके अलावा गुरु जो की 30 मार्च को नीच के होकर मकर राशि में प्रवेश कर रहे है| उसके बाद वो 30 जून को पुनः धनु राशि में प्रवेश करेंगे और 20 नवम्बर को पुनः मकर राशि में प्रवेश कर जायेंगे| ये कुछ उत्तार चढाव गुरु का इस साल देखने को मिलेगा| राहू इस साल आपके भाग्य स्थान से आपके अष्टम स्थान यानि वृषभ राशि में 23 सितम्बर 2020 को प्रवेश करेंगे| वही 23 सितम्बर 2020 को केतु भी आपके राशि से द्वितीय भाव में यानि वृश्चिक राशि में प्रवेश करेंगे| तो ये कुछ ग्रहों की स्थिति बन रही है| और इस स्थिति के आधार पर ही अब हम आपको आपके आने वाला वर्ष 2020 का वार्षिक राशिफल बतायेंगे| ये राशिफल चंद्र राशि और लग्न दोनों के हिसाब से सम्मान रूप से प्रभावशाली है| हर व्यक्ति के मन में ये उत्त्सुकता रहती है की पारिवारिक रूप से उसके जीवन में क्या बदलाव होने वाला है| वो अविवाहित के तो क्या उसका विवाह होगा, और विवाह के बंधन में बंधा है तो उसको संतान की प्राप्ति होगी, या उसका दाम्पत्य जीवन सुखमय होगा या नही ये सभी प्रश्नों के उतर इस पारिवारिक स्थिति के माध्यम से दिए जायेंगे| \\\



1) पारिवारिक स्थिति : पारिवारिक लिहाज से हम देखे तो सबसे अच्छी तो इस बार 24 जनवरी से शनि की जो स्थिति है वो आपके सुख स्थान में आ रहा है| और स्वग्रही होकर बैठ रहा है| तो आपकी माता के साथ में, आपकी दादी के साथ में आपके संबंध बहुत ही अधिक मजबूत होंगे और उनके साथ आपके संबंधो में गहराई आयेंगी| यानि वो आपको हर जगह सुझाव देंगे और सहयोग करेंगे| यानि वर्ष भर आपकी माता के साथ संबंध बहुत अच्छे रहने वाले है| उसके अलावा आपके भाई बहनों के साथ कुछ उत्तार चढाव आपके रिश्ते में देखने को इस साल मिलेगा यानि जब गुरु पहले आपके कर्म स्थान पराकर्म स्थान में बैठा है विराजित है आपके भाई बहनों के साथ उसका रिश्ता अच्छा होगा| परन्तु जब वो नीच का होकर मकर राशि में यानि वो चतुर्थ घर में जाकर प्रवेश करेगा 30 मार्च से तो उसके बाद स्थितिया बदलेगी वो जो दो तीन महीने है उस समय आपके भाई बहनों के साथ आपके संबंधो में थोडी सी मधुरता कम और गलतफैमिया ज्यादा होगी और आप जो भी कहेंगे उसका उल्टा असर आपके भाई बहनों के दिमाग पर पड़ेगा उनको ये लगेगा की ये हमेशा हमको टोक रहे है या कह रहे है मतलब वो विपरीत तरीके से आपके बारे में सोचेंगे परन्तु स्थितिया बहुत लंबी ये नही चलने वाली है जलाई से वापस जब राहू वापस से धनु राशि में आयेंगा तब समय और भी अधिक आपके पक्ष में होगा| और भाई बहन आपकी भावनाओ को समझेंगे और आपके साथ वापस से उनका रिश्ता अच्छा हो जायेगा| इसके अलावा पैतृक सम्पति थी जब हम बात करे तो पैतृक सम्पति के मामलो में आपको विशेष सफलता हासिल इस साल हो सकती है| यदि कोई आपके पैतृक सम्पति सम्बन्धी कोई विवाद है, कोई आप चा रहे है की आपके माता पिता आपकी पक्ष करे| आपको पैतृक सम्पति प्रदान करे| कोई जमीन जायदाद को लेकर कोई मन मुटाव आपके परिवार में यदि है तो आप किसी की मध्यस्था से उसे इस साल सुलझा लेंगे| या फिर कोई कोर्ट में कोई लंबित मामला पैतृक सम्पति से सम्बंधित पड़ा है तो उसमे भी आपके पक्ष में इस साल फैसला आएगा| क्युकी राहू की स्थिति बदल रही है| और साथ में केतु की भी स्थिति बदल रही है| जो की सितम्बर के अंत से दिसम्बर तक ये स्थिति रहेगी इस समय के दौरान आप अपने पैतृक मामलो को सुलझा सकते है| उसमे आप सफलता हासिल कर सकते है| संतान पक्ष की और से ये साल बहुत अच्छा रहेगा| पूरी की पूरी संतान आपकी मदद करती हुई आपके सभी कार्यो में भी आपको शारीरिक भी, मानसिक भी हर तरह से सहयोग करती हुई नज़र आएँगी| क्युकी शनि स्वग्रही होकर बैठे है और पंचम भाव का मालिक भी शनि ही है| तो ये पूरा का पूरा आपको अच्छे परिणाम प्रदान करेगा| 

2) आर्थिक स्थिति : आर्थिक स्थिति की दृष्टि से हम देखे तो ये साल आपके लिये शुरुआत में अच्छा नही जायेंगा| आर्थिक उत्तार चढाव का आपको सामना करना पड़ेगा| पैसे की समस्या आपकी उस समय थोड़ी सी डावाडोल होगी| क्युकी कारोबार में भी कुछ उत्तार चढाव की स्थितिया आएँगी| इससे आपको कुछ निवेश इधर उधर करना पड़ेगा| और उस वजह से आपकी आर्थिक स्थिति डावाडोल हो सकती है| परन्तु साल के मध्य में स्थिति मजबूत होगी| और धीरे धीरे आपकी आर्थिक स्थिति में सुधार होता चला जायेंगा| आपके पैसे की समस्या दूर होगी और उसमे मजबूती आएँगी| और आप अपने आपको शक्तिशाली और विश्वास से भरे महसूस करेंगे| कार्य क्षेत्र में भी अच्छा प्रदर्शन होगा और उस वजह से आपके लाभ की स्थिति अच्छी बनेगी| साल के अंत में कोई विदेशी कम्पनियों से आपको बड़े कार्य मिलने की उम्मीद बनी हुई है| यदि आप कृषि से जुड़े कोई काम करते है, कोई शोध से जुड़े कार्य करते है तो उसमे विशेष रूप से आपको साल के अंत में यानि नवम्बर, दिसम्बर का जो समय है उस समय आपको अच्छी सफलता हासिल होंगी| और आपके लाभ की स्थिति बहुत ही अच्छी बनेगी उस समय आप शेयर बाज़ार में भी निवेश कर सकते है| यदि उस समय आप शेयर बाज़ार में निवेश करते है या आप लॉटरी का कोई शौक रखते है और उसमे निवेश करना चाहते है तो उसमे भी निवेश कर सकते है उसमे आपको सकारात्मक परिणाम मिलेंगे| 

