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Acharya Mukesh

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌॥

Acharya Mukesh...Astro Nakshatra 27

“कुछ अलग करना है, तो भीड़ से हट कर चलो, भीड़ साहस तो देती है, पर पहचान छिन लेती है।”

True remedies by Dr.Mukesh

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Kundli analysis, Vastu, Palmistry and effective Remedies.

Wednesday, 17 October 2018

नवरात्री-हवन घर में स्वयं करें : सरलतम विधि

                             

नवरात्री-हवन 

नारदपुराण के अनुसार नवरात्र में मां दुर्गा की पूजा हवन के बिना अधुरी मानी जाती है। आज  विधि की जानकारी के अभाव  में अक्सर लोग मंत्रों के बिना ही यह हवन करते हैं।

अब बात करते हैं दैनिक हवन विधि का जिसका उपयोग आप नवरात्रों के दौरान स्वयं भी कर सकते हैं। सबसे पहले मां दुर्गा की पूजा के बाद एक पात्र (कड़ाही या मिट्टी के बर्तन) में अग्नि स्थापना करें। उसमें आम की लकड़ी व कपूर रखकर जला दें।

फिर पूरब दिशा की ओर मुंह करके बैठ जाये ! शुभ कार्यों के लिए हमारे हिंदू धर्म में पूर्व दिशा और उत्तर दिशा को शुभ माना गया है ! हवन करने के लिए हमें पूर्व दिशा या उत्तर दिशा की ओर मुंह कर बैठ जाना होगा !

ओं भूर्भुव: स्वः ।।

इस मंत्र का उच्चारण करके अग्नि जला अगले मंत्र से आह्वाहन करे। वह मंत्र यह है-

ओं भूर्भुवः स्वर्धौरिव भूम्ना पृथिवीव वरिम्णा ।
तस्यास्ते पृथिवी देवयजनि पृष्ठेऽग्निमन्नादमन्नाधायादधे ।।

ओम् उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टापूर्ते संसृजेथामयं च ।
आस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन् विश्वे देवा यजमानश्च सीदत ।।

इस मंत्र से जब अग्नि समिधाओं में प्रविष्ट होने लगे तब तीन लकड़ी आठ-आठ अंगुल की घृत में डूबो उनमें से नीचे लिखे एक-एक मंत्र से एक-एक समिधा को अग्नि में चढ़ावें। वे मंत्र ये हैं -

इस मंत्र से एक समिधा अग्नि में चढ़ाएं :-


ओम् अयं त इध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वर्धस्व चेद्ध वर्धय चास्मान् प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन समेधय स्वाहा ।

इदमग्नये जातवेदसे-इदं न मम् ।

इससे और अगले अर्थात् दोनों मन्त्रों से दूसरी समिधा अग्नि में चढ़ावें :-

ओं समिधाग्निं दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथिम् ।
आस्मिन् हव्या जुहोतन, स्वाहा ।।

इस मंत्र से तीसरी समिधा अग्नि में चढ़ावें :-

ओं तं त्वां समिदि्भरड़ि्गरो घृतेन वर्द्धयामसि ।
बृहच्छोचा यविष्ठय स्वाहा ।। 


इदमग्नयेऽड़ि्रसे-इदन्न मम ।।


जलप्रोक्षण-मन्त्र

ओम् आदितेऽनुमन्यस्व । इससे पूर्व दिशा में
ओम् अनुमतेऽनुमन्यस्व । इससे पश्चिम दिशा मे
ओं सरस्त्वयनुमन्यस्व । इससे उत्तर दिशा मे जल छिड़कें ।
 तत्पश्चात अंजलि में जल लेके वेदी के पूर्व दिशा आदि चारों ओर छिड़कें ।


इसके मंत्र है :-

ओं देव सवित: प्रसुव यज्ञं प्रसुव यज्ञोपतिं भगाय ।
दिव्यो गन्धर्व: केतपू: केतं न: पुनातु वाचस्पतिर्वाचं न: स्वदतु ।।





शुद्ध देशी घी का प्रयोग करें। उसके बाद निम्न मंत्रों से हवन शुरू करें:

   ऊं आग्नेय नम: स्वाहा (ओम अग्निदेव ताम्योनम: स्वाहा),

ऊं गणेशाय नम: स्वाहा 11 आहुति


ऊं गौरियाय नम: स्वाहा, 

ऊं वरुणाय नम: स्वाहा, 

ऊं सूर्यादि नवग्रहाय नम: स्वाहा, 

ऊं दुर्गाय नम: स्वाहा, 

ऊं महाकालिकाय नम: स्वाहा


ऊं हनुमते नम: स्वाहा, 



ऊं भैरवाय नम: स्वाहा, 



ऊं कुल देवताय नम: स्वाहा, 



ऊं स्थान देवताय नम: स्वाहा 


ऊं ब्रह्माय नम: स्वाहा, 



ऊं विष्णुवे नम: स्वाहा, 


ऊं शिवाय नम: स्वाहा

  सप्तशती  पूर्णाहुति  हवन के लिए अर्गला स्त्रोत्र में जो मंत्र आये हैं उनसे हवन करें :

(हवन-सामग्री: काली तिल,शहद,अनार के दाने और घी को  खीर में मिला लें और इसी से हवन करें)






ॐ नमश्‍चण्डिकायै॥  स्वाहा:

मार्कण्डेय उवाच  स्वाहा:

ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥१॥ स्वाहा:

जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि।
जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते॥२॥ स्वाहा:

मधुकैटभविद्राविविधातृवरदे नमः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥३॥ स्वाहा:

महिषासुरनिर्णाशि भक्तानां सुखदे नमः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥४॥ स्वाहा:

रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥५॥ स्वाहा:

शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥६॥ स्वाहा:

वन्दिताङ्‌घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥७॥ स्वाहा:

अचिन्त्यरुपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥८॥ स्वाहा:

नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥९॥ स्वाहा:

स्तुवद्‌भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१०॥ स्वाहा:

चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह भक्तितः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥११॥ स्वाहा:

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१२॥ स्वाहा:

विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१३॥ स्वाहा:

विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१४॥ स्वाहा:

सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१५॥ स्वाहा:

विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१६॥ स्वाहा:

प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१७॥ स्वाहा:

चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंस्तुते परमेश्‍वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१८॥ स्वाहा:

कृष्णेन संस्तुते देवि शश्‍वद्भक्त्या सदाम्बिके।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१९॥ स्वाहा:

हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्‍वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥२०॥ स्वाहा:

इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्‍वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥२१॥ स्वाहा:

देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥२२॥ स्वाहा:

देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥२३॥ स्वाहा:

पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्॥२४॥ स्वाहा:

इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः।
स तु सप्तशतीसंख्यावरमाप्नोति सम्पदाम्॥२५॥ स्वाहा:

सप्तशती के साथ यदि आपने गायत्री-मंत्र का जाप भी किया है तो जाप संख्या के दशांश का हवन गायत्री-मंत्र के साथ स्वाहा  लगाकर करें !  


‘ऊँ भूर्भव स्व: तत्सवितुर्वरेण्यम् भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात।’ स्वाहा :

इदं  गायत्री इदं  न मम् !!


अब सुखद स्वास्थ्य हेतु महामृत्युंजय-मंत्र से ५ आहुति  डालें :



ॐ त्र्यम्बक यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धन्म। उर्वारुकमिव बन्धनामृत्येर्मुक्षीय मामृतात् !! स्वाहा :



इदं महामृत्युंजाये  इदं  न मम्  

अंत में :  

                      ॐ ऐं ह्लीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमः 11 आहुति



ऊं जयंती मंगलाकाली भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा शिवाधात्री स्वाहा, स्वधा नमस्तुति स्वाहा:, 



ओम ब्रह्मामुरारी त्रिपुरांतकारी भानु: क्षादी: भूमि सुतो बुधश्च: गुरुश्च शक्रे शनि राहु केतो सर्वे ग्रहा शांति कर: स्वाहा:,



ओम गुर्रु ब्रह्मा, गुर्रु विष्णु, गुर्रु देवा महेश्वर: गुरु साक्षात परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नम: स्वाहा !



उपरोक्त मंत्रो का जप करने के बाद नारियल में हवन की बची  सामग्री डाल ,कलावा बांधकर उसे अग्नि में समर्पित कर दें, इस विधि को वोलि कहते हैं। फिर पूर्ण आहूति के रूप में नारियल, घी, लाल धागा, पान, सुपारी, लौंग, जायफल आदि स्वाहा करें।

स्विष्टकृतहोम:- चमच्च में मीठा और घी लेकर अग्निदेव को अर्पित करें।



पूर्णाहुति मंत्र: गड़ी गोला काट कर उसमें बची हवन सामग्री,घी, पान पत्ता , सुपारी इत्यादि डाल ये मंत्र बोलते हुए अर्पित करें:-


वसोरधारा:-
इस मंत्र से घी नीचे से ऊपर धार बनाते हुए गोले पर डाल दें:-




अब अंत में पानी की सहायता से आचमनी  करेंगे ! जो कि कम से कम तीन बार होनी चाहिए ! आचमनी करने के लिए पानी को आम के पत्ते से लेकर तीन बार हवन के ऊपर से घुमा कर बगल में गिरा देंगे. यह प्रक्रिया तीन बार करेंगे उसके बाद हमारी हवन की प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है. इसके बाद हम माताजी की आरती कर सकते हैं और हमारा पूजन विधि पूर्वक संपन्न हो जाता है !

वैसे तो हवन की विधि बहुत ही विस्तृत होती है परन्तु मैंने इसे आपकी सुविधा हेतु काफी सरल कर दिया  है पर आपसे निवेदन है की इससे कम करने पर कहीं न कहीं कुछ कमी रह जाएगी इसलिए मैंने जितना लिखा है उतना तो अवश्य ही करें ! मैंने उतना ही लिखा है जो बिलकुल नहीं छोड़ा जा सकता ! आपने पूजा काफी मेहनत से की है तो बस पूर्णाहुति भी बड़े प्यार से करें !

इसके अतिरिक्त  आप इस प्रयोग को भी इस हवन प्रक्रिया में जोड़ सकते हैं :-

दरिद्रता नाश एवं अकूट लक्ष्मी की प्राप्ति हेतु आप श्री सूक्त  के सोलह ऋचाओं का कमलगट्टे से भी हवन  कर सकते हैं ( यह एक वैकल्पिक प्रयोग है, यदि समय हो तो नवमी के दिन इसे करनेवाला कभी भी आर्थिक संकट में नहीं सकता ! यह आचार्य मुकेश के द्वारा सफलतापूर्वक किये गए शोध के सकरात्मक परिणाम पर आधारित है )यह आप अर्गला-मंत्र आहूति बाद कर सकते हैं, क्योंकि माता दुर्गा साक्षात् महालक्ष्मि  ही हैं ! इस प्रयोग को लगातार हर महीने शुक्ल पंचमी को करने पर भिखारी भी धनवान बन सकता है ! कमलगट्टे को घी में डुबो कर हर श्लोक के साथ स्वाहा बोल आहुति दें।

ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं, सुवर्णरजतस्त्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आ वह।।१।। स्वाहा:

