Contact:9999782755/ 7678689062

PAY NOW

Acharya Mukesh

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌॥

Acharya Mukesh...Astro Nakshatra 27

“कुछ अलग करना है, तो भीड़ से हट कर चलो, भीड़ साहस तो देती है, पर पहचान छिन लेती है।”

True remedies by Dr.Mukesh

Contact e-mail: astronakshatra27@gmail.com

Contact e-mail: astronakshatra27@gmail.com

Kundli analysis, Vastu, Palmistry and effective Remedies.

Tuesday, 30 April 2019

सबसे अधिक शुभ मुहूर्त यानी अक्षय तृतीया, पढ़ें विशेष महत्व/ अक्षय तृतीया पर कर लें यह सरल उपाय, बन जाएंगे मालमाल




वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीया को ही अक्षय तृतीया कहते हैं। इस बार अक्षय तृतीया का महापर्व 7 मई 2019 को है। इस दिन मांगलिक कार्य, मुंडन, शादी-विवाह, बहू का प्रथम बार रसोई स्पर्श, दुकान का उद्घाटन, व्यापार का प्रारंभ और सारे शुभ कार्य किए जाते हैं.

अक्षय तृतीया पूजा मुहूर्त = 05:40 से 12:18 तक

अक्षय तृतीया का महत्व
   
अक्षय तृतीया का सर्वसिद्ध मुहूर्त के रूप में भी विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन बिना कोई पंचांग देखे कोई भी शुभ व मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह-प्रवेश, वस्त्र-आभूषणों की खरीददारी या घर, भूखंड, वाहन आदि की खरीददारी से संबंधित कार्य किए जा सकते हैं। नवीन वस्त्र, आभूषण आदि धारण करने और नई संस्था, समाज आदि की स्थापना या उदघाटन का कार्य श्रेष्ठ माना जाता है। पुराणों में लिखा है कि इस दिन पितरों को किया गया तर्पण तथा पिन्डदान अथवा किसी और प्रकार का दान, अक्षय फल प्रदान करता है। इस दिन गंगा स्नान करने से तथा भगवत पूजन से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। यहाँ तक कि इस दिन किया गया जप, तप, हवन, स्वाध्याय और दान भी अक्षय हो जाता है। यह तिथि यदि सोमवार तथा रोहिणी नक्षत्र के दिन आए तो इस दिन किए गए दान, जप-तप का फल बहुत अधिक बढ़ जाता हैं। इसके अतिरिक्त यदि यह तृतीयामध्याह्न से पहले शुरू होकर प्रदोष काल तक रहे तो बहुत ही श्रेष्ठ मानी जाती है। यह भी माना जाता है कि आज के दिन मनुष्य अपने या स्वजनों द्वारा किए गए जाने-अनजाने अपराधों की सच्चे मन से ईश्वर से क्षमा प्रार्थना करे तो भगवान उसके अपराधों को क्षमा कर देते हैं और उसे सदगुण प्रदान करते हैं, अतः आज के दिन अपने दुर्गुणों को भगवान के चरणों में सदा के लिए अर्पित कर उनसे सदगुणों का वरदान माँगने की परंपरा भी है।

अक्षय तृतीया के दिन दिया गया दान कभी नष्ट नहीं होता। उसका फल आपको इस जन्म के साथ साथ कई जन्मों तक मिलता रहता है। आइए जानें 18 ऐसे काम जिनमें से अगर आपने अपनी सुविधा के अनुसार 2 भी कर लिए तो हो जाएंगे मालामाल...


1. इस दिन लोगों को मीठा खिलाएं और शीतल जल पिलाएं।

2. साथ ही गर्मी से बचने के लिए जरूरतमंदों को छाता, मटकी और पंखे का दान करें।

3. मंदिरों में वॉटर कूलर लगवाएं और भंडारा करवाते हुए मिठाई खिलाइएं। इससे आपको उस पुण्य की प्राप्ति होगी जिसका कभी क्षय नहीं हो सकता है।

4. अक्षय तृतीया को श्री विष्णु भगवान की पूजा माता लक्ष्मी के साथ साथ करना चाहिए।

5. श्री विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ और श्री सूक्त का पाठ जीवन में धन, यश, पद और प्रतिष्ठा की प्राप्ति कराएगा।

6. अक्षय तृतीया की पूजा में भगवान विष्णु को पीला पुष्प अर्पित करें और पीला वस्त्र धारण कराकर घी के 9 दीपक जलाकर पूजा प्रारंभ करें।

7. जो लोग बीमारियों से ग्रस्त हैं उनको आज के दिन रामरक्षा स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए।

8. अक्षय तृतीया के दिन चांदी के सिक्के और स्वर्ण आभूषणों की खरीददारी कीजिए।

9. नए वस्त्र धारण करें और मंदिर में अन्न और फल का दान करें।

10.अस्पतालों में मीठा,जल और फल का वितरण करने से अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है।

11. इस दिन अपने मित्रों को और विद्वानों को धार्मिक पुस्तक का दान करने से देव गुरु बृहस्पति प्रसन्न होते हैं।

12. विद्यार्थियों को इस दिन कठिन परिश्रम का प्रतिज्ञा करना चाहिए। छात्रों को दृढ़ संकल्पित होकर आज ईश्वर के सामने यह संकल्प लेना चाहिए कि हम आज से कठिन परिश्रम करेंगे और माता पिता का चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करने के साथ साथ गुरु का भी आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए क्योंकि माता, पिता और गुरु का आशीर्वाद आज के दिन अनंत गुना फलदायी होता है।

13.इस महापर्व पर कोई भी शुभ कार्य प्रारम्भ कर सकते हैं। वाहन खरीद सकते हैं। विवाह और कोई भी शुभ मांगलिक कार्य इत्यादि कर सकते हैं।

