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Acharya Mukesh

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌॥

Acharya Mukesh...Astro Nakshatra 27

“कुछ अलग करना है, तो भीड़ से हट कर चलो, भीड़ साहस तो देती है, पर पहचान छिन लेती है।”

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Wednesday, 12 June 2019

निर्जला एकादशी: 13 जून, 2019 (गुरुवार): बन रहा है शुभ संयोग, निर्जला एकादशी व्रत कथा

ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी कहा जाता है। इस बार निर्जला एकादशी गुरुवार के दिन होने से शुभ संयोग बन रहा है। ज्योतिषाचार्य मुकेश के अनुसार, भगवान विष्णु के सबसे प्रिय दिन गुरुवार को निर्जला एकादशी होने से शुभ फल की प्राप्ति होगी।

निर्जला एकादशी व्रत मुहूर्त New Delhi, India के लिए
निर्जला एकादशी पारणा मुहूर्त :
05:22:47 से 08:10:11 तक 14, जून को
अवधि : 2 घंटे 47 मिनट

यह व्रत जीवन में सर्व समृद्धि देने वाला माना गया है। इस दिन लोग निर्जल व्रत रखकर विधि-विधान से दान करते हैं। वर्ष भर में कुल 24 एकादशी आती हैं, पर निर्जला एकादशी को सभी एकादशियों में श्रेष्ठ माना गया है। इस दिन कुछ उपाय करने से भाग्य का साथ मिलता है। इसे भीमसेनी एकादशी भी कहते हैं। क्योंकि महर्षि वेदव्यास के अनुसार भीमसेन ने इसे धारण किया था। मान्यता है कि इस एकादशी का व्रत रखने से ही साल में आने वाली समस्त एकादशी के व्रत का फल प्राप्त होता है। इस व्रत में सूर्योदय से द्वादशी के सूर्योदय तक जल भी न पीने का विधान होने के कारण इसे निर्जला एकादशी कहते हैं। इस दिन निर्जल रहकर भगवान विष्णु की आराधना का विधान है। इस व्रत से दीर्घायु और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

बिना पानी के व्रत को निर्जला व्रत कहते हैं और निर्जला एकादशी का उपवास किसी भी प्रकार के भोजन और पानी के बिना किया जाता है। उपवास के कठोर नियमों के कारण सभी एकादशी व्रतों में निर्जला एकादशी व्रत सबसे कठिन होता है। निर्जला एकादशी व्रत को करते समय श्रद्धालु लोग भोजन ही नहीं बल्कि पानी भी ग्रहण नहीं करते हैं।

लाभ - जो श्रद्धालु साल की सभी चौबीस एकादशियों का उपवास करने में सक्षम नहीं है उन्हें केवल निर्जला एकादशी उपवास करना चाहिए क्योंकि निर्जला एकादशी उपवास करने से दूसरी सभी एकादशियों का लाभ मिल जाता हैं।

कहा जाता है कि निर्जला एकादशी के दिन गंगा स्नान का भी महत्व होता है। गंगा स्नान कर भगवान विष्णु को खीर का भोग लगाना चाहिए। इससे घर में धनलाभ होता है। खीर के भोग में तुलसी का पत्ता रखकर भोग लगाएंगे तो इससे घर-परिवार में शांति बनी रहती है।

शास्त्रों में कहा गया है कि पीपल में भगवान विष्णु का वास होता है। इसलिए निर्जला एकादशी के दिन पीपल के पेड़ में जल अर्पण करना चाहिए। इसलिए ऐसा करने से कर्ज से मुक्ति मिलती है। साथ ही धनलाभ भी होता है।

भगवान विष्णु को पीले रंग के वस्त्र, फल और अनाज अर्पित करना चाहिए। इस दिन खुद भी पीले वस्त्र धारण करने चाहिए। भगवान विष्णु की पूजा के उपरांत इस चीजों को किसी ब्राह्मण को दान देना चाहिए। ऐसा करने से घर में शांति बनी रहती है। 

वैसे तो दान करना शुभ फल देता ही है लेकिन निर्जला एकादशी के दिन किसी गरीब को दान करने से अधिक लाभ होता है। खास तौर पर इस दिन जल का दान करना चाहिए। इस दिन वस्त्र, धन, फल और मिठाई का दान कर सकते हैं। इस दिन सरबत बनाकर लोगों को पिलाने से पुण्य मिलता है।
       Daan Samagri for Nirjala Ekadashi (Offer it to Brahaman )
1.Pitcher (Ghat) with water
   2. Fruits specially Watermelon  
3. Hand Fan
4. Offer any Drink (Thandhai).