3) कारोबार और व्यवसाय : कारोबार और व्यवसाय की दृष्टि से ये साल यदि हम देखे तो ये साल आपके लिये मिलेजुले परिणामो वाला रहेगा| साल के प्रारंभ में जितनी आप चाह रहे है उतनी उन्नति नही होगी| आपको मेहनत अधिक करनी पड़ेगी और उस मेहनत का फल परिणाम आपको कम मिलेगा| इससे थोड़ी सी निराशा आपके मन में साल के शुरुआत में रह सकती है| परन्तु साल के मध्य आते आते यानि मार्च, अप्रैल आते आते स्थितिया सुधरेंगी लाभ की स्थिति अच्छी बनेगी| और कारोबार में भी आपको अच्छा लाभ देखने को मिलेगा| नये नये सौदे आप करेंगे| कारोबार को नई ऊचाईयो पर ले जायेंगे| यदि आप नौकरी पेशा व्यक्ति है तो इस समय आपके स्थानान्तरण के योग बने हुए है| सरकारी नौकरी में है तो स्थानान्तरण होगा| और प्राइवेट कंपनी से आपको कोई कार्य के जरिये विदेश में भी जाने का मौका मिल सकता है| कुछ समय के लिये महीने दो महीने, तीन महीने, छ महीने के लिये आप विदेश में उस कंपनी के प्रतिनिधि बन कर आप वहा पर जाकर व्यवसाय अपना कार्य कर सकते है अपनी जॉब कर सकते है| तो ये तो थी कारोबारियों और व्यवसायों की बात करियर के हिसाब से ये साल कैसा रहने वाला है तो करियर के हिसाब से हम देखे तो ये साल पूरा का पूरा आपके लिये अच्छा जायेंगा| आपको अपने करियर में नई ऊचाईयां छुने को मिलेगी| यदि आप आर्किटेक्चर से जुड़े कोई काम करते है| कोई नक्शों के बनाने से जुड़े, भूगर्भ शास्त्र से जुड़े यदि कोई कार्य करते है तो आपको अच्छे लाभ की स्थितिया बनती है| आप उसमे कोशिश कर सकते है| वही सरकारी नौकरी में भी आप कोशिश कर सकते है| व्याख्याता के लिये आप कोशिश कर सकते है चिकित्सा क्षेत्र में आप जा सकते है यदि आप दवाइयों से जिदे कोई काम करते है| चाहे वो ऑनलाइन हो चाहे आप कोई दुकान खोले दवाइयों से जुड़े यदि कोई आप फ़ार्मेसी का काम करते है तो आपके लिये वो भी लाभदायक सिद्ध होता है| तो ये व्यवसाय आपको अपने करियर में नई उचाईंयां पर ले जायेंगे आपके भविष्य को उज्ज्वल बनायेंगे यानि आने वाले साल में आप इन कार्यो में कोशिश कर सकते है| साल का अतं बहुत अच्छा जाने वाला है| लाभ की स्थितियों में वृद्धि होगी| आपकी स्थिति मान सम्मान और प्रतिष्ठा वृद्धि होगी| कारोबार में एक अच्छे मुकाम को हासिल करेंगे| और जॉब में भी आप नियमित होते हुए नज़र आयेंगे आपका पद आपकी गरिमा को बढ़ाएगा और आप अच्छी सफलता इस समय हासिल करेंगे| 

4) जीवनसाथी और प्रेमप्रसंग : जीवनसाथी और प्रेमप्रसंगो के मामलो में हम देखे तो ये साल आपके लिये अच्छा जाने वाला है| खासकर अप्रैल, मई, जून के ये जो तीन महीने बीच के है उस समय वो आपके रिश्तो में बहुत अधिक मधुरता लायेगा| यदि आप उस समय अविवाहित है| और विवाह की इच्छा रख रहे है विवाह के योग्य है तो इस समय सही जीवनसाथी मिलने के पुरे पुरे योग बने हुए है| इस समय आपको कोशिश अवश्य करनी चाहिए| आपको इस समय के दौरान सचेत हो जाना है यदि आपके पास अच्छा अवसर आता है आपके पास में अच्छे संबंध आते है तो आपको उस समय एक अच्छा जीवनसाथी मिलने की संभावना है| वही साल के अंत में दाम्पत्य जीवन में मधुरता बढ़ेगी कही आप कोई बड़ी यात्रा पर भी जा सकते है कोई प्रेम भरी गुमने की जगह पर भी जा सकते है या फिर कोई छोटी यात्रा भी आप ने जीवनसाथी के साथ अपनी सुविधा अनुसार सोच सकते है| वही प्रेम संबंधो में देखू तो ये साल आपके लिये पूरा का पूरा ठीक जायेगा यानि साल की शुरुआत हम छोड़ दे तो उस समय कुछ मनमुटाव, गलतफेमिया हो सकती है| परन्तु साल के मध्य में यदि आप किसी को प्रेम का इजहार करना चाहते है तो वो आपके इजहार को नही ठुकरायेंगा और आपको मनपसंद जीवनसाथी मिल सकता है| आप अपने प्रेम के रिश्ते में साल के अंत में आगे बढ़ते हुए दिखाई देंगे| और उसके प्रति गम्भीर भी आप दिखाई देंगे| हो सकता है आप लोग साल के अंत में आप विवाह की परिणिती में बंध जाये| तो आप इस साल को हलके में नही ले और बहुत ही महत्वपूर्ण और निर्णायक आपके जीवन के हिसाब से ये साल सिद्ध हो सकता है तो इस अवसर को प्राप्त करे| अच्छे जीवन साथी का चुनाव करे यदि आप दाम्पत्य जीवन में बंधे हुए है| तो आपके रिश्तो में मधुरता बढ़ेगी आपके बीच के सामंजस्य में इजाफा होगा| 

4) शिक्षा और स्वास्थ्य : शिक्षा और स्वास्थ्य की दृष्टि से यदि में देखू तो सबसे पहले तो शिक्षा की दृष्टि से विज्ञानं वर्ग के छात्रों को बहुत अच्छी उन्नति आपको इस साल देखने को मिलेगी| विज्ञानं वर्ग के जो छात्र है वे अपने कार्य में बहुत अच्छी उपलब्धि प्राप्त करेंगे| और अपने कार्य में आगे बढ़ते हुए दिखाई देंगे| खासकर विज्ञानं वर्ग के छात्रों के लिये ये साल बहुत अच्छा जाने वाला है| आप जो भी काम करेंगे उसमे आपको अच्छे लाभ की स्थितिया बनेगी आपको कोई मैडल भी कार्य में मिल सकता है| विज्ञानं परियोजना का प्रतिनिधित्व करते हुए आप अपने स्कूल को या अपने महाविद्यालय का प्रतिनिधित्व करेंगे| और आप भारत में या भारत के बाहर दुसरे देशो में अपना अच्छा नाम करते हुए दिखाई देंगे| वही आप उच्च शिक्षा से जुड़ना चाहते है तो आपको इंजीनियरिंग की, चिकित्सा के क्षेत्र, विज्ञानं से जुड़े कोई भी काम शोध कार्य, वैज्ञानिक, साइंटिस्ट से सम्बंधित कोई भी कार्यो में यदि आप उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे है| तो उसमे भी आपको अच्छी उपलब्धिया देखने को मिलेगा ये साल पूरा का पूरा आपके लिये अच्छा जाने वाला है| आपको कई अटकने की जरूरत नही है| साल के मध्य में अच्छी मेहनत करे| थोडा सा साल के जुलाई से लेकर सितम्बर तक का समय जो होगा वो थोडा सा आपके लिये परेशानी भरा रहेगा| उस समय आप थोडी सी मेहनत को बढ़ाये और अपने कर्म क्षेत्र में आगे बढे|