14. इस दिन छाते का दान अवश्य करें। जगह-जगह लोगों को जल पिलाने की व्यवस्था करें।

15. भोजन में सत्तू का प्रयोग करें। इस दिन सत्तू दान का बहुत महत्व है।

16. मंदिर में जल का पात्र और पूजा की थाल, घंटी इत्यादि का दान करें।

17. लोगों में धार्मिक पुस्तक बांटें और अपने घर के मंदिर में पूरे 24 घंटे घी का दीपक जलाएं।

18. इस दिन श्री रामचरितमानस के अरण्य काण्ड का पाठ करना चाहिए। इस काण्‍ड में भगवान राम ऋषियों और महान संतों को दर्शन देते हैं और उनके जन्म जन्मान्तर के पुण्य का फल प्रदान करते हैं। इस काण्ड का पाठ करने से भगवान श्री राम की भक्ति प्राप्त होती है।

इस व्रत अनुष्ठान करने वाले के संतान अक्षय हो जाती है । इसी तिथि को सत्ययुग का आरम्भ हुआ था, इसी दिन नर-नारायण, परशुराम और हयग्रीव का अवतार हुआ था।इनकी जयंतियाँ भी अक्षय तृतीया को मनायी जाती है।
अक्षय तृतीया का कभी क्षय नहीं होता। यह पूर्णता के साथ आती है। पूरे वर्ष के किसी भी तिथि का क्षय हो सकता है किंतु अक्षय तृतीया का क्षय नहीं होता। यह तिथि सभी कार्य के लिये शुभ कही गयी है। इसी तिथि को श्री बदरीनारायण के पट खुलते हैं। इसी तिथि को बांके बिहारी जी के चरणों के दर्शन वर्ष में एक बार होते हैं। इस दिन गंगा जी में स्नान का बड़ा भारी महात्म्य है। जो व्यक्ति इस तिथि को गंगा-स्नान करता है, उसे सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है।

इस तिथि को ब्राह्मणों को जल से भरा हुआ कलश, पंखा, जूता एवं गर्मी में उपयोग में आने वाली वस्तुएँ दान की जाती है जिससे कि ये वस्तुएँ हमारे पूर्वज के पास स्वर्ग में पहुँच जाये। सुहागन स्त्रियाँ और कन्याएँ इस तिथि को गौरी की पूजा भी करती है एवं भींगे हुये चने, मिष्ठान और फल बाँटती है। इस तिथि के महात्म्य के श्रवण के बाद अन्य कोई महात्म्य के श्रवण की आवश्यकता नहीं रह जाती। यह अत्यन्त महिमामयी एवं परम सौभाग्यदायिनी है।
अक्ष य तृतीया को स्नान कर विष्णु भगवान का लक्ष्मी सहित पूजन करें। उसके बाद जल से भरा हुआ घड़ा, अन्य दान की सामग्री, गर्मी में उपयोग होने वाले वस्तुओं के साथ किसी योग्य ब्राह्मण को दान करें।


अक्षय तृतीया के दिन दान करने वाली वस्तुएँ:-

गन्ने के रस से बने हुये मिष्ठान, दूध से बने हुये खाद्य पदार्थ, दही, चावल, खीरा, ककड़ी, खरबूज, लड्डू, नमक, घी, पंखा, वस्त्र, जूता, सत्तू , जल से भरा हुआ घड़ा इत्यादि ब्राह्मणों को दान देना चाहिये।
अक्षय तृतीया पूजन विधि:-


अक्षय तृतीया को प्रात: काल उठ कर नित्य कर्म से निवृत हो जायें । यदि सम्भव हो तो किसी पवित्र नदी में स्नान करें अन्यथा घर में ही गंगाजल मिलाकर स्नान कर लें। पूजा स्थल को स्वच्छ कर लें। सभी पूजन सामग्री के साथ आसन पर बैठ जायें। चौकी या लकड़ी के पटरे पर विष्णु भगवान और माता लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें।


गणेश पूजन:- 

सबसे पहले गणेश जी का पूजन पंचोपचार विधि से करें। चौकी के पास हीं किसी पात्र में गणेश जी के विग्रह को रखकर पूजन करें। यदि गणेश जी की मूर्ति उपलब्ध न हो तो सुपारी पर मौली लपेट कर गणेशजी बनायें। 
                                 
अब विधिपूर्वक भगवान विष्णु की पूजा करें। धूप,दीप, पुष्प अर्पित करें। नैवेद्य के रूप में मिष्ठान के साथ जौ, गेहूँ के दाने, सत्तू, चने की दाल, अक्ष त इत्यादि अर्पित करें। साथ में तुलसी दल भी अर्पित करें। विष्णु भगवान के “ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नम:” मंत्र का 108 बार जाप करें अथवा विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। अक्षय तृतीया की कथा एवं महात्म्य को सुने अथवा सुनायें। इसके बाद आरती करें। आरती के बाद प्रभु को आरती दें। तत्पश्चात सभी उपस्थित जन को आरती दें एवं स्वयं भी लें ।

Acharya Mukesh

AKSHAYA TRITIYA 2019/ Shubh Muhurat


Tuesday, 
7 May  2019
The word Akshaya (अक्षय) means never diminishing. Hence the benefits of doing any Japa, Yajna, Pitra-Tarpan, Dan-Punya on this day never diminish and remain with the person forever.

Akshaya Tritiya Puja Muhurat = 05:40 to 12:18
Duration = 6 Hours 37 Mins
Auspicious time to buy Gold
Tritiya Tithi Begins = 03:17 on 7/May/2019
Tritiya Tithi Ends = 02:17 on 8/May/2019

Akshaya Tritiya is a very popular festival that the Hindus and Jains celebrate every year. It is considered as one of the most important days for Hindu community as it is the day of the birth of the Lord Parasurama. The Hindu community considers this day as a lucky day and believes that any venture such as a business or the construction of a building started on that day will follow betterment and prosperity. Akshaya Tritiya is a one day event celebrated in late April or early May. Hindus celebrate this day because, according to them, Akshaya Tritiya is the day when the great God of Wisdom, God Ganesha, started writing the epic work called "Mahabharata". It is believed that when the Pandavas were in exile the Lord presented them a bowl which was named Akshaya Tritiya. That bowl was never empty and produces an unlimited amount of food on demand.