तां म आ वह जातवेदो, लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं, गामश्वं पुरूषानहम्।।२।। स्वाहा:

अश्वपूर्वां रथमध्यां, हस्तिनादप्रमोदिनीम्।
श्रियं देवीमुप ह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम्।।३।। स्वाहा:

कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहोप ह्वये श्रियम्।।४।। स्वाहा:

चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम्।
तां पद्मिनीमीं शरणं प्र पद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे।।५।। स्वाहा:

आदित्यवर्णे तपसोऽधि जातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽक्ष बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु या अन्तरा याश्च बाह्या अलक्ष्मीः।।६।। स्वाहा:

उपैतु मां दैवसखः, कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्, कीर्तिमृद्धिं ददातु मे।।७।। स्वाहा:

क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्।
अभूतिमसमृद्धिं च, सर्वां निर्णुद मे गृहात्।।८।। स्वाहा:

गन्धद्वारां दुराधर्षां, नित्यपुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरीं सर्वभूतानां, तामिहोप ह्वये श्रियम्।।९।। स्वाहा:

मनसः काममाकूतिं, वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रूपमन्नस्य, मयि श्रीः श्रयतां यशः।।१०।। स्वाहा:

कर्दमेन प्रजा भूता मयि सम्भव कर्दम।
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम्।।११।। स्वाहा:

आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे।
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले।।१२।। स्वाहा:

आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिंगलां पद्ममालिनीम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आ वह।।१३।। स्वाहा:

आर्द्रां य करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह।।१४।। स्वाहा:

तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम्।।१५।। स्वाहा:

य: शुचि: प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम्।
सूक्तं पंचदशर्चं च श्रीकाम: सततं जपेत्।।१६।। स्वाहा:


अग्नि में जो भी वस्तु डाली जाती है, उसे वह अपने पास नहीं रखती, वरन् उसे सूक्ष्म बनाकर वायु को, देवताओं को, बाँट देती है। हमें जो वस्तुएँ ईश्वर की ओर से, संसार की ओर से मिलती हैं, उन्हें केवल उतनी ही मात्रा में ग्रहण करें, जितने से जीवन रूपी अग्नि को ईंधन प्राप्त होता रहे। शेष का परिग्रह, संचय या स्वामित्व का लोभ न करके उसे लोक-हित के लिए ही अर्पित करते रहें।


आचार्य मुकेश 
ऐस्ट्रो नक्षत्र २७ से 

Tuesday, 16 October 2018

धन प्राप्ति हेतु सरल उपाय :अष्टमी को माता की करें गोद भराई

धन प्राप्ति हेतु सरल उपाय :अष्टमी को माता की करें गोद भराई


 सामग्री : पीला कपडा - १.२५ मीटर ,
 पान के पत्ते - ९,
 सुपारी-९,
  द्रव्य -९,
 दुर्बा,
 हल्दी की गांठ -९,
 बताशे - ९ 




 अब घर की सुहागिन स्त्री चौके पर पीला कपडा बिछा कर उसमे 9 माता के नाम से 9 पान के पत्ते रखे ! 


फिर बारी-बारी से  9 माता के नाम से इन 9 पत्तों पर दोनों हाथों से अक्षत अर्पित करें ! अर्पित करते समय सभी माता के नाम भी बोलते जाएँ जैसे : जय माता शैलपुत्री, जय माता ब्रह्मचारिणी, जय माता चंद्रघंटा इत्यादि !


फिर बारी-बारी से द्रव्य यानि सिक्के, दुर्बा, हल्दी की गांठ, सुपारी और बताशे अर्पित करें ! 


फिर माता से मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना करते हुए गोद में रखे इन सामग्रियों को उसी पीले कपडे में मोड़ कर 2 गांठ लगा वहीँ गोद में ही रख दें तत्पश्चात माता का श्रृंगार करें ! काजल,इत्र,सिन्दूर तथा भांति-भांति के श्रृंगार और वस्त्र अर्पित कर के पूजा प्रारम्भ करें ! 



Monday, 15 October 2018

नवरात्री सप्तमी "माता कालरात्रि" करेंगी "शनि" के अशुभ प्रभावों को नष्ट




माँ कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक है, लेकिन ये सदैव शुभ फल ही देने वाली हैं। इसी कारण इनका एक नाम 'शुभंकारी' भी है। अतः इनसे भक्तों को किसी प्रकार भी भयभीत अथवा आतंकित होने की आवश्यकता नहीं है।

माँ कालरात्रि दुष्टों का विनाश करने वाली हैं। दानव, दैत्य, राक्षस, भूत, प्रेत आदि इनके स्मरण मात्र से ही भयभीत होकर भाग जाते हैं। ये ग्रह-बाधाओं को भी दूर करने वाली हैं। इनके उपासकों को अग्नि-भय, जल-भय, जंतु-भय, शत्रु-भय, रात्रि-भय आदि कभी नहीं होते। इनकी कृपा से वह सर्वथा भय-मुक्त हो जाता है।

माँ कालरात्रि के स्वरूप-विग्रह को अपने हृदय में अवस्थित करके मनुष्य को एकनिष्ठ भाव से उपासना करनी चाहिए। यम, नियम, संयम का उसे पूर्ण पालन करना चाहिए। मन, वचन, काया की पवित्रता रखनी चाहिए। वे शुभंकारी देवी हैं। उनकी उपासना से होने वाले शुभों की गणना नहीं की जा सकती। हमें निरंतर उनका स्मरण, ध्यान और पूजा करना चाहिए।