Tuesday, 10 March 2020

जो एक बार कर जाये वो खुश हो जाये || Holi Ke Chamatkari Upay ॥ Holi 2020 || लाल किताब के टोटके by Acharya Mukesh


होली के त्योहार टोने-टोटके और तांत्रिक विद्या के लिए बहुत ही शुभ माना जाता है। इसलिए इस दिन कोई भी उपाय करने से आपकी हर मनोकामना पूर्ण हो जाती है। अगर आपको किसी भी तरह की कोई समस्या हो या फिर आपको कोई ऐसी बीमारी से जिससे आपको निजात नहीं मिल पा रहा हो। जानिए किन उपायों को करने से आपको सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाएगी। साथ ही बिगड़ा हर काम पूर्ण हो जाएगा।


होली के दिन लोग कई तरह के टोटकों का प्रयोग करते हैं लेकिन गलती हो जाने पर वह टोटका मनचाहा लाभ नहीं दे पाता। पेश है आपके लिए कुछ बेहद साधारण लेकिन अचूक उपाय जो आप सरलतापूर्वक कर सकते हैं और इन्हें करने के लिए आपको कोई विशेष प्रयास भी नहीं करने होंगे।


मनचाहे वरदान के लिए होली के दिन हनुमान जी को पांच लाल पुष्प चढ़ाएं, मनोकामना शीघ्र पूरी होगी।

होली की सुबह बेलपत्र पर सफेद चंदन की बिंदी लगाकर अपनी मनोकामना बोलते हुए शिवलिंग पर सच्चे मन से अर्पित करें। किसी मंदिर में शंकर जी को पंचमेवा की खीर चढ़ाएं, मनोकामना पूरी होगी।

मनचाही नौकरी पाना हो तो होली की रात बारह बजे से पहले एक दाग रहित बड़ा नींबू लेकर चौराहे पर जाएं और उसकी चार फांक कर चारों कोनों में फेंक दें। फिर वापिस घर जाएं किंतु ध्यान रहे, वापिस लौटते समय पीछे मुड़कर न देखें। यह उपाय श्रद्धापूर्वक करें, शीघ्र ही रोजगार प्राप्त होगा।

व्यापार में लाभ के लिए होली के दिन गुलाल के एक खुले पैकेट में एक मोती शंख और चांदी का एक सिक्का रखकर उसे नए लाल कपड़े में लाल मौली से बांधकर तिजोरी में रखें, व्यवसाय में लाभ होगा।

होली के अवसर पर एक एकाक्षी नारियल की पूजा करके लाल कपड़े में लपेट कर दुकान में या व्यापार स्थल पर स्थापित करें। साथ ही स्फटिक का शुद्ध श्रीयंत्र रखें। उपाय निष्ठापूर्वक करें, लाभ में दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि होगी।




1.अगर आपकी कुंडली में शनि दोष है तो इस दिन ये उपाय कर आप पवनपुत्र हनुमान की कृपा पा सकते है। जिससे आप शनि दोष के प्रभाव को कम कर सकते है। इसके लिए होली के दिन एक काला कपड़ा लें और इसमें थोड़ी काली उड़द की दाल व कोयला डालकर एक पोटली बना लें। इसमें एक रुपए का सिक्का भी रखें। इसके बाद इस पोटली को अपने ऊपर से उतार कर किसी नदी में प्रवाहित कर दें और फिर किसी हनुमान मंदिर में जाकर राम नाम का जप करें। इससे आपको फायदा मिलेगा।

2. अगर आप चाहते है कि आपके घर में कभी किसी भी चीज की कमी न हो तो इसके लिए होली जिस स्थान पर जलाई जाती है। उस जगह पर एक दिन पहले की रात में एक मटकी में गाय का घी, तिल का तेल, गेहूं और ज्वार तथा एक तांबे का पैसा रखकर मटकी का मुंह बंद करके गाड़ आएं। इसके बाद जब होली जल जाएं उसके दूसरे दिन सुबह उसे उखाड़ लाएं। फिर यह सारी वस्तुएं पोटली में बांधकर जिस जगह रख दी जाएगी वहां समृद्धि रूक जाएगी।

3. अगर आपके घर में हमेशा कोई न कोई परेशानी बनी रहती है। या फिर घर के किसी सदस्य को भयानक सपने आते हो या फिर आप डर जाते है तो होली के दिन गायत्री मंत्र का जाप करना आपके लिए लाभकारी साबित हो सकता है। इसके लिए सबसे पहले होली वाली रात को अपने घर के मंदिर में अगरबत्ती और दीपक जला लें। फिर शुद्ध आसान पर बैठें, अपने सामने गंगाजल रख लें, फिर गायत्री मंत्र से उस जल को अभिमंत्रित करके पूरे घर में छिड़क दें। घर में शांति हो जाएगी। अगर ऐसा लग रहा हो कि घर में प्रेत बाधा है तो इस मंत्र की 11 माला से जल अभिमंत्रित करके पूरे घर में जल छिड़क दें।

मंत्र
प्रनवउ पवन कुमार खाल बन पावक ज्ञान धन।
जासु हृदय आगार बसहि राम सर चाप धर।।

4. अगर आपके घर में कोई लंबे समय से बीमार है। जिसको की भी दवा काम नहीं कर रही है तो होली की रात में सफेद कपड़े में 11 गोमती चक्र, नागकेसर के 21 जोड़े तथा 11 धनकारक कौड़ियां बांधकर कपड़े पर हरसिंगार तथा चंदन का इत्र लगाकर रोगी पर इन सब चीजों को सात बार उतारकर किसी शिव मन्दिर में अर्पित करें। व्यक्ति तुरन्त स्वस्थ होने लगेगा। यदि बीमारी गंभीर हो, तो यह शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार से आरंभ कर लगातार 7 सोमवार तक किया जा सकता है।

5. अगर आप आर्थिक समस्याओं से परेशान है। हर काम में आपको असफलता हाथ लग रही है तो होली वाले दिन इस उपाय को करके आप अपना भाग्य बदल सकते है। इसके लिए जिस स्थान पर होलिका जलने वाली हो, उस स्थान पर गड्ढा खोदकर अपने मध्यमा अंगुली के लिए बनने वाले छल्ले की मात्रा के अनुसार चांदी, पीतल व लोहा दबा दें। फिर मिट्टी से ढककर लाल गुलाल से स्वस्तिक का चिह्न बनाएं। जब आप होलिका पूजन को जाएं, तो पान के एक पत्ते पर कपूर, थोड़ी-सी हवन सामग्री, शुद्ध घी में डुबोया लौंग का जोड़ा तथा बताशे रखें।

एक दूसरे पान के पत्ते से उस पत्ते को ढक दें और सात बार परिक्रमा करते हुए 'ऊं नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जप करें। परिक्रमा समाप्त होने पर सारी सामग्री होलिका में अर्पित कर दें तथा पूजन के बाद प्रणाम करके घर वापस आ जाएं।

अगले दिन पान के पत्ते वाली सारी नई सामग्री ले जाकर पुनः यही क्रिया करें। जो धातुएं आपने दबाई हैं, उनको निकाल लाएं। फिर किसी सुनार से तीनों धातुओं को मिलाकर अपनी मध्यमा अंगुली के माप का छल्ला बनवा लें। 15 दिन बाद आने वाले शुक्ल पक्ष के गुरुवार को छल्ला धारण कर लें। जब तक आपके पास यह छल्ला रहेगा, तब तक आप कभी भी आर्थिक संकट में नहीं आएंगे !