Akshaya Tritiya is considered as the most golden day of the year because the word Akshaya means the most "Eternal" that which never diminishes. Any initiative made on that day or anything bought on that day is considered to be good fortune. The most popular activity is the buying of gold and it is believed it will be a sign of good fortune for the buyer. In the Indian culture people typically starts a new business or begins a new venture on Akshaya Tritiya. This is also one of the most popular days for weddings to take plans as the spirit of this day bids them on a very long and fulfilling life journey. It was also believed that people born in that month will be very lucky and will shine bright throughout their life.

The most popular story regarding the celebration of Akshaya Tritiya is that Lord Karishna and Sudama were friends during their childhood. Sudama was poor and he went to Karishna to ask him for some financial help or to give him money as a gift as a friend. Sudama did not have anything else except the pouch of Poha and he felt ashamed when he gave it to Karishna as he treated Poha as a king. His poor friend was overwhelmed by the hospitality shown by the Lord Karishna that he could not ask his friend for financial support which led him to go home empty-handed. When he arrived at his home he saw that his run-down hut was converted into a palace and his family was wearing royal attire. Sudama knew that this was the blessing of his friend Krishna who blessed him with more wealth than he needed or could ever imagine. This is why Akshaya Tritiya is associated with material gains.

Akshaya Tritiya is believed to bring good luck and success. Most people purchase Gold on this day as it is believed that buying Gold on Akshaya Tritiya brings prosperity and more wealth in coming future. Being Akshaya day it is believed that Gold, bought on this day, will never diminish and would continue to grow or appreciate.

Akshaya Tritiya day is ruled by God Vishnu who is the preserver God in the Hindu Trinity. According to Hindu mythology Treta Yuga began on Akshaya Tritiya day. Usually Akshaya Tritiya and Parashurama Jayanti, birthday anniversary of 6th incarnation of Lord Vishnu, falls on the same day but depending on staring time of Tritiya Tithi Parashurama Jayanti might fall one day before Akshaya Tritiya day.

Acharya Mukesh

Thursday, 4 April 2019

6 April, 2019 चैत्र नवरात्र में घट-स्‍थापना इस बार दोपहर में, पुरे दिन रहेगा अशुभ योग, जाने शुभ मुहूर्त्त एवं समय


घट स्‍थापना का शुभ मुहूर्त 
पंचांग के अनुसार, 5 अप्रैल 2019 के दिन शुक्रवार दोपहर 1 बजकर 36 मिनट से ही प्रतिपदा लग जाएगी, जो कि अगले दिन यानी 6 अप्रैल को दोपहर 2 बजकर 58 मिनट तक रहेगी। मगर नवरात्र का आरंभ 6 अप्रैल को सूर्योदय के बाद से ही माना जाएगा। इसी दिन कलश स्‍थापना भी की जाएगी। माना जा रहा है कि 6 अप्रैल को दोपहर 3 बजकर 24 मिनट पर प्रतिपदा तिथि समाप्त हो जाएगी इसके बाद द्वितीया तिथि का आरंभ होगा।


दोपहर में घट स्‍थापना 
चैत्र प्रतिपदा यानी नवरात्र के पहले दिन शाम 9 बजकर 47 मिनट तक वैघृति योग है। शास्त्रों में बताया गया है कि इस योग को छोड़कर कलश स्थापित स्थापित करना चाहिए। लेकिन जब पूरे दिन वैधृति योग हो तब स्थिति में पूर्वार्ध भाग को छोड़कर कलश स्थापित करना चाहिए। ऐसे में 9 बजकर 57 मिनट के बाद कलश बैठाया जा सकता है।लेकिन इसके लिए शुभ मुहूर्त दोपहर 11 बजकर 59 मिनटसे लेकर 12 बजकर 49 मिनट तक उत्तम है क्योंकि इस समय अभिजित मुहूर्त होगा।


Tuesday, 2 April 2019

चैत्र नवरात्र: इस बार घोड़े पर आएंगी मां भगवती और हाथी पर विदा होंगी

चैत्र नवरात्र जो कि इस वर्ष छह अप्रैल को प्रारंभ होगा। यह 14 अप्रैल तक जारी रहेगा। इस वर्ष मां भक्तों को दर्शन देने के लिए घोड़े पर सवार होकर आ रही है और हाथी पर विदा होंगी। यूं तो सभी को पता है कि मां दुर्गा का वाहन सिंह है परंतु नवरात्रि को तिथि और दिन के अनुसार मां भक्तों को अलग-अलग सवारी के साथ दर्शन देती है। 
धर्म शास्त्रों के अनुसार वर्ष में चार बार नवरात्रि का पर्व आता है, किन्तु इनमें से दो नवरात्रि - चैत्र और आषाढ़ ही लोगों के बीच लोकप्रिय है। पुराणों के अनुसार चैत्र नवरात्रों का समय बहुत ही भाग्यशाली बताया गया है। इसका एक कारण यह भी है कि प्रकृति में इस समय हर और नये जीवन का, एक नई उम्मीद का बीज अंकुरित होने लगता है। जनमानस में भी एक नई उर्जा का संचार हो रहा होता है।
हिन्दू धर्म में प्रत्येक देवी-देवता की एक सवारी (वाहन) है। हर देवी-देवता से जुड़े वाहन का महत्व एवं उसके पीछे एक अर्थ भी छिपा है। मां भगवती की सवारी शेर (बाघ) है। हर देवी मंदिर में आप ने मां दुर्गा को शेर की सवारी करते हुए ही पाएंगे। किन्तु नवरात्रि पर्व की बात करें तो इस दौरान अपने भक्तों को दर्शन के लिए देवी अलग-अलग वाहनों पर सवार होकर आती हैं।
चैत्र नवरात्रि 2019 के पावन पर्व के लिए मां भगवती 'घोड़े' की सवारी करके आएंगी। चैत्र नवरात्रि जो कि इस वर्ष 6 अप्रैल 2019, दिन शनिवार से प्रारम्भ होकर 14 अप्रैल 2019, दिन रविवार तक चलेंगे, देवी 'हाथी' की सवारी करते हुए पृथ्वी से विदा लेंगी।