निर्जला एकादशी व्रत पूजा विधि

जो श्रद्धालु वर्षभर की समस्त एकादशियों का व्रत नहीं रख पाते हैं उन्हें निर्जला एकादशी का उपवास अवश्य करना चाहिए। क्योंकि इस व्रत को रखने से अन्य सभी एकादशियों के बराबर पुण्य प्राप्त होता है। इस व्रत की विधि इस प्रकार है:

1. इस व्रत में एकादशी तिथि के सूर्योदय से अगले दिन द्वादशी तिथि के सूर्योदय तक जल और भोजन ग्रहण नहीं किया जाता है। 

2. एकादशी के दिन प्रात:काल स्नान के बाद सर्वप्रथम भगवान विष्णु की विधि विधान से पूजा करें। इसके पश्चात भगवान का ध्यान करते हुए ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें। 

3. इस दिन भक्ति भाव से कथा सुनना और भगवान का कीर्तन करना चाहिए।

4. इस दिन व्रती को चाहिए कि वह जल से कलश भरे व सफ़ेद वस्त्र को उस पर ढककर रखें और उस पर चीनी तथा दक्षिणा रखकर ब्राह्मण को दान दें।

इसके बाद दान, पुण्य आदि कर इस व्रत का विधान पूर्ण होता है। धार्मिक महत्त्व की दृष्टि से इस व्रत का फल लंबी उम्र, स्वास्थ्य देने के साथ-साथ सभी पापों का नाश करने वाला माना गया है।
निर्जला एकादशी पर दान का महत्व

यह एकादशी व्रत धारण कर यथाशक्ति अन्न, जल, वस्त्र, आसन, जूता, छतरी, पंखी तथा फल आदि का दान करना चाहिए। इस दिन जल कलश का दान करने वालों श्रद्धालुओं को वर्ष भर की एकादशियों का फल प्राप्त होता है। इस एकादशी का व्रत करने से अन्य एकादशियों पर अन्न खाने का दोष छूट जाता है तथा सम्पूर्ण एकादशियों के पुण्य का लाभ भी मिलता है। श्रद्धापूर्वक जो इस पवित्र एकादशी का व्रत करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर अविनाशी पद प्राप्त करता है।
                                               

निर्जला एकादशी व्रत कथा

ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी

भीमसेन व्यासजी से कहने लगे कि हे पितामह! भ्राता युधिष्ठिर, माता कुंती, द्रोपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव आदि सब एकादशी का व्रत करने को कहते हैं, परंतु महाराज मैं उनसे कहता हूँ कि भाई मैं भगवान की शक्ति पूजा आदि तो कर सकता हूँ, दान भी दे सकता हूँ परंतु भोजन के बिना नहीं रह सकता।

इस पर व्यासजी कहने लगे कि हे भीमसेन! यदि तुम नरक को बुरा और स्वर्ग को अच्छा समझते हो तो प्रति मास की दोनों एक‍ा‍दशियों को अन्न मत खाया करो। भीम कहने लगे कि हे पितामह! मैं तो पहले ही कह चुका हूँ कि मैं भूख सहन नहीं कर सकता। यदि वर्षभर में कोई एक ही व्रत हो तो वह मैं रख सकता हूँ, क्योंकि मेरे पेट में वृक नाम वाली अग्नि है सो मैं भोजन किए बिना नहीं रह सकता। भोजन करने से वह शांत रहती है, इसलिए पूरा उपवास तो क्या एक समय भी बिना भोजन किए रहना कठिन है।

अत: आप मुझे कोई ऐसा व्रत बताइए जो वर्ष में केवल एक बार ही करना पड़े और मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो जाए। श्री व्यासजी कहने लगे कि हे पुत्र! बड़े-बड़े ऋषियों ने बहुत शास्त्र आदि बनाए हैं जिनसे बिना धन के थोड़े परिश्रम से ही स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है। इसी प्रकार शास्त्रों में दोनों पक्षों की एका‍दशी का व्रत मुक्ति के लिए रखा जाता है।

व्यासजी के वचन सुनकर भीमसेन नरक में जाने के नाम से भयभीत हो गए और काँपकर कहने लगे कि अब क्या करूँ? मास में दो व्रत तो मैं कर नहीं सकता, हाँ वर्ष में एक व्रत करने का प्रयत्न अवश्य कर सकता हूँ। अत: वर्ष में एक दिन व्रत करने से यदि मेरी मुक्ति हो जाए तो ऐसा कोई व्रत बताइए।