माता कालरात्रि का संबंध शनि ग्रह से है। जिन व्यक्तियों की कुंडली में शनि नीच, या राहु के साथ युतिगत हो पितृ दोष बना रहा हो या पीड़ित हो तो कालरात्रि की साधना से ये दोष कम होते जाते हैं। आलस्य में कमी आती है।कर्म भाव मजबूत होता है , आय बढ़ती है तथा शत्रुओं का नाश होता है।

अंधकारमय स्थितियों का विनाश करने वाली और काल से भी रक्षा करने मां कालरात्रि और शनिदेव का गहरा संबंध है। शनिदेव का रंग काला है और मां कालरात्रि का स्वरूप भी काले रंग का है। मां कालरात्रि असुरों का विनाश करने वाली है तथा शनिदेव भी दुष्टों व अत्याचारियों को दण्ड देने के लिए जाने जाते हैं। सप्तमी तिथि के स्वामी सूर्य भगवान हैं और शनिदेव के पिता भी सूर्य देव हैं। अतः मां कालरात्रि एंव शनि देव का आपस में भाई-बहन का रिश्ता हुआ।  जानते हैं इस शुभ संयोग में कैसे करें मां कालरात्रि का पूजन जिससे शनिदेव की कृपा भी बनी रहे।


ऐसे करें पूजा-पाठ :
1- सप्तमी के दिन मां कालरात्रि गुड़ अर्पित करें और गुड़ को प्रसाद रूप में गरीबों को वितरित करें जिससे शनि देव का कुप्रभाव नष्ट होगा।


 2- इस मन्त्र ‘‘या देवी सर्वभूतेषु मां कालरात्रि रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो मनः'' का जाप करने मात्र से ही शनि देव बुरा असर समाप्त हो जायेगा। 

3- दुर्गा सप्तमी के दिन मां कालरात्रि को दूध में शहद मिलाकर भोग लगाने से शनिदेव बुरा प्रभाव शान्त होता है।

4- आज के दिन शप्तशती का विधिवत पाठ करने से शनि की साढ़ेसाती व ढैय्या का प्रभाव भी कम हो जाता है।


5- दुर्गा सप्तमी के दिन नावार्ण मन्त्र- "ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै" की कम से कम 9 माला जाप करने से शनि देव का बुरा असर कम होने लगता है।







नवरात्रि की सप्तमी के दिन माँ कालरात्रि की आराधना का विधान है। इनकी पूजा-अर्चना करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है व दुश्मनों का नाश होता है, तेज बढ़ता है। प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में सातवें दिन इसका जाप करना चाहिए।

                                                 मंत्र



या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता। 
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और कालरात्रि के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे पाप से मुक्ति प्रदान कर।

                 ॐ ऐं ह्रीं क्रीं कालरात्रै नमः |

देवी कालरात्रि के मंत्र

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

एक वेधी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकणी तैलाभ्यक्तशरीरिणी।।

वामपदोल्लसल्लोहलताकण्टक भूषणा।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी।।

देवी कालरात्रि के स्तोत्र पाठ
हीं कालरात्रि श्री कराली च क्लीं कल्याणी कलावती।
कालमाता कलिदर्पध्नी कमदीश कुपान्विता॥

कामबीजजपान्दा कमबीजस्वरूपिणी।
कुमतिघ्नी कुलीनर्तिनाशिनी कुल कामिनी॥

क्लीं हीं श्रीं मन्त्र्वर्णेन कालकण्टकघातिनी।
कृपामयी कृपाधारा कृपापारा कृपागमा॥

देवी कालरात्रि के कवच

ऊँ क्लीं मे हृदयं पातु पादौ श्रीकालरात्रि।
ललाटे सततं पातु तुष्टग्रह निवारिणी॥


0टिप्पणियांरसनां पातु कौमारी, भैरवी चक्षुषोर्भम।
कटौ पृष्ठे महेशानी, कर्णोशंकरभामिनी॥

वर्जितानी तु स्थानाभि यानि च कवचेन हि।
तानि सर्वाणि मे देवीसततंपातु स्तम्भिनी॥

आचार्य मुकेश

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Sunday, 14 October 2018

GAYATRI MANTRA

astro nakshatra 27

Sanskrit transcript:
ॐ भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्॥

Transliteration:
oṃ bhūrbhuvaḥ svaḥ। tatsaviturvareṇyaṃ bhargo devasya dhīmahi।
dhiyo yo naḥ pracodayāt॥

Hindi Translation:

ॐ हम उस दिव्य सूरज का ध्यान करतें हैं, जो सभी को प्रकाशित करता है, जिनसे सभी आगे बढ़ते हैं। हे प्रभु, क्रिपा करके हमारी बुद्धि को उजाला प्रदान कीजिये और हमें धर्म का सही रास्ता दिखाईये।

English translation:


We meditate on the glory of that being (Savitur, the sun) who has produced this universe, who is the essence of our life existence; May we imbibe his divinity and brilliance within us.

The purpose of Gayatri mantra is to offer prayers to the sun god, Savitur. The god which has given us everything, which has made life possible on this planet, which grants us light and energy. The sun which always gives and never asks for anything in return, the Gayatri mantra is a way of giving back in the form of prayer and respect to that ever-giving entity. This mantra invokes a sense of inclusiveness; imagine you offering respects to the sun on behalf of all the beings in this world, wouldn’t that make you think much larger than just yourself? The correct mindset that we all need when we begin our day.

Why Gayatri Mantra is so popular?


Gayatri Mantra is from one of the oldest texts ‘Rig Veda’, composed by Sage Vishwamitra. It is a popular belief that Vishwamitra after long practice and penance discovered Gayatri mantra which according to him was not just a boon for himself but for the entire mankind. Upon chanting this mantra, the chanter and the listener both are most benefited with the vibrational positive energy of the mantra. And the fact that many practitioners have found Gayatri mantra so enriching, it has become popular over the centuries.