धर्म ग्रंथो में कहा गया है - 'शशिसूर्ये गजारूढ़ा शनिभौमे तुरंगमे। गुरौ शुक्रे च दोलायां बुधे नौका प्रकी‌र्त्तिता', इस कथन में कलश स्थापन के प्रथम दिन के हिसाब से ही देवी के वाहन का पता लगाया जाता है। वे क्या दिन हैं, आगे जानें:


Saturday, 30 March 2019

पापमोचिनी एकादशी रविवार, मार्च 31, 2019/ Papamochani Ekadashi: सभी पापों से मुक्ति दिलाता है यह व्रत/ एकादशी व्रत कथा व महत्व

एकादशी व्रत कथा व महत्व के बारे में तो सभी जानते हैं। हर मास की कृष्ण व शुक्ल पक्ष को मिलाकर दो एकादशियां आती हैं। यह भी सभी जानते हैं कि इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। जो एकादशी होलिका दहन और चैत्र नवरात्रि के मध्य में आती है उसे पापमोचिनी एकादशी के रूप में जाना जाता हैं। यह एकादशी इस बार 31 मार्च को है। यह सम्वत साल की आखिरी एकादशी है और युगादी से पहले पड़ती हैं।इस दिन व्रत रखने से भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है। साथ ही आरोग्यता तथा सम्पन्नता आती है। इस दिन दान का बहुत महत्व है। इस महान दिवस का श्रद्धा पूर्वक व्रत रखने से कई जन्मों के पापों का नाश होता है। 
इससे यह भी पता चलता है कि कामभावना मोक्ष प्राप्त करने के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है, जिसे जीतने में साधारण मनुष्य तो क्या, ऋषि मुनि भी असफल होते हैं।

 पापमोचिनी एकादशी तिथि व मुहूर्त
पापमोचिनी एकादशी रविवार, मार्च 31, 2019 को

एकादशी तिथि प्रारम्भ - मार्च 31, 2019 को 03:23 बजे
एकादशी तिथि समाप्त - अप्रैल 01, 2019 को 06:04 बजे

 पापमोचिनी एकादशी व्रत व पूजा विधि
नारदपुराण के अनुसार, जातक ब्रह्म मुहूर्त में स्नान आदि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लें। इसके बाद घट स्थापना करें और उसके ऊपर भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर रखें और गंगाजल के छींटे दें। भगवान की तस्वीर या मूर्ति पर रोली और अक्षत से तिलक करें और सफेद फूल चढ़ाएं। इसके बाद घी का एक दीपक जलाएं और उनकी आरती उतारें। इसके बाद उनका भोग लगाएं। फिर ब्राह्मण को भोजन कराकर दान व दक्षिणा देते हैं। इस दिन किसी भी एक समय फलाहार किया जाता है।

 

आचार्य मुकेश के अनुभवों के आधार पर कुछ सुझाव:


एकादशी के व्रत की तैयारी दशमी तिथि को ही आरंभ हो जाती है। उपवास का आरंभ दशमी की रात्रि से ही आरंभ हो जाता है। इसमें दशमी तिथि को सायंकाल भोजन करने के पश्चात अच्छे से दातुन कुल्ला करना चाहिये ताकि अन्न का अंश मुंह में शेष न रहे। इसके बाद रात्रि को बिल्कुल भी भोजन न करें। अधिक बोलकर अपनी ऊर्जा को भी व्यर्थ न करें। रात्रि में ब्रह्मचर्य का पालन करें। एकादशी के दिन प्रात:काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सबसे पहले व्रत का संकल्प करें। नित्य क्रियाओं से निपटने के बाद स्नानादि कर स्वच्छ हो लें। भगवान का पूजन करें, व्रत कथा सुनें। दिन भर व्रती को बुरे कर्म करने वाले पापी, दुष्ट व्यक्तियों की संगत से बचना चाहिये। रात्रि में भजन-कीर्तन करें। जाने-अंजाने हुई गलतियों के लिये भगवान श्री हरि से क्षमा मांगे। द्वादशी के दिन प्रात:काल ब्राह्मण या किसी गरीब को भोजन करवाकर उचित दान दक्षिणा देकर फिर अपने व्रत का पारण करना चाहिये। इस विधि से किया गया उपवास बहुत ही पुण्य फलदायी होता है।


एकादशी करते हों तो ध्यान रखें कुछ बातों का :


🚫1. एकादशी के दिन सुबह दातुन या ब्रश न करें!नींबू, जामुन या आम के पत्ते लेकर चबा लें और अंगुली से कंठ साफ कर लें, वृक्ष से पत्ता तोड़ना भी ‍वर्जित है। अत: स्वयं गिरा हुआ पत्ता लेकर सेवन करें। * यदि यह संभव न हो तो पानी से बारह बार कुल्ले कर लें।

🚫2. एकादशी के दिन झाड़ू पोछा इत्यादि बिलकुल न करें! क्योंकि चींटी आदि सूक्ष्म जीवों की मृत्यु का भय रहता है।

🚫3. एकादशी के दिन तुलसीदल न तोड़ें, भगवन को भोग लगाने हेतु एक दिन पहले ही तोड़ कर रख लें।

🚫4. अगर घर में दक्षिणावर्ती शंख हो तो उसमे जल लेकर भगवान शालिग्राम को स्नान करवाएं, या पंचामृत से स्नान करवाएं!इस से सारे पाप उसी समय नष्ट हो जाते हैं तथा माता लक्ष्मी के साथ भगवान् हरि भी अति प्रशन्न होते हैं।

🚫5.एकादशी के दिन भगवान् श्री हरि को पीली जनेऊ अर्पित करें। पान के पत्ते पर एक सुपारी, लौंग, इलायची, द्रव्य, कपूर, किसमिस तुलसीदल के साथ इत्यादि अर्पित करें, साथ ही ऋतुफल भी अर्पित करें! एक तुलसीदल भगवान् पर भी चढ़ाएं पर रात्रि में उसे हटाना न भूले।

🚫6.एकादशी के दिन सुबह संकल्प लें, मन में मनोकामना करते हुए श्री हरि से व्रत में रहने का संकल्प करें!