Acharya Mukesh
Astro Nakshatra 27

Monday, 13 January 2020

नीच एवं अशुभ सूर्य को शुभ करने का महा-उपाय आचार्य मुकेश के द्वारा


वैदिक ज्योतिष सूर्य-पूजा एवं गायत्री-हवन का सुझाव मुख्य रूप से किसी कुंडली में अशुभ रूप से कार्य कर रहे सूर्य की अशुभता को कम करने के लिए, अशुभ सूर्य द्वारा कुंडली में बनाए जाने वाले किसी दोष के निवारण के लिए अथवा किसी कुंडली में शुभ रूप से कार्य कर रहे सूर्य की शक्ति तथा शुभ फल बढ़ाने के लिए देता है। 

यदि आपकी कुंडली में सूर्य नीच अथवा अशुभ हैं या अशुभ सूर्य की दशा चल रही हो आपके लिए 15 जनवरी से अच्छा दिन हो ही नहीं सकता। मकर संक्रांति के दिन अपने घर में एक छोटे से हवन का आयोजन करें और सपरिवार मिलकर गायत्री मन्त्रों से सूर्य के शुभ प्रभाव हेतु संकल्प लेकर हवन करें। हवन करना न भी आये तो सामान्य तरीके से यथाशक्ति हवन करें !

मकर-संक्रांति के दिन सूर्य अपने पुत्र शनि के घर पधारते हैं। अतः आज  के दिन सूर्य हवन से सूर्य देव विशेष रूप से  प्रसन्न होते हैं और जातक को अपनी शुभता का वरदान भी देते हैं।

यदि यज्ञ की व्यवस्था न हो तो गैस जला कर उस पर तवा रख कर गर्म करें, फ़िर मन्त्र पढ़ते हुए यज्ञ की आहुति तवे पर डाल दें। यज्ञ के बाद गैस बन्द कर दें और उस यज्ञ प्रसाद को तुलसी या किसी पौधे के गमले में डाल दें।
हवन 

नारदपुराण के अनुसार हवन के बिना कोई भी पूजा अधुरी मानी जाती है। आज विधि की जानकारी के अभाव में अक्सर लोग मंत्रों के बिना ही यह हवन करते हैं।

अब बात करते हैं दैनिक हवन विधि का जिसका उपयोग आप स्वयं भी कर सकते हैं। सबसे पहलेपूजा के बाद एक पात्र (कड़ाही या मिट्टी के बर्तन) में अग्नि स्थापना करें। उसमें आम की लकड़ी व कपूर रखकर जला दें।

फिर पूरब दिशा की ओर मुंह करके बैठ जाये ! शुभ कार्यों के लिए हमारे हिंदू धर्म में पूर्व दिशा और उत्तर दिशा को शुभ माना गया है ! हवन करने के लिए हमें पूर्व दिशा या उत्तर दिशा की ओर मुंह कर बैठ जाना होगा !


ओं भूर्भुव: स्वः ।।
इस मंत्र का उच्चारण करके अग्नि जला अगले मंत्र से आह्वाहन करे। वह मंत्र यह है-

ओं भूर्भुवः स्वर्धौरिव भूम्ना पृथिवीव वरिम्णा ।
तस्यास्ते पृथिवी देवयजनि पृष्ठेऽग्निमन्नादमन्नाधायादधे ।।

ओम् उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टापूर्ते संसृजेथामयं च ।
आस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन् विश्वे देवा यजमानश्च सीदत ।।

इस मंत्र से जब अग्नि समिधाओं में प्रविष्ट होने लगे तब तीन लकड़ी आठ-आठ अंगुल की घृत में डूबो उनमें से नीचे लिखे एक-एक मंत्र से एक-एक समिधा को अग्नि में चढ़ावें। वे मंत्र ये हैं -

इस मंत्र से एक समिधा अग्नि में चढ़ाएं :-

ओम् अयं त इध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वर्धस्व चेद्ध वर्धय चास्मान् प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन समेधय स्वाहा ।

इदमग्नये जातवेदसे-इदं न मम् ।

इससे और अगले अर्थात् दोनों मन्त्रों से दूसरी समिधा अग्नि में चढ़ावें :-

ओं समिधाग्निं दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथिम् ।
आस्मिन् हव्या जुहोतन, स्वाहा ।।

इस मंत्र से तीसरी समिधा अग्नि में चढ़ावें :-

ओं तं त्वां समिदि्भरड़ि्गरो घृतेन वर्द्धयामसि ।
बृहच्छोचा यविष्ठय स्वाहा ।। 

इदमग्नयेऽड़ि्रसे-इदन्न मम ।।


जलप्रोक्षण-मन्त्र

ओम् आदितेऽनुमन्यस्व । इससे पूर्व दिशा में
ओम् अनुमतेऽनुमन्यस्व । इससे पश्चिम दिशा मे
ओं सरस्त्वयनुमन्यस्व । इससे उत्तर दिशा मे जल छिड़कें ।
तत्पश्चात अंजलि में जल लेके वेदी के पूर्व दिशा आदि चारों ओर छिड़कें । 

इसके मंत्र है :-
ओं देव सवित: प्रसुव यज्ञं प्रसुव यज्ञोपतिं भगाय ।
दिव्यो गन्धर्व: केतपू: केतं न: पुनातु वाचस्पतिर्वाचं न: स्वदतु ।।

                         

शुद्ध देशी घी का प्रयोग करें। उसके बाद निम्न मंत्रों से हवन शुरू करें:

ऊं आग्नेय नम: स्वाहा (ओम अग्निदेव ताम्योनम: स्वाहा),
ऊं गणेशाय नम: स्वाहा 11 आहुति
ऊं गौरियाय नम: स्वाहा, 
ऊं वरुणाय नम: स्वाहा, 
ऊं सूर्यादि नवग्रहाय नम: स्वाहा, 
ऊं दुर्गाय नम: स्वाहा, 
ऊं महाकालिकाय नम: स्वाहा
ऊं हनुमते नम: स्वाहा, 
ऊं भैरवाय नम: स्वाहा, 
ऊं कुल देवताय नम: स्वाहा, 
ऊं स्थान देवताय नम: स्वाहा 
ऊं ब्रह्माय नम: स्वाहा, 
ऊं विष्णुवे नम: स्वाहा, 
ऊं शिवाय नम: स्वाहा.

अब सूर्य के लिए हवन 24 या 108  गायत्री-मंत्र के साथ स्वाहा लगाकर करें ! 


‘ऊँ भूर्भव स्व: तत्सवितुर्वरेण्यम् भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात।’ स्वाहा :


इदं गायत्री इदं न मम् !!