The Analysis (Dissection) of the Gayatri Mantra:


ॐ (OM): The primeval sound
भूः (Bhur): Earth = Mooladhara;  the physical body/physical realm
भुवः (Bhuvah): Akash; the life force/the mental realm
स्वः (Swah): Heaven= Swadhishthana; the soul/spiritual realm
महः (Maha): Heart region.
जनः (Jana): To say ‘no’ for life and death.
तपः (Tapa): Ascetic practices in vishuddhi & Agnya.
सत्यम् (Satyam): Up to the Third Eye ( Brahma-Randhra ).
तत् (Tat): That – situated as it is; That (God)
सवितुर् (Savitur/Savita): Sa + Va + Ta = Sun, Ganges, Fire, Earth etc. including those endowed with knowledge and yoga.
र्वरेण्यं (Vareñyam): Va + Re + N + Ya + M : God Varuna; adore
भर्गो (Bhargo): Bha + Ra + Ga; effulgence (divine light)
देवस्य (Devasya): Da + Va + S + Ya; Supreme Lord
धीमहि (Dhīmahi): Dha + Ma + Ha; meditate
धियो (Dhiyo/Dhiya): Dha + Ya; the intellect
यो नः (Yo Nah): Ya + Na; May this light, Nah: Our
प्रचोदयात् (Prachodayāt): Pa + Ra + Cha + Da + Ya + T; illumine/inspire

When to chant the Gayatri Mantra?

It is advised to repeat Shanti (peace) thrice at the end of the chanting of the Mantra, which will give peace to three entities – body, mind, and soul. During the three positions of sun namely lower sky in the east (morning), mid sky (noon) and lower sky in the evening (dusk), are the best times to chant Gayatri Mantra.
Therefore, the day is divided into three parts:
  • 4 am to 8 am and 4 pm to 8 pm have the Sātvic quality
  • 8 am to 4 pm are Rājasic
  • 8 pm and 4 am are Tāmasic

Friday, 12 October 2018

🕳️शनिदेव


🕳️महर्षि पाराशर ने कहा कि शनि जिस अवस्था में होगा, उसके अनुरूप फल प्रदान करेगा। जैसे प्रचंड अग्नि सोने को तपाकर कुंदन बना देती है, वैसे ही शनि भी विभिन्न परिस्थितियों के ताप में तपाकर मनुष्य को उन्नति पथ पर बढ़ने की सामर्थ्य एवं लक्ष्य प्राप्ति के साधन उपलब्ध कराता है।

🕳️नवग्रहों में शनि को सर्वश्रेष्ठ इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यह एक राशि पर सबसे ज्यादा समय तक विराजमान रहता है। श्री शनि देवता अत्यंत जाज्वल्यमान और जागृत देवता हैं।

🕳️शनिदेव एवं 🔅बृहस्पति दोनों ऐसे ग्रह हैं जिनके गोचर में एक साथ सबन्ध बनाने से ही जीवन की कोई भी मत्वपूर्ण घटना घटती है ! चाहे वो जन्म हो या शादी या बच्चे या मृत्यु कुछ भी हो ! नौकरी की प्राप्ति या धन-लाभ सबकुछ शनिदेव के हाथों में है ! अतः इनकी पूजा डर से नहीं भक्ति से कीजिए !

आप उनसे डरिये जो शनि से आपको डरा कर आपसे पैसे लूट रहे हैं ! शनि की कृपा से राजयोग बनते हैं,भिखारी भी राजा बन जाता है ! शनि की साढ़ेसाती भी सिर्फ उन्ही का नुक्सान करती है जो अन्याय करते हैं, पाप करते हैं!

🔘बस आप शनिदेव से दिल 💓🙏लगा कर देखिये फिर आप पाएंगे उनसे बढ़कर आपका कोई साथी नहीं !

💢शनि सूर्य (राजा ) के पुत्र हैं ! शनि न्यायकर्ता हैं!

💣शनि सिर्फ उन्हे ही दण्डित करते हैं जो गलत है !

⚛️शनि और कोई नहीं बल्कि खुद शिव के ही अँश हैं !

🔺जब आप शिव भ ग वा न से नहीं डरते तो फिर शनि से क्यों ?
🔺हनुमान जी भी शिव रुद्रावतार हैं और शनि भी एक से डरते हो दूसरे से मदद मांगते हो , फिर भी काम न बना तो इनके पिता जी के पास पहुँच जाते हो , फिर ज़िदगी में वैसा काम ही क्यों करते हो जिससे भविष्य में आपको डरना पड़े?

💠ACHARYA MUKESH💠

Tuesday, 2 October 2018

रत्नों से बदलें अपने भाग्य / जाने अद्भुत जानकारी :कौन सा रत्न कितने दिन तक देता है आपको सुरक्षा