🚫7. एकादशी के दिन रात्रि जागरण का विशेष महत्व है, कोशिश करें की इस एकादशी जरूर जागरण करें, इस से व्रत फल 100 गुणा बढ़ जाता है!

🚫8. एकादशी के दिन चावल भूल से भी न छुएं, न ही घर में चावल बनें, इस दिन चावल खाने से बेहद नकरात्मक फल प्राप्त होते हैं, भाग्य खंडित होता है! एकादशी (ग्यारस) के दिन व्रतधारी व्यक्ति को गाजर, शलजम, गोभी, पालक, इत्यादि का सेवन नहीं करना चाहिए। * केला, आम, अंगूर, बादाम, पिस्ता इत्यादि अमृत फलों का सेवन करें। * प्रत्येक वस्तु प्रभु को भोग लगाकर तथा तुलसीदल छोड़कर ग्रहण करना चाहिए।

🚫9. एकादशी के दिन कम से कम बोलें, पापी लोगों से बात न करें, जिनके मन में लालच, पाप या कोई भी अनैतिक तत्व दिखे कम से कम इस दिन उन सभी से दूर रहने का प्रयत्न करें! परनिंदा से बचें!

🚫10.श्री हरि की विशेष कृपा हेतु ॐ नमो भगवते वासुदेवाय की 11 माला सुबह और 11 माला शाम में करें, साथ ही विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ जरूर करें! एकादशी व्रत कथा कहे या सुनें।

🚫11. शाम में केले के पेड़ के नीचे एवं तुलसी में दीपक जलाना न भूले, इसे दीप-दान कहते हैं!

🚫12. माता लक्षमी के बिना विष्णु अधूरे हैं इसलिए माता की भी आरती अवश्य करें, सुबह और शाम शंखनाद एवं घंटियों की ध्वनि में ॐ जय जगदीश हरे की आरती करना न भूले!

🚫13. एकादशी के दिन केले के पेड़ की 7 परिक्रमा करने से धन में बढ़ोतरी होती है!

🚫14. व्रत पंचांग के समयानुसार ही खोलें अन्यथा लाभ की जगह नुक्सान भी हो सकता है, व्रत एवं पूजा के नियमों में करने से ज्यादा कुछ बातें जो हमे नहीं करनी चाहिए वो ही ज्यादा महत्व रखती है. अतः सावधानी से की गई पूजा सर्वश्रेष्ठ फल प्रदान करती है.

🚫15 .आज के दिन किसका त्याग करें- 

🍁मधुर स्वर के लिए गुड़ का। 
🍁दीर्घायु अथवा पुत्र-पौत्रादि की प्राप्ति के लिए तेल का। 🍁शत्रुनाशादि के लिए कड़वे तेल का। 
🍁सौभाग्य के लिए मीठे तेल का। 
🍁स्वर्ग प्राप्ति के लिए पुष्पादि भोगों का। 

प्रभु शयन के दिनों में सभी प्रकार के मांगलिक कार्य जहाँ तक हो सके न करें। पलंग पर सोना, भार्या का संग करना, झूठ बोलना, मांस, शहद और दूसरे का दिया दही-भात आदि का भोजन करना, मूली, पटोल एवं बैंगन आदि का भी त्याग कर देना चाहिए।


🚫16. दोनों ही दिन शाम में संध्या आरती कर दीपदान करें। अखंड लक्षमी प्राप्त होगी। पैसा घर में रुकेगा।

🚫17. शंख ध्वनि से भी माता लक्ष्मी के साथ भगवान् हरि भी अति प्रसन्न होते हैं। अतः पूजा के समय जरूर शंख का उपयोग करें । पूजा के पहले शुद्धिकरण मंत्र तथा आचमन करना न भूलें क्योंकि इसके बिना पूजा का फल प्राप्त नहीं हो पाता।

🚫18. तुलसी की विधिवत पूजा करके उसकी 7 
परिक्रमा करें।


 पापमोचिनी एकादशी व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार  

राजा मान्धाता और महर्षि लोमश से संबंधित कथा युधिष्ठिर को कृष्ण ने सुनाई थी। लोमश ऋषि ने मान्धाता से कहा- अप्सराओं द्वारा सेवित चैत्ररथ नामक सुंदर वन में मंजूघोषा नामक अप्सरा को स्वर्ग के राजा इन्द्र ने उसी स्थान में तपस्या कर रहे ऋषि मेधावी की तपस्या को भंग करने के लिए भेजा। शाप के भय से मंजूघोषा आश्रम से एक कोस दूर ही वीणा बजाते हुए मधुर गीत गाने लगी।

टहलते हुए मुनि वहां जा पहुंचे और उसी समय सहायक के रूप में पहुंचे कामदेव ने मुनि में मंजूघोषा के प्रति कामभावना भर दी। ऋषि काम के वशीभूत हो गए। बरसों बीत गए। मंजूघोषा ने देखा कि अब इनका तप पुण्य समाप्त हो गया है। तपस्या भंग हो गई है। वह देवलोक जाने को तैयार हुई और कहा, 'मुझे अपने देश जाने की आज्ञा दीजिये।' मेधावी बोले, 'जब तक सवेरे की संध्या न हो जाए, तब तक तो मेरे ही पास ठहरो।' अप्सरा ने कहा, 'विप्रवर! बहुत-सी संध्या बीत चुकी हैं।' मुनि चौंके। देखा तो 57 बरस बीत चुके थे। क्रोध में वह बोले, 'मेरी तपस्या भंग की।