इसके पश्चात 


ऊं जयंती मंगलाकाली भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा शिवाधात्री स्वाहा, स्वधा नमस्तुति स्वाहा:, 

ओम ब्रह्मामुरारी त्रिपुरांतकारी भानु: क्षादी: भूमि सुतो बुधश्च: गुरुश्च शक्रे शनि राहु केतो सर्वे ग्रहा शांति कर: स्वाहा:,

ओम गुर्रु ब्रह्मा, गुर्रु विष्णु, गुर्रु देवा महेश्वर: गुरु साक्षात परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नम: स्वाहा !


उपरोक्त मंत्रो का जप करने के बाद नारियल में हवन की बची सामग्री डाल ,कलावा बांधकर उसे अग्नि में समर्पित कर दें, इस विधि को वोलि कहते हैं। फिर पूर्ण आहूति के रूप में नारियल, घी, लाल धागा, पान, सुपारी, लौंग, जायफल आदि स्वाहा करें।

स्विष्टकृतहोम:- चमच्च में मीठा और घी लेकर अग्निदेव को अर्पित करें।



पूर्णाहुति मंत्र: गड़ी गोला काट कर उसमें बची हवन सामग्री,घी, पान पत्ता , सुपारी इत्यादि डाल ये मंत्र बोलते हुए अर्पित करें:-




वसोरधारा:-
इस मंत्र से घी नीचे से ऊपर धार बनाते हुए गोले पर डाल दें:-


अब अंत में पानी की सहायता से आचमनी करेंगे ! जो कि कम से कम तीन बार होनी चाहिए ! आचमनी करने के लिए पानी को आम के पत्ते से लेकर तीन बार हवन के ऊपर से घुमा कर बगल में गिरा देंगे. यह प्रक्रिया तीन बार करेंगे उसके बाद हमारी हवन की प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है.

आचार्य मुकेश

Monday, 6 January 2020

क्या आप भी हैं संतान सुख से वचिंत ? करें भगवान् विष्णु का महाव्रत "पुत्रदा एकादशी" व्रत /पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत कथा, मुहूर्त एवं पूजा विधि

06 जनवरी 2020
सोमवार
एकादशी व्रत कथा व महत्व के बारे में तो सभी जानते हैं। हर मास की कृष्ण व शुक्ल पक्ष को मिलाकर दो एकादशियां आती हैं। यह भी सभी जानते हैं कि इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है।


नि:संतान दंपत्ति के लिए पौष पुत्रदा एकादशी व्रत काफी लाभदायक बताया गया है। है। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत से योग्य संतान की प्राप्ति होती है और मृत्यु के बाद स्वर्ग मे स्थान प्राप्त होता है। पुत्रदा का तात्पर्य सिर्फ पुत्र से नहीं अपितु आपकी संतान से है , अतः जिस दम्पति की पहले से संतान है उन्हें भी संतान की सकुशलता एवं सम्पन्नता हेतु ये व्रत अवश्य ही करना चाहिए
पुत्रदा एकादशी व्रत रखने वाले व्यक्ति को दशमी के दिन लहसुन, प्याज आदि नहीं खाना चाहिए। पुत्रदा एकादशी के दिन सुबह स्नान कर 
‘मम समस्तदुरितक्षयपूर्वकंश्रीपरमेश्वर 
प्रीत्यर्थं श्रावणशुक्लैकादशीव्रतमहं करिष्ये' 
का संकल्प करके पूजन और उपवास करना चाहिए। भगवान विष्णु और विशेषकर बाल गोपाल रूप की पूजा करनी चाहिए। द्वादशी को भगवान विष्णु को अर्घ्य देकर पूजा सम्पन्न करनी चाहिए। 

पुत्रदा एकादशी तिथि व मुहूर्त

पुत्रदा एकादशी एकादशी व्रत तिथि – 6 जनवरी 2020

एकादशी तिथि प्रारम्भ - जनवरी 6, 2020 को 03:06 बजे
एकादशी तिथि समाप्त - जनवरी 7, 2020 को 04:02 बजे

पुत्रदा एकादशी व्रत व पूजा विधि

नारदपुराण के अनुसार, जातक ब्रह्म मुहूर्त में स्नान आदि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लें। इसके बाद घट स्थापना करें और उसके ऊपर भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर रखें और गंगाजल के छींटे दें। भगवान की तस्वीर या मूर्ति पर रोली और अक्षत से तिलक करें और सफेद फूल चढ़ाएं। इसके बाद घी का एक दीपक जलाएं और उनकी आरती उतारें। इसके बाद उनका भोग लगाएं। फिर ब्राह्मण को भोजन कराकर दान व दक्षिणा देते हैं। इस दिन किसी भी एक समय फलाहार किया जाता है।


आचार्य मुकेश के अनुभवों के आधार पर कुछ सुझाव:


एकादशी के व्रत की तैयारी दशमी तिथि को ही आरंभ हो जाती है। उपवास का आरंभ दशमी की रात्रि से ही आरंभ हो जाता है। इसमें दशमी तिथि को सायंकाल भोजन करने के पश्चात अच्छे से दातुन कुल्ला करना चाहिये ताकि अन्न का अंश मुंह में शेष न रहे। इसके बाद रात्रि को बिल्कुल भी भोजन न करें। अधिक बोलकर अपनी ऊर्जा को भी व्यर्थ न करें। रात्रि में ब्रह्मचर्य का पालन करें। एकादशी के दिन प्रात:काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सबसे पहले व्रत का संकल्प करें। नित्य क्रियाओं से निपटने के बाद स्नानादि कर स्वच्छ हो लें। भगवान का पूजन करें, व्रत कथा सुनें। दिन भर व्रती को बुरे कर्म करने वाले पापी, दुष्ट व्यक्तियों की संगत से बचना चाहिये। रात्रि में भजन-कीर्तन करें। जाने-अंजाने हुई गलतियों के लिये भगवान श्री हरि से क्षमा मांगे। द्वादशी के दिन प्रात:काल ब्राह्मण या किसी गरीब को भोजन करवाकर उचित दान दक्षिणा देकर फिर अपने व्रत का पारण करना चाहिये। इस विधि से किया गया उपवास बहुत ही पुण्य फलदायी होता है।


एकादशी करते हों तो ध्यान रखें कुछ बातों का :

🚫1. एकादशी के दिन सुबह दातुन या ब्रश न करें!नींबू, जामुन या आम के पत्ते लेकर चबा लें और अंगुली से कंठ साफ कर लें, वृक्ष से पत्ता तोड़ना भी ‍वर्जित है। अत: स्वयं गिरा हुआ पत्ता लेकर सेवन करें। * यदि यह संभव न हो तो पानी से बारह बार कुल्ले कर लें।

🚫2. एकादशी के दिन झाड़ू पोछा इत्यादि बिलकुल न करें! क्योंकि चींटी आदि सूक्ष्म जीवों की मृत्यु का भय रहता है।

🚫3. एकादशी के दिन तुलसीदल न तोड़ें, भगवन को भोग लगाने हेतु एक दिन पहले ही तोड़ कर रख लें।

🚫4. अगर घर में दक्षिणावर्ती शंख हो तो उसमे जल लेकर भगवान शालिग्राम को स्नान करवाएं, या पंचामृत से स्नान करवाएं!इस से सारे पाप उसी समय नष्ट हो जाते हैं तथा माता लक्ष्मी के साथ भगवान् हरि भी अति प्रशन्न होते हैं।

🚫5.एकादशी के दिन भगवान् श्री हरि को पीली जनेऊ अर्पित करें। पान के पत्ते पर एक सुपारी, लौंग, इलायची, द्रव्य, कपूर, किसमिस तुलसीदल के साथ इत्यादि अर्पित करें, साथ ही ऋतुफल भी अर्पित करें! एक तुलसीदल भगवान् पर भी चढ़ाएं पर रात्रि में उसे हटाना न भूले।

🚫6.एकादशी के दिन सुबह संकल्प लें, मन में मनोकामना करते हुए श्री हरि से व्रत में रहने का संकल्प करें!