यह सुनकर व्यासजी कहने लगे कि वृषभ और मिथुन की संक्रां‍‍ति के बीच ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की जो एकादशी आती है, उसका नाम निर्जला है। तुम उस एकादशी का व्रत करो। इस एकादशी के व्रत में स्नान और आचमन के सिवा जल वर्जित है। आचमन में छ: मासे से अधिक जल नहीं होना चाहिए अन्यथा वह मद्यपान के सदृश हो जाता है। इस दिन भोजन नहीं करना चाहिए, क्योंकि भोजन करने से व्रत नष्ट हो जाता है।

यदि एकादशी को सूर्योदय से लेकर द्वादशी के सूर्योदय तक जल ग्रहण न करे तो उसे सारी एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है। द्वादशी को सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि करके ब्राह्मणों का दान आदि देना चाहिए। इसके पश्चात भूखे और सत्पात्र ब्राह्मण को भोजन कराकर फिर आप भोजन कर लेना चाहिए। इसका फल पूरे एक वर्ष की संपूर्ण एकादशियों के बराबर होता है।

व्यासजी कहने लगे कि हे भीमसेन! यह मुझको स्वयं भगवान ने बताया है। इस एकादशी का पुण्य समस्त तीर्थों और दानों से अधिक है। केवल एक दिन मनुष्य निर्जल रहने से पापों से मुक्त हो जाता है।

जो मनुष्य निर्जला एकादशी का व्रत करते हैं उनकी मृत्यु के समय यमदूत आकर नहीं घेरते वरन भगवान के पार्षद उसे पुष्पक विमान में बिठाकर स्वर्ग को ले जाते हैं। अत: संसार में सबसे श्रेष्ठ निर्जला एकादशी का व्रत है। इसलिए यत्न के साथ इस व्रत को करना चाहिए। उस दिन ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का उच्चारण करना चाहिए और गौदान करना चाहिए।

इस प्रकार व्यासजी की आज्ञानुसार भीमसेन ने इस व्रत को किया। इसलिए इस एकादशी को भीमसेनी या पांडव एकादशी भी कहते हैं। निर्जला व्रत करने से पूर्व भगवान से प्रार्थना करें कि हे भगवन! आज मैं निर्जला व्रत करता हूँ, दूसरे दिन भोजन करूँगा। मैं इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करूँगा, अत: आपकी कृपा से मेरे सब पाप नष्ट हो जाएँ। इस दिन जल से भरा हुआ एक घड़ा वस्त्र से ढँक कर स्वर्ण सहित दान करना चाहिए।

जो मनुष्य इस व्रत को करते हैं उनको करोड़ पल सोने के दान का फल मिलता है और जो इस दिन यज्ञादिक करते हैं उनका फल तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता। इस एकादशी के व्रत से मनुष्य विष्णुलोक को प्राप्त होता है। जो मनुष्य इस दिन अन्न खाते हैं, ‍वे चांडाल के समान हैं। वे अंत में नरक में जाते हैं। जिसने निर्जला एकादशी का व्रत किया है वह चाहे ब्रह्म हत्यारा हो, मद्यपान करता हो, चोरी की हो या गुरु के साथ द्वेष किया हो मगर इस व्रत के प्रभाव से स्वर्ग जाता है।

हे कुंतीपुत्र! जो पुरुष या स्त्री श्रद्धापूर्वक इस व्रत को करते हैं उन्हें अग्रलिखित कर्म करने चाहिए। प्रथम भगवान का पूजन, फिर गौदान, ब्राह्मणों को मिष्ठान्न व दक्षिणा देनी चाहिए तथा जल से भरे कलश का दान अवश्य करना चाहिए। निर्जला के दिन अन्न, वस्त्र, उपाहन (जूती) आदि का दान भी करना चाहिए। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस कथा को पढ़ते या सुनते हैं, उन्हें निश्चय ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है।



   Narayana Gayatri Mantra

Om Narayanaya Vidhmahe Vasudevaya Dheemahe Thanno Vishnu Prachodayath.

Om, Let me meditate on Lord Narayana,
Oh, Lord Vasudeva, give me higher intellect,
And let Lord Vishnu illuminate my mind.