जा पिशाची हो जा।' मंजूघोषा ने डर कर कहा, 'मेरे शाप का उद्धार करें ऋषिवर। सात वाक्य बोलने या सात कदम साथ-साथ चलने मात्र से ही सत्पुरुषों में मैत्री हो जाती है। फिर मैं तो आपके साथ बरसों रही हूं।' मेधावी को मंजूघोषा की बात समझ में आ गई, उन्होंने कहा, 'चैत्र कृष्ण पक्ष की पापमोचनी एकादशी का व्रत करो, उसके करने से ही तुम्हारा कष्ट दूर होगा।' अप्सरा ने विधि-विधान से चैत्र कृष्ण एकादशी का व्रत किया, जिससे उसे पिशाच योनि से मुक्ति मिल गई। मेधावी इस पूरे प्रकरण से बहुत लज्जित हो गए थे। वह अपने पिता च्यवन ऋषि के आश्रम पहुंचे। च्यवन ने भी मेधावी से सब कुछ सुन कर उन्हें पापमोचनी एकादशी का ही व्रत करने को कहा। मेधावी ने भी व्रत कर तप बल पुन: प्राप्त किया।

एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। इस दिन श्रीमद्भागवत कथा का पाठ करना चाहिए। एकादशी तिथि में रात भर जागना अद्भुत फल प्रदान करता है।

पारण (व्रत तोड़ने का) समय एवं नियम 

1वाँ अप्रैल को, पारण (व्रत तोड़ने का) समय - 13:39 से 16:07
पारण तिथि के दिन हरि वासर समाप्त होने का समय - 12:43पारण तिथि के दिन हरि वासर समाप्त होने का समय - 12:43

एकादशी के व्रत को समाप्त करने को पारण कहते हैं। एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण किया जाता है। एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति आवश्यक है। यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के बाद ही होता है। द्वादशी तिथि के भीतर पारण न करना पाप करने के समान होता है।
एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए। जो श्रद्धालु व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत तोड़ने से पहले हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि है। व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है। व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए। कुछ कारणों की वजह से अगर कोई प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं है तो उसे मध्यान के बाद पारण करना चाहिए।



कभी कभी एकादशी व्रत लगातार दो दिनों के लिए हो जाता है। जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब स्मार्त-परिवारजनों को पहले दिन एकादशी व्रत करना चाहिए। दुसरे दिन वाली एकादशी को दूजी एकादशी कहते हैं। सन्यासियों, विधवाओं और मोक्ष प्राप्ति के इच्छुक श्रद्धालुओं को दूजी एकादशी के दिन व्रत करना चाहिए। जब-जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब-तब दूजी एकादशी और वैष्णव एकादशी एक ही दिन होती हैं।



एकादशी - आरती 

ॐ जय एकादशी, जय एकादशी, जय एकादशी माता।
विष्णु पूजा व्रत को धारण कर, शक्ति मुक्ति पाता॥
ॐ जय एकादशी...॥

तेरे नाम गिनाऊं देवी, भक्ति प्रदान करनी।
गण गौरव की देनी माता, शास्त्रों में वरनी॥
ॐ जय एकादशी...॥

मार्गशीर्ष के कृष्णपक्ष की उत्पन्ना, विश्वतारनी जन्मी।
शुक्ल पक्ष में हुई मोक्षदा, मुक्तिदाता बन आई॥
ॐ जय एकादशी...॥

पौष के कृष्णपक्ष की, सफला नामक है।
शुक्लपक्ष में होय पुत्रदा, आनन्द अधिक रहै॥
ॐ जय एकादशी...॥

नाम षटतिला माघ मास में, कृष्णपक्ष आवै।
शुक्लपक्ष में जया, कहावै, विजय सदा पावै॥
ॐ जय एकादशी...॥

विजया फागुन कृष्णपक्ष में शुक्ला आमलकी।
पापमोचनी कृष्ण पक्ष में, चैत्र महाबलि की॥
ॐ जय एकादशी...॥

चैत्र शुक्ल में नाम कामदा, धन देने वाली।
नाम बरुथिनी कृष्णपक्ष में, वैसाख माह वाली॥
ॐ जय एकादशी...॥

शुक्ल पक्ष में होय मोहिनी अपरा ज्येष्ठ कृष्णपक्षी।
नाम निर्जला सब सुख करनी, शुक्लपक्ष रखी॥
ॐ जय एकादशी...॥

योगिनी नाम आषाढ में जानों, कृष्णपक्ष करनी।
देवशयनी नाम कहायो, शुक्लपक्ष धरनी॥
ॐ जय एकादशी...॥

कामिका श्रावण मास में आवै, कृष्णपक्ष कहिए।
श्रावण शुक्ला होय पवित्रा आनन्द से रहिए॥
ॐ जय एकादशी...॥

अजा भाद्रपद कृष्णपक्ष की, परिवर्तिनी शुक्ला।
इन्द्रा आश्चिन कृष्णपक्ष में, व्रत से भवसागर निकला॥
ॐ जय एकादशी...॥

पापांकुशा है शुक्ल पक्ष में, आप हरनहारी।
रमा मास कार्तिक में आवै, सुखदायक भारी॥
ॐ जय एकादशी...॥

देवोत्थानी शुक्लपक्ष की, दुखनाशक मैया।
पावन मास में करूं विनती पार करो नैया॥
ॐ जय एकादशी...॥

परमा कृष्णपक्ष में होती, जन मंगल करनी।
शुक्ल मास में होय पद्मिनी दुख दारिद्र हरनी॥
ॐ जय एकादशी...॥

जो कोई आरती एकादशी की, भक्ति सहित गावै।
जन गुरदिता स्वर्ग का वासा, निश्चय वह पावै॥