🚫7. एकादशी के दिन रात्रि जागरण का विशेष महत्व है, कोशिश करें की इस एकादशी जरूर जागरण करें, इस से व्रत फल 100 गुणा बढ़ जाता है!

🚫8. एकादशी के दिन चावल भूल से भी न छुएं, न ही घर में चावल बनें, इस दिन चावल खाने से बेहद नकरात्मक फल प्राप्त होते हैं, भाग्य खंडित होता है! एकादशी (ग्यारस) के दिन व्रतधारी व्यक्ति को गाजर, शलजम, गोभी, पालक, इत्यादि का सेवन नहीं करना चाहिए। * केला, आम, अंगूर, बादाम, पिस्ता इत्यादि अमृत फलों का सेवन करें। * प्रत्येक वस्तु प्रभु को भोग लगाकर तथा तुलसीदल छोड़कर ग्रहण करना चाहिए।

🚫9. एकादशी के दिन कम से कम बोलें, पापी लोगों से बात न करें, जिनके मन में लालच, पाप या कोई भी अनैतिक तत्व दिखे कम से कम इस दिन उन सभी से दूर रहने का प्रयत्न करें! परनिंदा से बचें!

🚫10.श्री हरि की विशेष कृपा हेतु ॐ नमो भगवते वासुदेवाय की 11 माला सुबह और 11 माला शाम में करें, साथ ही विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ जरूर करें! एकादशी व्रत कथा कहे या सुनें।

🚫11. शाम में केले के पेड़ के नीचे एवं तुलसी में दीपक जलाना न भूले, इसे दीप-दान कहते हैं!

🚫12. माता लक्षमी के बिना विष्णु अधूरे हैं इसलिए माता की भी आरती अवश्य करें, सुबह और शाम शंखनाद एवं घंटियों की ध्वनि में ॐ जय जगदीश हरे की आरती करना न भूले!

🚫13. एकादशी के दिन केले के पेड़ की 7 परिक्रमा करने से धन में बढ़ोतरी होती है!

🚫14. व्रत पंचांग के समयानुसार ही खोलें अन्यथा लाभ की जगह नुक्सान भी हो सकता है, व्रत एवं पूजा के नियमों में करने से ज्यादा कुछ बातें जो हमे नहीं करनी चाहिए वो ही ज्यादा महत्व रखती है. अतः सावधानी से की गई पूजा सर्वश्रेष्ठ फल प्रदान करती है.

🚫15 .आज के दिन किसका त्याग करें- 

🍁मधुर स्वर के लिए गुड़ का। 
🍁दीर्घायु अथवा पुत्र-पौत्रादि की प्राप्ति के लिए तेल का। 🍁शत्रुनाशादि के लिए कड़वे तेल का। 
🍁सौभाग्य के लिए मीठे तेल का। 
🍁स्वर्ग प्राप्ति के लिए पुष्पादि भोगों का। 

प्रभु शयन के दिनों में सभी प्रकार के मांगलिक कार्य जहाँ तक हो सके न करें। पलंग पर सोना, भार्या का संग करना, झूठ बोलना, मांस, शहद और दूसरे का दिया दही-भात आदि का भोजन करना, मूली, पटोल एवं बैंगन आदि का भी त्याग कर देना चाहिए।


🚫16. दोनों ही दिन शाम में संध्या आरती कर दीपदान करें। अखंड लक्षमी प्राप्त होगी। पैसा घर में रुकेगा।

🚫17. शंख ध्वनि से भी माता लक्ष्मी के साथ भगवान् हरि भी अति प्रसन्न होते हैं। अतः पूजा के समय जरूर शंख का उपयोग करें । पूजा के पहले शुद्धिकरण मंत्र तथा आचमन करना न भूलें क्योंकि इसके बिना पूजा का फल प्राप्त नहीं हो पाता।

🚫18. तुलसी की विधिवत पूजा करके उसकी 7  परिक्रमा करें।


पुत्रदा एकादशी व्रत कथा

महाराज युधिष्ठिर ने पूछा- हे भगवान! आपने सफला एकादशी का माहात्म्य बताकर बड़ी कृपा की। अब कृपा करके यह बतलाइए कि पौष शुक्ल एकादशी का क्या नाम है उसकी विधि क्या है और उसमें कौन-से देवता का पूजन किया जाता है। 

भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्ण बोले- हे राजन! इस एकादशी का नाम पुत्रदा एकादशी है। इसमें भी नारायण भगवान की पूजा की जाती है। इस चर और अचर संसार में पुत्रदा एकादशी के व्रत के समान दूसरा कोई व्रत नहीं है। इसके पुण्य से मनुष्य तपस्वी, विद्वान और लक्ष्मीवान होता है। इसकी मैं एक कथा कहता हूँ सो तुम ध्यानपूर्वक सुनो।
भद्रावती नामक नगरी में सुकेतुमान नाम का एक राजा राज्य करता था। उसके कोई पुत्र नहीं था। उसकी स्त्री का नाम शैव्या था। वह निपुत्री होने के कारण सदैव चिंतित रहा करती थी। राजा के पितर भी रो-रोकर पिंड लिया करते थे और सोचा करते थे कि इसके बाद हमको कौन पिंड देगा। राजा को भाई, बाँधव, धन, हाथी, घोड़े, राज्य और मंत्री इन सबमें से किसी से भी संतोष नहीं होता था। 
वह सदैव यही विचार करता था कि मेरे मरने के बाद मुझको कौन पिंडदान करेगा। बिना पुत्र के पितरों और देवताओं का ऋण मैं कैसे चुका सकूँगा। जिस घर में पुत्र न हो उस घर में सदैव अँधेरा ही रहता है। इसलिए पुत्र उत्पत्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए। 

जिस मनुष्य ने पुत्र का मुख देखा है, वह धन्य है। उसको इस लोक में यश और परलोक में शांति मिलती है अर्थात उनके दोनों लोक सुधर जाते हैं। पूर्व जन्म के कर्म से ही इस जन्म में पुत्र, धन आदि प्राप्त होते हैं। राजा इसी प्रकार रात-दिन चिंता में लगा रहता था। 
एक समय तो राजा ने अपने शरीर को त्याग देने का निश्चय किया परंतु आत्मघात को महान पाप समझकर उसने ऐसा नहीं किया। एक दिन राजा ऐसा ही विचार करता हुआ अपने घोड़े पर चढ़कर वन को चल दिया तथा पक्षियों और वृक्षों को देखने लगा। उसने देखा कि वन में मृग, व्याघ्र, सूअर, सिंह, बंदर, सर्प आदि सब भ्रमण कर रहे हैं। हाथी अपने बच्चों और हथिनियों के बीच घूम रहा है। 
इस वन में कहीं तो गीदड़ अपने कर्कश स्वर में बोल रहे हैं, कहीं उल्लू ध्वनि कर रहे हैं। वन के दृश्यों को देखकर राजा सोच-विचार में लग गया। इसी प्रकार आधा दिन बीत गया। वह सोचने लगा कि मैंने कई यज्ञ किए, ब्राह्मणों को स्वादिष्ट भोजन से तृप्त किया फिर भी मुझको दु:ख प्राप्त हुआ, क्यों?