हर इंसान अपनी ज़िन्दगी में सर्वश्रेष्ठ बनना चाहता है ! पर आपने सुना होगा, इंसान जिस वक़्त पहली साँस लेता है उसकी पूरी ज़िन्दगी उसी समय ग्रहों के अनुसार निर्धारित हो चुकी होती है,फिर इंसान लाख चतुराइयों के बावजूद अपनी ज़िन्दगी संघर्ष के साथ ही जीता है ! कुछ इंसान बिना किसी योग्यता के ही बड़े-बड़े घरों में रहतें हैं और बड़ी बड़ी गाड़ियों में घूमते है, वहीँ कुछ लोग बहुत योग्य होकर भी एक घर और एक गाड़ी जुटाने में ही ज़िन्दगी के ५० साल निकाल देते हैं! कहते हैं सब किस्मत है, भाग्य है! कुछ लोग ज्योतिष शास्त्र,रत्न एवं पूजा पाठ को अंध विस्वाश का नाम देते हैं , वहीँ जब उनके घर बच्चे का जन्म होता है तो सबसे पहले कुंडली बनवाते हैं! वास्तव में वैसे लोग अपनी अहम में जीते हैं ! कुछ लोग जो मध्यम आय वर्ग के होते हैं वही ज्यादा समझदार होने का ढोंग करते हैं, कमाई ५० हज़ार होती है पर दिखावा ऐसा करते हैं जैसे की टाटा - अम्बानी भी मुर्ख हैं! वहीँ आप बड़े लोगों का उदहारण ले , जैसे कोई भी जानेमाने क्रिकेटर,राजनितज्ञ या अभिनेता हों या मिलेनियर, बिलेनियर हर कोई उपरोक्त बातों में पूरी आस्था और विश्वाश रखता है और इन्ही की बदौलत आम से खास बन जाते हैं! 

ज्योतिष शास्त्र,रत्न विज्ञान के आधार पर ही आज दुनिया इस आधुनिक मुकाम तक पहुँच पाई है !आइये मैं कुछ तथ्ये आपको बताता हूँ की आपको क्यों रत्नो और ज्योंतिष ज्ञान का सम्मान करना चाहिए ! हम सभी ने बचपन में विज्ञान की किताबों में पढ़ा है कि सौर-मंडल में सूर्य के रासायनिक विस्फोट होने से हमारी पृथ्वी समेत नौ ग्रह की उत्पत्ति हुई ! शनि,मंगल,बुध,बृहस्पति,चन्द्रमा और पृथ्वी सभी सूर्य के ही एक छोटे से अंश हैं! सौरमण्डल में विस्फोट के बाद जब पृथ्वी धीरे धीरे सामान्य हुई तो उसमे मौजूद रासायनिक तत्वों से सृष्टि ने जन्म लिया,फिर पृथ्वी पर जीवन पनपी, मछली हों या छोटे-छोटे जीव या फिर इंसान सभी को पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण शक्ति का अंदाज़ा है, जब पूरी पृथ्वी समेत सारे ग्रह को सूर्य अपनी गुरुत्वाकर्षण से अपने अधिकार में कर रखा है,तो हम इंसान भी इसी पृथ्वी की मिटटी से जन्मे हैं, करोड़ों सालों की निरन्तर प्रक्रिया के बाद हम आज यहाँ खड़ें हैं! और पूरी तरह इसी गुरुत्वाकर्षण शक्ति के अधीन हैं! पृथ्वी हमें अपनी और खींचती है और पृथ्वी को सूर्य! 

जब एक बच्चा जन्म लेता है और अपनी पहली सांस लेता है उसी वक़्त उसके मस्तिष्क और पुरे शरीर पर पृथ्वी समेत सारे ग्रहों की गुरुत्वाकर्षण शक्ति का कब्ज़ा हो जाता है ,जो ग्रह उस वक़्त जिस डिग्री और जगह पर होते हैं और उस बच्चे के मस्तिष्क और पुरे शरीर को रेगुलेट करते हैं उसी की व्याख्या ज्योतिष उस बच्चे की जन्म कुंडली में करते हैं कि कौन सा ग्रह कहाँ है, उसकी चाल सीधी है या वक्री, उस बच्चे के लिए कौन सा ग्रह योगकारक है या मारक या फिर कौन से ग्रह की कैसी गति है और पूरी जिंदगी जैसे-जैसे वो ग्रह चलते हैं, बच्चें का मस्तिष्क और पूरा शरीर उसके आधार पर निर्णय और कर्म करता है जिससे उसका भविष्य बनता या बिगड़ता है! 

उदहारण हेतु सूर्य में हाइड्रोजन 71% हिलीयम 26.5% अन्य 2.5% का रासायनिक मिश्रण होता हैं वहीँ शुक्र ग्रह के वायुमंडल में लगभग 95% कार्बन डाई आँक्साइड CO² की मात्रा है तथा 3.5% भाग नाइट्रोजन का है। उसी तरह अन्य ग्रहों की भी अलग अलग स्थिति है और सारे ग्रहों के गुरुत्वकर्षण का प्रभाव हर पल हर समय पृथ्वी की हर जीवित या मृत घटकों पर होता है!

रत्न की भूमिका 

जैसा की हम सभी जानते हैं की हर रत्न चाहे वो हीरा हो नीलम हो या फिर गोमेद,मूंगा,पुखराज कोई भी हो सभी की अलग अलग केमिकल कम्पोजीशन होती है! रत्न वास्तव में खनिज पदार्थ हैं, जो प्रकृति में भिन्न-भिन्न रूपों में पाए जाते हैं। दरअसल, ये भिन्न-भिन्न तत्वों के क्रिया-प्रतिक्रिया के फलस्वरूप बनते हैं। इन रत्नों में मुख्यतः कार्बन, बेरियम, बेरिलियम, एल्यूमीनियम, कैल्शियम, जस्ता, टिन, तांबा, हाइड्रोजन, लोहा, फॉस्फोरस, मैंगनीज़, गंधक, पोटैशियम, सोडियम, जिंकोनियम आदि तत्त्व उपस्थित होते हैं। प्राचीन ग्रन्थों के अनुसार उच्च कोटि में 84 प्रकार के रत्न आते हैं। 