ॐ जय एकादशी...॥

आरती श्री जगदीशजी 

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी ! जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥
ॐ जय जगदीश हरे।

जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का।
स्वामी दुःख विनसे मन का।
सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥
ॐ जय जगदीश हरे।

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी।
स्वामी शरण गहूँ मैं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥
ॐ जय जगदीश हरे।

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी।
स्वामी तुम अन्तर्यामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥
ॐ जय जगदीश हरे।

तुम करुणा के सागर, तुम पालन-कर्ता।
स्वामी तुम पालन-कर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥
ॐ जय जगदीश हरे।

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
स्वामी सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति॥
ॐ जय जगदीश हरे।

दीनबन्धु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
स्वामी तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठा‌ओ, द्वार पड़ा तेरे॥
ॐ जय जगदीश हरे।

विषय-विकार मिटा‌ओ, पाप हरो देवा।
स्वमी पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ा‌ओ, सन्तन की सेवा॥
ॐ जय जगदीश हरे।

श्री जगदीशजी की आरती, जो कोई नर गावे।
स्वामी जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख संपत्ति पावे॥
ॐ जय जगदीश हरे।

http://www.astronakshatra27.com/contact.html

Wednesday, 20 March 2019

मंगल कर रहे हैं वृषभ राशि में प्रवेश, जानें-क्या होगा आपकी राशि पर असर



मंगल 22 मार्च 2019 शुक्रवार की दोपहर वृषभ राशि में प्रवेश करेंगे. अब तक मंगल मेष राशि में थे. गुरु की मंगल पर शुभ दृष्टि होगी. गुरु वृश्चिक राशि में है. गुरु और मंगल बहुत लाभ देंगे. मंगल और गुरु का समसप्तक योग बनेगा. इस योग के बनने से सुखद खुशखबरी मिलने की संभावना है. मंगल के अपनी जगह बदलने से कई लोगों के जीवन में बदलाव आएगा. कार्यों में सफलता के योग बनेंगे. घर में क्लेश का असर कम होगा. धन संबंधी बिगड़े काम भी सुधर जाएंगे. पति-पत्नियों के बीच रिश्ते मधुर होंगे. आइए जानते हैं मंगल के अपना घर बदलने से किन राशि के लोगों पर क्या असर पड़ेगा.

मेष- मंगल के अपना घर बदलने से मेष राशि के लोगों को करियर में सफलता मिलेगी. साथ ही धन लाभ होगा. विदेश जाने के योग भी बन सकते हैं. दान करके गुड़ दही का सेवन करें.

वृषभ- वृषभ राशि के लोगों के खर्च कम होंगे. व्यापार- कारोबार में सफलता मिलेगी. गले में पीला-लाल धागा धारण करने से लाभ होगा.

मिथुन- ऋण रोग और शत्रु की परेशानी दूर होगी. भाग्योदय होगा, स्वास्थ्य ठीक रहेगा. लक्ष्मी और विष्णु जी को लडडू चढ़ाएं. 

कर्क- कार्य स्थल पर परेशानी कम होगी. मंगल कर्क राशि के लोगों की मदद करेगा. लाल रूमाल पास रखने से लाभ होगा. 

सिंह- सिंह राशि के लोगों को मंगल के परिवर्तन से धन ऐश्वर्या और करियर में लाभ होगा. एग्जाम में सफलता मिलेगी. चंदन का परफ्यूम लगाएं. 

कन्या- इस परिवर्तन से कन्या राशि के लोगों को धन और वाहन का लाभ होगा. दांपत्य जीवन या प्रेम में सफलता मिलेगी. तांबे का छल्ला पहनें. 

तुला- तुला राशि के लोगों को धन लाभ होगा. आप मशहूर और सम्मानित होंगे. चंदन का परफ्यूम लगाएं.

वृश्चिक- आपका स्वामी मंगल है. मंगल के राशि परिवर्तन से वृश्चिक राशि के लोगों को धन लाभ होगा. शनि की ढैय्या में परेशानी दूर होगी. 

धनु- परिवार का साथ मिलेगा. एग्जाम में सफलता मिलेगी. नीम के पेड़ पर शहद चढ़ाएं. 

मकर- मंगल के राशि परिवर्तन से धन लाभ होगा. गुरु शनि का प्रकोप जल्दी कम होगा. नारंगी सिंदूर का तिलक लगाएं. 

कुंभ- नौकरी व्यापार में उन्नति धीरे-धीरे होगी. धन की उलझने सुलझ जाएंगी. गुड़ मलाई का दान करें. 

मीन- मानसिक तनाव कम होगा. बिगड़े कामों में सुधार होगा. उन्नत्ति भी होगी. गुलाब के फूल पास रखें. 


Monday, 18 March 2019

19 मार्च 2019 मंगलवार का पंचांग, फाल्गुन शुक्ल पक्ष, त्रयोदशी/ Acharya Mukesh, Astro Nakshatra 27.


हिन्दू धर्म में पंचाग को बहुत ही शुभ माना जाता है। मान्यता है कि नित्य पंचाग को पढ़ने वाले जातक को देवताओं का आशीर्वाद मिलता है उसको इस लोक में सभी सुख और कार्यो में सफलता प्राप्त होती है। पंचाग पाँच अंगो के मिलने से बनता है, ये पाँच अंग इस प्रकार हैं :-

1:- तिथि  2:- वार  3:- नक्षत्र  4:- योग  और  5:- करण .