राजा प्यास के मारे अत्यंत दु:खी हो गया और पानी की तलाश में इधर-उधर फिरने लगा। थोड़ी दूरी पर राजा ने एक सरोवर देखा। उस सरोवर में कमल खिले थे तथा सारस, हंस, मगरमच्छ आदि विहार कर रहे थे। उस सरोवर के चारों तरफ मुनियों के आश्रम बने हुए थे। उसी समय राजा के दाहिने अंग फड़कने लगे। राजा शुभ शकुन समझकर घोड़े से उतरकर मुनियों को दंडवत प्रणाम करके बैठ गया। 
राजा को देखकर मुनियों ने कहा- हे राजन! हम तुमसे अत्यंत प्रसन्न हैं। तुम्हारी क्या इच्छा है, सो कहो। राजा ने पूछा- महाराज आप कौन हैं, और किसलिए यहाँ आए हैं। कृपा करके बताइए। मुनि कहने लगे कि हे राजन! आज संतान देने वाली पुत्रदा एकादशी है, हम लोग विश्वदेव हैं और इस सरोवर में स्नान करने के लिए आए हैं।

यह सुनकर राजा कहने लगा कि महाराज मेरे भी कोई संतान नहीं है, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो एक पुत्र का वरदान दीजिए। मुनि बोले- हे राजन! आज पुत्रदा एकादशी है। आप अवश्य ही इसका व्रत करें, भगवान की कृपा से अवश्य ही आपके घर में पुत्र होगा। 
मुनि के वचनों को सुनकर राजा ने उसी दिन एकादशी का ‍व्रत किया और द्वादशी को उसका पारण किया। इसके पश्चात मुनियों को प्रणाम करके महल में वापस आ गया। कुछ समय बीतने के बाद रानी ने गर्भ धारण किया और नौ महीने के पश्चात उनके एक पुत्र हुआ। वह राजकुमार अत्यंत शूरवीर, यशस्वी और प्रजापालक हुआ।

श्रीकृष्ण बोले- हे राजन! पुत्र की प्राप्ति के लिए पुत्रदा एकादशी का व्रत करना चाहिए। जो मनुष्य इस माहात्म्य को पढ़ता या सुनता है उसे अंत में स्वर्ग की प्राप्ति होती है।


पारण (व्रत तोड़ने का) समय एवं नियम 

वाँ जनवरी को, पारण (व्रत तोड़ने का) समय - 13:29 से 15:32

एकादशी के व्रत को समाप्त करने को पारण कहते हैं। एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण किया जाता है। एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति आवश्यक है। यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के बाद ही होता है। द्वादशी तिथि के भीतर पारण न करना पाप करने के समान होता है।

एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए। जो श्रद्धालु व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत तोड़ने से पहले हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि है। व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है। व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए। कुछ कारणों की वजह से अगर कोई प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं है तो उसे मध्यान के बाद पारण करना चाहिए।

कभी कभी एकादशी व्रत लगातार दो दिनों के लिए हो जाता है। जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब स्मार्त-परिवारजनों को पहले दिन एकादशी व्रत करना चाहिए। दुसरे दिन वाली एकादशी को दूजी एकादशी कहते हैं। सन्यासियों, विधवाओं और मोक्ष प्राप्ति के इच्छुक श्रद्धालुओं को दूजी एकादशी के दिन व्रत करना चाहिए। जब-जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब-तब दूजी एकादशी और वैष्णव एकादशी एक ही दिन होती हैं।






एकादशी - आरती 

ॐ जय एकादशी, जय एकादशी, जय एकादशी माता।
विष्णु पूजा व्रत को धारण कर, शक्ति मुक्ति पाता॥
ॐ जय एकादशी...॥

तेरे नाम गिनाऊं देवी, भक्ति प्रदान करनी।
गण गौरव की देनी माता, शास्त्रों में वरनी॥
ॐ जय एकादशी...॥

मार्गशीर्ष के कृष्णपक्ष की उत्पन्ना, विश्वतारनी जन्मी।
शुक्ल पक्ष में हुई मोक्षदा, मुक्तिदाता बन आई॥
ॐ जय एकादशी...॥

पौष के कृष्णपक्ष की, सफला नामक है।
शुक्लपक्ष में होय पुत्रदा, आनन्द अधिक रहै॥
ॐ जय एकादशी...॥

नाम षटतिला माघ मास में, कृष्णपक्ष आवै।
शुक्लपक्ष में जया, कहावै, विजय सदा पावै॥
ॐ जय एकादशी...॥

विजया फागुन कृष्णपक्ष में शुक्ला आमलकी।
पापमोचनी कृष्ण पक्ष में, चैत्र महाबलि की॥
ॐ जय एकादशी...॥

चैत्र शुक्ल में नाम कामदा, धन देने वाली।
नाम बरुथिनी कृष्णपक्ष में, वैसाख माह वाली॥
ॐ जय एकादशी...॥

शुक्ल पक्ष में होय मोहिनी अपरा ज्येष्ठ कृष्णपक्षी।
नाम निर्जला सब सुख करनी, शुक्लपक्ष रखी॥
ॐ जय एकादशी...॥

योगिनी नाम आषाढ में जानों, कृष्णपक्ष करनी।
देवशयनी नाम कहायो, शुक्लपक्ष धरनी॥
ॐ जय एकादशी...॥

कामिका श्रावण मास में आवै, कृष्णपक्ष कहिए।
श्रावण शुक्ला होय पवित्रा आनन्द से रहिए॥
ॐ जय एकादशी...॥

अजा भाद्रपद कृष्णपक्ष की, परिवर्तिनी शुक्ला।
इन्द्रा आश्चिन कृष्णपक्ष में, व्रत से भवसागर निकला॥
ॐ जय एकादशी...॥

पापांकुशा है शुक्ल पक्ष में, आप हरनहारी।
रमा मास कार्तिक में आवै, सुखदायक भारी॥
ॐ जय एकादशी...॥

देवोत्थानी शुक्लपक्ष की, दुखनाशक मैया।
पावन मास में करूं विनती पार करो नैया॥
ॐ जय एकादशी...॥

परमा कृष्णपक्ष में होती, जन मंगल करनी।
शुक्ल मास में होय पद्मिनी दुख दारिद्र हरनी॥
ॐ जय एकादशी...॥

जो कोई आरती एकादशी की, भक्ति सहित गावै।
जन गुरदिता स्वर्ग का वासा, निश्चय वह पावै॥

ॐ जय एकादशी...॥

आरती श्री जगदीशजी 

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी ! जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥
ॐ जय जगदीश हरे।

जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का।
स्वामी दुःख विनसे मन का।
सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥
ॐ जय जगदीश हरे।

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी।
स्वामी शरण गहूँ मैं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥
ॐ जय जगदीश हरे।

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी।
स्वामी तुम अन्तर्यामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥
ॐ जय जगदीश हरे।