जब हम अपनी कुंडली के ख़राब ग्रह के अनुसार उस रत्न को धारण करते हैं तो सम्बंधित केमिकल और उसकी तरंगे हमारी मस्तिष्क और हमारे पुरे शरीर को सम्बंधित ग्रह की नकरात्मकता को हम तक आने नहीं देता जिसके कारण हमे शीघ्र ही सकरात्मक परिणाम प्राप्त होने लगते हैं! यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में कोई ग्रह अशुभ स्थिति में हो तो व्यक्ति का भाग्योदय नहीं हो पाता है। अशुभ फल देने वाले ग्रहों को अपने पक्ष में करने के लिए संबंधित ग्रह का रत्न पहनना ही एक उपाय है। असली रत्न काफी मूल्यवान होते हैं जो कि आम लोगों की पहुंच से दूर होते हैं। इसी वजह से कई लोग रत्न पहनना तो चाहते हैं, लेकिन धन अभाव में इन्हें धारण नहीं कर पाते हैं। 

रत्नों के माध्यम से जीवन के विभिन्न हिस्सों में सफलता पाई जा सकती है। लेकिन इसके लिए सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि कौन-सा रत्न आपके लिए सर्वाधिक अनुकूल है। ज्योतिष के अनुसार रत्न में दैवीय ऊर्जा समायी हुई होती है, जिससे मानवीय जीवन का कल्याण होता है। रत्न ज्योतिष का हमारे जीवन में बड़ा महत्व है। ज़िंदगी में अक्सर मनुष्य को ग्रहों के बुरे प्रभाव की वजह से परेशानियों का सामना करना पड़ता है। वैदिक ज्योतिष में ग्रह शांति के लिए कई उपाय बताये गये हैं, इनमें से एक उपाय है राशि रत्न धारण करना। रत्न को पहनने से ग्रहों के दुष्प्रभाव से बचा जा सकता है। साथ ही जीवन में आ रही समस्याओं से छुटकारा पाया जा सकता है। हर राशि का अलग-अलग स्वभाव होता है, ठीक उसी प्रकार हर रत्न का भी सभी बारह राशियों पर भिन्न-भिन्न प्रभाव पड़ता है। ज्योतिष में प्रत्येक रत्न को किसी विशेष उद्देश्य और लाभ के लिए पहना जाता है। जो व्यक्ति रत्न को धारण करता है उसे इसके कई लाभ लाभ प्राप्त होते हैं। रत्न के प्रभाव से जातक के जीवन में सकारात्मक बदलाव होते हैं l रत्न को धारण करने से व्यक्ति को विभिन्न रोगों से मुक्ति मिलती है l




रत्न विज्ञान के अनुसार जो भी रत्न हम धारण करते हैं, वह दिन-प्रतिदिन घिसता रहता है। वैज्ञानिक दृष्टि से हर रत्न अपने अंदर कुछ नकारात्मक ऊर्जा शरीर से बाहरी वातावरण से ग्रहण करता रहता है और अपने में संजोए रहता है। आपने देखा होगा या कभी अनुभव भी किया होगा कि कई बार रत्न स्वयं टूट जाते हैं या उनमें पहने-पहने दरारे आ जाती हैं। और ये अपनी शक्ति का ह्रास करने लगते है । इन सभी रत्नो को पहनने की अपनी-अपनी समय सीमा होती हैं उसी समय के अनुसार रत्नो का बदलीकारण कर लेना चाहिए l जैसे कि मोती पहनने की आयु सीमा सबसे कम (अढ़ाई साल) निर्धारित की गई है। इसी प्रकार अन्य रत्न हैं जिसकी समय सीमा रत्न शास्त्र के अनुसार 

माणिक्य- 4 वर्ष, 
मूंगा -3,
पन्ना -4, 
पुखराज-4, 
हीरा -7, 
नीलम-5, 
मोती की उम्र २ साल १ महीने २७ दिन 
गोमेद और लहसुनिया 3-3 साल के बाद बदल देने चाहिएं। 

और इस बात का जरूर ध्यान देना चाहिए की आपको कभी भी परिवार में किसी भी रत्न की आपस में एक-दूसरे से अदला-बदली नहीं करनी चाहिए भले ही वे भाई-बहन, मां-बेटे , पति-पत्नी या निकट संबंधी ही क्यों न हों। इसे जल प्रवाह कर देना चाहिए। यदि किसी एलर्जी के कारण उतारना पड़ जाए या अंगूठी की एडजस्टमैंट के लिए किसी कारीगर को देनी ही पड़ जाए तो पुन: प्राण प्रतिष्ठा करवा कर ही धारण करना चाहिए। खंडित नग कभी नहीं पहनना चाहिए।


                             ग्रह और उनसे सम्बंधित रत्न



                                सूर्य    माणिक्य   RUBY 
vedicguru.in


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चन्द्र  मोती  PEARL 




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मंगल  मूंगा RED CORAL




इसे पुखराज, मूंगा के साथ भी पहना जा सकता है। पन्ना व माणिक भी पहन सकते है, इसके पहनने से बुधादित्य योग बनता है। जो पहनने वाले को दिमागी कार्यों में सफल बनाता है। 

माणिक, पुखराज व पन्ना भी साथ पहन सकते हैं। माणिक के साथ नीलम व गोमेद नहीं पहना जा सकता है।



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बुध   पन्ना EMERALD



गुरु   पुखराज    Yellow Sapphire  







पुखराज, ब्रहस्पति गृह का प्रतिनिधित्व करता है! जितना यह मूल्यवान है उतनी ही इस रत्न की कार्य क्षमता प्रचलित है! इस रत्न को धारण करने से ईश्वरीय कृपया प्राप्त होती है, विशेषकर आर्थिक परेशानियां अचानक से कम होने लगती हैं अपीतू खत्म ही हो जाती हैं।  जो व्यक्ति पुखराज धारण करता है उसे अलग-अलग रास्तों से आर्थिक लाभ मिलना शुरू हो जाता है, बस शर्त ये है कि रत्न असली हो।