आचार्य मुकेश के अनुभवों के आधार पर कुछ सुझाव:


एकादशी के व्रत की तैयारी दशमी तिथि को ही आरंभ हो जाती है। उपवास का आरंभ दशमी की रात्रि से ही आरंभ हो जाता है। इसमें दशमी तिथि को सायंकाल भोजन करने के पश्चात अच्छे से दातुन कुल्ला करना चाहिये ताकि अन्न का अंश मुंह में शेष न रहे। इसके बाद रात्रि को बिल्कुल भी भोजन न करें। अधिक बोलकर अपनी ऊर्जा को भी व्यर्थ न करें। रात्रि में ब्रह्मचर्य का पालन करें। एकादशी के दिन प्रात:काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सबसे पहले व्रत का संकल्प करें। नित्य क्रियाओं से निपटने के बाद स्नानादि कर स्वच्छ हो लें। भगवान का पूजन करें, व्रत कथा सुनें। दिन भर व्रती को बुरे कर्म करने वाले पापी, दुष्ट व्यक्तियों की संगत से बचना चाहिये। रात्रि में भजन-कीर्तन करें। जाने-अंजाने हुई गलतियों के लिये भगवान श्री हरि से क्षमा मांगे। द्वादशी के दिन प्रात:काल ब्राह्मण या किसी गरीब को भोजन करवाकर उचित दान दक्षिणा देकर फिर अपने व्रत का पारण करना चाहिये। इस विधि से किया गया उपवास बहुत ही पुण्य फलदायी होता है।

एकादशी करते हों तो ध्यान रखें कुछ बातों का :

🚫1. एकादशी के दिन सुबह दातुन या ब्रश न करें!नींबू, जामुन या आम के पत्ते लेकर चबा लें और अंगुली से कंठ साफ कर लें, वृक्ष से पत्ता तोड़ना भी ‍वर्जित है। अत: स्वयं गिरा हुआ पत्ता लेकर सेवन करें। * यदि यह संभव न हो तो पानी से बारह बार कुल्ले कर लें।

🚫2. एकादशी के दिन झाड़ू पोछा इत्यादि बिलकुल न करें! क्योंकि चींटी आदि सूक्ष्म जीवों की मृत्यु का भय रहता है।

🚫3. एकादशी के दिन तुलसीदल न तोड़ें, भगवन को भोग लगाने हेतु एक दिन पहले ही तोड़ कर रख लें।

🚫4. अगर घर में दक्षिणावर्ती शंख हो तो उसमे जल लेकर भगवान शालिग्राम को स्नान करवाएं, या पंचामृत से स्नान करवाएं!इस से सारे पाप उसी समय नष्ट हो जाते हैं तथा माता लक्ष्मी के साथ भगवान् हरि भी अति प्रशन्न होते हैं।

🚫5.एकादशी के दिन भगवान् श्री हरि को पीली जनेऊ अर्पित करें। पान के पत्ते पर एक सुपारी, लौंग, इलायची, द्रव्य, कपूर, किसमिस तुलसीदल के साथ इत्यादि अर्पित करें, साथ ही ऋतुफल भी अर्पित करें! एक तुलसीदल भगवान् पर भी चढ़ाएं पर रात्रि में उसे हटाना न भूले।

🚫6.एकादशी के दिन सुबह संकल्प लें, मन में मनोकामना करते हुए श्री हरि से व्रत में रहने का संकल्प करें!

🚫7. एकादशी के दिन रात्रि जागरण का विशेष महत्व है, कोशिश करें की इस एकादशी जरूर जागरण करें, इस से व्रत फल 100 गुणा बढ़ जाता है!

🚫8. एकादशी के दिन चावल भूल से भी न छुएं, न ही घर में चावल बनें, इस दिन चावल खाने से बेहद नकरात्मक फल प्राप्त होते हैं, भाग्य खंडित होता है! एकादशी (ग्यारस) के दिन व्रतधारी व्यक्ति को गाजर, शलजम, गोभी, पालक, इत्यादि का सेवन नहीं करना चाहिए। * केला, आम, अंगूर, बादाम, पिस्ता इत्यादि अमृत फलों का सेवन करें। * प्रत्येक वस्तु प्रभु को भोग लगाकर तथा तुलसीदल छोड़कर ग्रहण करना चाहिए।

🚫9. एकादशी के दिन कम से कम बोलें, पापी लोगों से बात न करें, जिनके मन में लालच, पाप या कोई भी अनैतिक तत्व दिखे कम से कम इस दिन उन सभी से दूर रहने का प्रयत्न करें! परनिंदा से बचें!