तुम करुणा के सागर, तुम पालन-कर्ता।
स्वामी तुम पालन-कर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥
ॐ जय जगदीश हरे।

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
स्वामी सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति॥
ॐ जय जगदीश हरे।

दीनबन्धु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
स्वामी तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठा‌ओ, द्वार पड़ा तेरे॥
ॐ जय जगदीश हरे।

विषय-विकार मिटा‌ओ, पाप हरो देवा।
स्वमी पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ा‌ओ, सन्तन की सेवा॥
ॐ जय जगदीश हरे।

श्री जगदीशजी की आरती, जो कोई नर गावे।
स्वामी जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख संपत्ति पावे॥
ॐ जय जगदीश हरे।


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Sunday, 27 October 2019

इस दिवाली धन प्राप्ति हेतु माता लक्ष्मी की पोटली कैसे बनायें ? # ACHARYA MUKESH # DIWALI 2019



शास्त्रों में लक्ष्मी को चपला कहा गया है अर्थात धन की देवी कहीं टिकती नहीं है। पौराणिक व तंत्र शास्त्रों में धन की देवी की स्थिर रखने के लिए अनेक यत्न, प्रयास व अनुष्ठान बताए गए हैं। परंतु यह अनुष्ठान व प्रयास अत्यंत कठिन व ख़र्चीले हैं जिसे आज के व्यस्त समय में आम व्यक्ति के लिए करना लगभग असंभव जैसा है परंतु पौराणिक व तंत्र शास्त्रों में धन की देवी को अपने घर व प्रतिष्ठान में स्थिर रखने के लिए कुछ सरल उपाय व सामाग्री भी बताई गई है।

इस पोस्ट के द्वारा आचार्य मुकेश आपको बताते हैं की कैसे इस दुर्लभ सामाग्री को हम किस्मत की पोटली बनाकर धन की देवी लक्ष्मी को अपने घर व प्रतिष्ठान में कैसे बांधकर स्थिर कर सकते हैं। इस किस्मत की पोटली को चमत्कारिक वस्तुओं को एक साथ सम्मिलित कर निर्मित किया जा सकता है जो देवी महालक्ष्मी को अत्यधिक प्रिय हैं। भारतीय धर्मग्रंथों में ऐसा उल्लिखित है कि यदि देवी महालक्ष्मी का पूजन इन सामग्रियों के साथ तथा इनका उपयोग कर शास्त्र-सम्मत विधि से किया जाय तो सभी अभीष्ट अभिलाषाएं पूर्ण होती हैं।


   


                  महालक्ष्मी की पोटली कैसे बनायें ? 


इस पोटली को आपको दीपावली के दिन वृषभ लग्न के दौरान प्रदोष काल में ही बनाना है ! श्री गणेश और महालक्ष्मी के आह्वाहन के बाद षोड़ोपचार पूजन के बाद आपको एक लाल कपडे को लेना है अथवा कोई पोटली बाजार पहले से ही खरीद लें ! लक्ष्मी जी को विशेष प्रिय है रेशमी लाल वस्त्र जिसमें सारी सामाग्री बांधकर यह अद्भुत पोटली बनाई जाती है। पोटली के सामने एक पान का पत्ता रख लें !

पहले पत्ते पर ३ बार गंगा जल छिड़कें ! 
फिर थोड़ी रक्त-चन्दन  अर्पित करें !

            तत्पश्चात सबसे पहले एक चाँदी का सिक्का लें और उसे मौली से बांध लें !  फिर क्रमशः 

2 सुपारी ,
2 पीली हल्दी की गांठ , 
2  काली हरिद्रा यानि हल्दी ,
 11 गोमती -चक्र ,
 7 पीली कौड़ी , 
5 सफ़ेद कौड़ी, 
5 नागकेशर
 5 कमलगट्टे, 
5 काली - कौड़ी  
 तथा 21 अक्षत के दाने ( टूटी हुई वर्जित है ) को एक साथ रख लें !

 फिर कमलगट्टे की  माला से १ माला इस मंत्र का जाप करें :- 

ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै
 च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ॥




मंत्र जाप पश्चात इस पोटली को बांध लें तथा मस्तक से लगा माता लक्ष्मी के चरणों में अर्पित कर दें ! इस पोटली को शुभ महूर्त में घर की पूजा स्थल अथवा उत्तरपूर्व दिशा अथवा लक्ष्मी की दिशा उत्तर पश्चिम में रखना अति शुभफलदायक होता है। इसके घर में विशेष महूर्त में स्थापना से अकूट लक्ष्मी का वास होता है। वास्तु दोषों से मुक्ति मिलती है तथा धन की देवी सदा स्थिर रहती है। शरद पूर्णिमा, अक्षय तृतीया, दीपावली या कार्तिक पूर्णिमा को घर अथवा प्रतिष्ठान में इस पोटली को रखने से चिरकाल धन की प्राप्ति होती है, दुर्भाग्य दूर होता है तथा घर में धन, अन्न, स्वर्ण व आभूषण की वृद्धि होती है !

फिर इसे आरती और हवन इत्यादि के बाद अपनी तिज़ोरी या गल्ले जहाँ भी रखना चाहें रख लें ! कुछ ही दिनों में आप लक्ष्मी की स्थिरता का अनुभव करने लगेंगे इसमें कोई संदेह नहीं !

पोटली बनाने का समय : 
27 /10/2019
( स्थिर वृषभ  लग्न एवं स्वाति नक्षत्र) : शाम 18:42 से 20:37


पोटली - सामग्री:- 


1. पीली कौड़ी 



इस किस्मत की पोटली में पहला स्थान है प्राकृतिक पीली कौड़ी का इसे लक्ष्मी कौड़ी अथवा कुबेर कौड़ी भी कहा जाता है। 

2.काली-कौड़ी
                                            

कौड़ी जो पुराने ज़माने में लोग इसका धन के स्वरुप इस्तेमाल करते थे । काली-कौड़ी माँ लक्ष्मी का स्वरूप मानी गया हैं ... यह अति दुर्लभ है।

3. गोमती-चक्र

                                    

गोमती चक्र कम कीमत वाला एक ऐसा पत्थर है जो गोमती नदी मे मिलता है। विभिन्न तांत्रिक कार्यो तथा असाध्य रोगों में इसका प्रयोग होता है। इसे लक्ष्मी माता की स्थिरता हेतु प्रयोग किया जाता है ! ये माता को अत्यंत प्रिय है !

4.काली-हरिद्रा (हल्दी)

                                   

पोटली में इसका विशेष महत्व है ! रवि-पुष्य या गुरु-पुष्य के शुभ संयोग में काली को हल्दी को प्राप्त कर इसकी षोडषोपचार पूजा करने के उपरांत इसे विधिवत् सिद्ध कर लाल रेशमी वस्त्र में चांदी या स्वर्ण मुद्रा के साथ लपेटकर अपनी तिजोरी में रखने से अपार धन वृद्धि होती है।

 माता को प्रिय अन्य शुभ सामग्रियां :- 

5.पीली-हल्दी 



6.सुपारी 


7.कमलगट्टे


8.नाग-केशर 


9.चाँदी का सिक्का


 10.सफेद-कौड़ी  




11. पीले-अक्षत( हल्दी से अक्षत को रंग लें ) 




12.पान का पत्ता 




ASTRO NAKSHATRA 27
ACHARYA MUKESH