पुखराज धारण करने के बाद अच्छा स्वास्थ्य, आर्थिक लाभ, लम्बी उम्र और मान प्रतिष्ठा प्राप्त होती है, लेकिन इसका ध्यान अवश्य रखा जाए कि किसी भी रत्न को धारण करने से पहले किसी अनुभवी ज्योतिषी की सलाह अवश्य कर लें।



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शुक्र हीरा  एवं  दूधिया पत्थर (ओपल)





ज्योतिषीय दृष्टिकोण यह है कि हीरा शुक्र का रत्न है। वृषभ व तुला राशि के अधिपति शुक्र हैं। इनका हीरा स्वयं तो मूल्यवान है ही, धारक को भी मालामाल कर देता है। यदि कुंडली के अच्छे भावों के स्वामी शुक्र हों, तो हीरा धारण कर सुख-संपदा में वृद्धि की जा सकती है।

ज्योतिषीय निर्देश राशि – तुला। ग्रह – शुक्र । दिन – शुक्र । 



यदि आप सुंदर दूधिया पत्थर धारण करना चाहते हैं तो आपको किसी ज्योतिषविद की सलाह लेनी चाहिए। यदि आपके पास किसी ज्योतिषविद से मिलने का समय नहीं है तो घबराने की जरूरत नहीं क्योंकि आचार्य मुकेश ने आपकी सुविधा के लिए टेलीफोन सेवा भी उपलब्ध रखी  है। यदि आपको अनुकूल लगे तो ज्योतिषी से बात कीजिए। इस सेवा की मदद से आप अपने अनुकूल रत्न को धारण कर अपने जीवन को सुखद बना सकते हैं। 

दूधिया पत्थर को पहनने से निम्नलिखित लाभ मिलते हैं :-

~वित्तीय स्थिति में सुधार होता है।
~~यौन शक्ति बढ़ती है।
~~~काल्पनिक रचनात्मक शक्ति में वृद्घि होती है।
~~~~अच्छा एकाग्रता और मानसिक शांति को बढ़ावा देता है।
~~~~~शारीरिक तंदरुस्ती प्रदान करता है एवं बुरे स्वप्न को दूर रखता है।
~~~~~~व्यक्ति को सफलता, लोकप्रियता एवं मान सम्मान दिलाता है।


अगर आप पहले से ही जानते हैं कि आपके लिए यह रत्न अनुकूल है एवं आप इसको खरीदना चाहते हैं तो आप हमारे यहां से प्रामाणिक, शत प्रतिशत असली एवं अच्छी गुणवत्ता वाला ओपल रत्न खरीद सकते हैं। 

रोचक तथ्य – एक अनुमान के अनुसार लगभग ओपल रत्न ६० मीलियन वर्ष पुराने हैं, जब डायनासोर धरती पर घूमा करते थे।



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शनि नीलम  Blue Sapphire  


नीलम में aluminium oxide और chromium पाया जाता है , तो रासायनिक तौर पर आपके दिमाग को मदद करता है । शनि कि महादशा एवं साढ़ेसाती के दौरान ये आपका विपरीत समय भी सुख से भर देता है, यदि शनि के कारण मनोवांछित सफलता नहीं मिल रही है तो नीलम अवस्य धारण करें.अगर आपका दिमाग ने काम करना बंद कर दिया है , जो भी आप निर्णय लेते है वह गलत पे गलत है , तो नीलम रत्न मन को शांत करता है । नीलम रत्न आपकी कुशलता बढ़ाता है , जिससे आप किसी भी कार्य को गम्भीरता से करने में सक्षम होते है । नीलम रत्न दूर-दृष्टि देने वाला है ,अगर किसी व्यक्ति को नीलम उसकी कुंडली के अनुसार अनुकूल होता है तो वह व्यक्ति बहुत बड़ी सफलता प सकता है ।


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राहु  गोमेद  : हेसोनाइट राहु के बुरे प्रभाव को डालें नकेल

गोमेद से संबद्घ लाभकारी शक्तियों के माध्यम से आप अपने जीवन में सर्वांगीण समृद्धि और धन आमंत्रित करते हैं। इस के अलावा यह रत्न आप की सामाजिक प्रतिष्ठा, अच्छा स्वास्थ्य व प्रसिद्धि प्रदान करता है। आप के लिए गोमेद बेहद उत्तम व लाभकारी सिद्घ हो सकता है, अगर आप अपनी जन्म कुंडली के अनुसार इसे पहनते हैं।


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केतु लहसुनिया  CATS EYEs



ये अपने आकार से ज्‍यादा वजन का लगता है। चमकदार और चिकना होता है साथ ही लंबी-लंबी सफेद धारियां होती हैं। अंधेरे में भी यह बिल्‍ली की आंख की तरह चमकता है। यह केतु का रत्‍न होता है और पहनने पर यह केतु से संबंधित दोष खत्‍म कर देता है।

सावधानी

ऐसे लहसुनिया को धारण नहीं करना चाहिए को किसी तरीके के खंडित हो और जिसे देखकर अच्‍छी अनुभूमि नहीं हो रही हो। इसके साथ ही लहसुनिया के साथ माणिक्‍य, मूंगा, मोती और पीला पुखराज नहीं पहनना चाहिए।

शनिवार को चांदी की अंगूठी में लहसुनियां लगवाकर ऊं कें केतवे नम: मंत्र 17000बार जप करना चाहिए। इस प्रकार लहसुनिया को जागृत कर उसे धारण करना चाहिए। इसे आधी रात को बीच की अंगुली में धारण करना चाहिए।


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Monday, 1 October 2018