🚫10.श्री हरि की विशेष कृपा हेतु ॐ नमो भगवते वासुदेवाय की 11 माला सुबह और 11 माला शाम में करें, साथ ही विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ जरूर करें! एकादशी व्रत कथा कहे या सुनें।

🚫11. शाम में केले के पेड़ के नीचे एवं तुलसी में दीपक जलाना न भूले, इसे दीप-दान कहते हैं!

🚫12. माता लक्षमी के बिना विष्णु अधूरे हैं इसलिए माता की भी आरती अवश्य करें, सुबह और शाम शंखनाद एवं घंटियों की ध्वनि में ॐ जय जगदीश हरे की आरती करना न भूले!

🚫13. एकादशी के दिन केले के पेड़ की 7 परिक्रमा करने से धन में बढ़ोतरी होती है!

🚫14. व्रत पंचांग के समयानुसार ही खोलें अन्यथा लाभ की जगह नुक्सान भी हो सकता है, व्रत एवं पूजा के नियमों में करने से ज्यादा कुछ बातें जो हमे नहीं करनी चाहिए वो ही ज्यादा महत्व रखती है. अतः सावधानी से की गई पूजा सर्वश्रेष्ठ फल प्रदान करती है.

🚫15 .आज के दिन किसका त्याग करें- 
🍁मधुर स्वर के लिए गुड़ का। 
🍁दीर्घायु अथवा पुत्र-पौत्रादि की प्राप्ति के लिए तेल का। 
🍁शत्रुनाशादि के लिए कड़वे तेल का। 
🍁सौभाग्य के लिए मीठे तेल का। 
🍁स्वर्ग प्राप्ति के लिए पुष्पादि भोगों का। 

प्रभु शयन के दिनों में सभी प्रकार के मांगलिक कार्य जहाँ तक हो सके न करें। पलंग पर सोना, भार्या का संग करना, झूठ बोलना, मांस, शहद और दूसरे का दिया दही-भात आदि का भोजन करना, मूली, पटोल एवं बैंगन आदि का भी त्याग कर देना चाहिए।

🚫16. दोनों ही दिन शाम में संध्या आरती कर दीपदान करें। अखंड लक्षमी प्राप्त होगी। पैसा घर में रुकेगा।

🚫17. शंख ध्वनि से भी माता लक्ष्मी के साथ भगवान् हरि भी अति प्रसन्न होते हैं। अतः पूजा के समय जरूर शंख का उपयोग करें । पूजा के पहले शुद्धिकरण मंत्र तथा आचमन करना न भूलें क्योंकि इसके बिना पूजा का फल प्राप्त नहीं हो पाता।

🚫18. तुलसी की विधिवत पूजा करके उसकी 7 परिक्रमा करें।

Saturday, 1 June 2019

चलो हवन करें, 2 जून, सबसे विनम्र आग्रह है कि कल छोटे ही स्तर पर सही पर हवन जरूर करें और नीचे लिखे नम्बर पर miss call देकर गुरुदेव के चरणों मे हाज़िरी लगा दें। सारे काम सफल होंगे। जय गुरुदेव।

चलो हवन करें, 2 जून, सबसे विनम्र आग्रह है कि कल छोटे ही स्तर पर सही पर हवन जरूर करें और नीचे लिखे नम्बर पर miss call देकर गुरुदेव के चरणों मे हाज़िरी लगा दें। सारे काम सफल होंगे। जय गुरुदेव।

वट सावित्री व्रत विधि कथा और महत्त्व 2019/ Vat Savitri Vrat Vidhi and katha 2019: Acharya Mukesh/ Astro Nakshatra 27

     वट सावित्री व्रत सौभाग्य को देने वाला और संतान की प्राप्ति में सहायता देने वाला व्रत माना गया है। भारतीय संस्कृति में यह व्रत आदर्श नारीत्व का प्रतीक बन चुका है।

वट सावित्री व्रत की तिथि और शुभ मुहूर्त 
अमावस्‍या तिथि प्रारंभ: 02 जून 2019 को शाम 04 बजकर 39 मिनट से 
अमावस्‍या तिथि समाप्‍त: 03 जून 2019 को दोपहर 03 बजकर 31 मिनट तक

              वट सावित्री व्रत पूजा किस दिन करें ?
वट सावित्री व्रत किस दिन करना चाहिए इसमें किंचित विवाद है ‘स्कंद’ और ‘भविष्योत्तर’ पुराण’ के अनुसार यह व्रत ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा पर करने का विधान है। ‘निर्णयामृत’ इत्यादि ग्रंथों के अनुसार वट सावित्री व्रत पूजा ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष के अमावस्या पर करने का विधान है। उत्तर भारत में यह व्रत ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या को ही किया जाता है।