शास्त्रों के अनुसार पंचाग को पढ़ना सुनना बहुत शुभ माना जाता है इसीलिए भगवान श्रीराम जी भी नित्य पंचाग को सुनते थे ।
शास्त्रों के अनुसार नित्य उस दिन की तिथि का नाम लेने उसका नाम सुनने से माँ लक्ष्मी की कृपा मिलती है।
वार का नाम लेने सुनने से आयु में वृद्धि, नक्षत्र का नाम लेने सुनने से पापो का नाश होता है।

योग का नाम लेने सुनने से प्रियजनों का प्रेम मिलता है और करण का नाम लेने सुनने से समस्त मनोकामनायें पूर्ण होती है। इसलिए निरंतर शुभ समय के लिए प्रत्येक मनुष्य को नित्य पंचांग को देखना, पढ़ना चाहिए ।

19 मार्च 2019 मंगलवार का पंचांग
🌞↗️सूर्योदय - 06:31
🌞↘️सूर्यास्त - 18:28
🌕↗️चन्द्रोदय 16:43
🌘↘️चन्द्रास्त - 30:02+

पञ्चाङ्ग
🔘वार-  मंगलवार  💠तिथि- शुक्ल पक्ष
त्रयोदशी- 14:18 तक
चतुर्दशी


नक्षत्र
मघा - 19:05 तक
पूर्वाफाल्गुनी

योग
धृति - 17:18 तक
शूल

करण
तैतिल - 14:18 तक
गर - 24:32+ तक
वणिज

विक्रम संवत् 2075 संवत्सर (विरोधाकृत)

शक संवत - 1940 (विलंबी)

अयन - उत्तरायण

वैदिक ऋतु:-वसन्त       द्रिक ऋतु:-वसन्त

मास - फाल्गुन माह

सूर्य राशि 
मीन

चन्द्र राशि 
सिंह


सूर्य नक्षत्र

उत्तर भाद्रपद


🌅दिनमान
11 घण्टे 57 मिनट्स 02 सेकण्ड्स

🌌रात्रिमान
12 घण्टे 01 मिनट्स 47 सेकण्ड्स


🙏शुभ समय🙏
👉अभिजित मुहूर्त: 12:06 से 12:53
👉विजय मुहूर्त:-14:29 से 15:16
👉अमृत काल:- 16:58 से 18:23
👉रवि योग:- 19:05 से 30:29+
👏ब्रह्म मुहूर्त:- 28:53+ से 29:41+

⛔अशुभ समय⛔
👿गुलिक काल:-12:29 से 13:59
🚷यमगण्ड:-
09:30 से 11:00
👹राहुकाल:- 15:28 से 16:58

ऊपर दिए गए राहुकाल का आकलन दिल्ली के सूर्योदय को ध्यान में रखते हुए किया गया है !

राहुकाल सप्ताह के सातों दिन में निश्चित समय पर लगभग 90 मिनट तक रहता है। इसे अशुभ समय के रूप मे देखा जाता है और इसी कारण राहु काल की अवधि में शुभ कर्मो को यथा संभव टालने की सलाह दी जाती है। राहु काल अलग-अलग स्थानों के लिये अलग-अलग होता है। इसका कारण यह है की सूर्य के उदय होने का समय विभिन्न स्थानों के अनुसार अलग होता है। इस सूर्य के उदय के समय व अस्त के समय के काल को निश्चित आठ भागों में बांटने से ज्ञात किया जाता है। सप्ताह के प्रथम दिवस अर्थात सोमवार के प्रथम भाग में कोई राहु काल नहीं होता है। यह सोमवार को दूसरे भाग में, शनिवार को तीसरे भाग, शुक्रवार को चौथे भाग, बुधवार को पांचवे भाग, गुरुवार को छठे भाग, मंगलवार को सातवे तथा रविवार को आठवे भाग में होता है। यह प्रत्येक सप्ताह के लिये निश्चित रहता है।

इस गणना में सूर्योदय के समय को प्रात: 06:00 (भा.स्टै.टा) बजे का मानकर एवं अस्त का समय भी सांयकाल 06:00 बजे का माना जाता है। इस प्रकार मिले 12 घंटों को बराबर आठ भागों में बांटा जाता है। इन बारह भागों में प्रत्येक भाग डेढ घण्टे का होता है। हां इस बात का ध्यान रखा जाता है कि वास्तव में सूर्य के उदय के समय में प्रतिदिन कुछ परिवर्तन होता रहता है और इसी कारण से ये समय कुछ खिसक भी सकता है। अतः इस बारे में एकदम सही गणना करने हेतु सूर्योदय व अस्त के समय को पंचांग से देख आठ भागों में बांट कर समय निकाल लेते हैं जिससे समय निर्धारण में ग़लती होने की संभावना भी नहीं रहती है।

रविवार -सायं -4.30 से 6.00 तक।
सोमवार -प्रातः -7.30 से9.00 तक।
मंगलवार -दिन -3.00 से 4.30तक।
बुधवार -दिवा -12.00 से 1.30तक।
गुरूवार -दिन -1.30 से 3.00तक।
शुक्रवार -प्रातः -10.30 से12.00तक।
शनिवार -प्रातः -9.00 से 10.30तक।

⚓निवास और शूल
होमाहुति- शनि - 19:05 तक
चन्द्र
अग्निवास :-आकाश - 14:18 तक
पाताल
दिशाशूल (Dishashool) - उत्तर


ग्रह-स्थिति:
🌞सूर्य-राशि ~मीन♒04⁰.30'
🌙चंद्र-राशि~ ♌सिंह 10⁰.20'
🔺मंगल ~ मेष ♈ 27⁰.58'
↺🔘बुध~ कुम्भ ♒ (अस्त ,वक्री  )26⁰.04'
🔶बृहस्पति~वृश्चिक♏29⁰.26'
◽शुक्र ~ मकर♑26⁰.55'
◾शनि~धनु♐ 25⁰.00'
↺👹राहु ~ मिथुन ♊29⁰.20'
↺👺केतु ~ धनु♐ 29⁰.20'

नोट :- पंचांग  को नित्य पढ़ने से जीवन से विघ्न दूर होते है, कुंडली के ग्रह भी शुभ फल देने लगते है। अत: सभी जातको को नित्य पंचाग को अनिवार्य रूप से पढ़ना ही चाहिए और अपने इष्ट मित्रो को भी इससे अवगत कराना चाहिए ।           
 💛ACHARYA MUKESH,