वट / बरगद वृक्ष का महत्त्व
इस संसार में अनेक प्रकार के वृक्ष है उनमे से बरगद के पेड़ का भी विशेष महत्व है। शास्त्रानुसार – ‘वट मूले तोपवासा’ ऐसा कहा गया है। वट वृक्ष तो दीर्घायु और अमरत्व का प्रतीक है। पुराण के अनुसार बरगद में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का निवास होता है। इस वृक्ष के नीचे बैठकर पूजन, व्रत कथा आदि सुनने से मनोवांक्षित फल की प्राप्ति शीघ्र ही होती है। वट वृक्ष अपनी विशालता तथा दीर्घायु के लिए लोक में प्रसिद्ध है। ऐसा लगता है कि सुहागन महिलाएं वटवृक्ष की पूजा यही समझकर करती है कि मेरे पति भी वट की तरह विशाल और दीर्घायु बने रहे।

कैसे करें वट सावित्री व्रत पूजा

वट सावित्री व्रत पूजन विधि में क्षेत्र के अनुसार कुछ अंतर पाया जाता है। प्रायः सभी भक्त अपने-अपने परम्परा के अनुसार वट सावित्री व्रत पूजा करते हैं। सामान्य पूजा के अनुसार इस दिन महिलाएँ सुबह स्नान कर नए वस्त्र पहनकर, सोलह श्रृंगार करती हैं। इस दिन निराहार रहते हुए सुहागिन महिलाएं वट वृक्ष में कच्चा सूत लपेटते हुए परिक्रमा करती हैं। वट पूजा के समय फल, मिठाई, पूरी, पुआ भींगा हुआ चना और पंखा चढ़ाती हैं । उसके बाद सत्यवान व सावित्री की कथा सुनती हैं। पुनः सावित्री की तरह वट के पत्ते को सिर के पीछे लगाकर घर पहुंचती हैं। इसके बाद पति को पंखा झलती है जल पिलाकर व्रत तोड़ती हैं।

विशेष रूप में इस पूजन में स्त्रियाँ चौबीस बरगद फल (आटे या गुड़ के) और चौबीस पूरियाँ अपने आँचल में रखकर बारह पूरी व बारह बरगद वट वृक्ष में चढ़ा देती हैं। वृक्ष में एक लोटा जल चढ़ाकर हल्दी-रोली लगाकर फल-फूल, धूप-दीप से पूजन करती हैं। कच्चे सूत को हाथ में लेकर वे वृक्ष की बारह परिक्रमा करती हैं। हर परिक्रमा पर एक चना वृक्ष में चढ़ाती जाती हैं। और सूत तने पर लपेटती जाती हैं।

परिक्रमा के पूरी होने के बाद सत्यवान व सावित्री की कथा सुनती हैं। उसके बाद बारह कच्चे धागा वाली एक माला वृक्ष पर चढ़ाती हैं और एक को अपने गले में डालती हैं। पुनः छः बार माला को वृक्ष से बदलती हैं, बाद में एक माला चढ़ी रहने देती हैं और एक स्वयं पहन लेती हैं। जब पूजा समाप्त हो जाती है तब स्त्रियाँ ग्यारह चने व वृक्ष की बौड़ी (वृक्ष की लाल रंग की कली) तोड़कर जल से निगलती हैं।
और इस तरह व्रत तोड़ती हैं।

वट सावित्री पूजन सामग्री 

सत्यवान-सावित्री की मूर्ति, धूप, मिट्टी का दीपक, घी, फूल, फल, 24 पूरियां, 24 बरगद फल (आटे या गुड़ के) बांस का पंखा, लाल धागा, कपड़ा, सिंदूर, जल से भरा हुआ पात्र और रोली. 

वट सावित्री व्रत विधि 

- महिलाएं सुबह उठकर स्‍नान कर नए वस्‍त्र पहनें और सोलह श्रृंगार करें. 
- अब निर्जला व्रत का संकल्‍प लें और घर के मंदिर में पूजन करें. 
- अब 24 बरगद फल (आटे या गुड़ के) और 24 पूरियां अपने आंचल में रखकर वट वृक्ष पूजन के लिए जाएं. 
- अब 12 पूरियां और 12 बरगद फल वट वृक्ष पर चढ़ा दें. 
- इसके बाद वट वृक्ष पर एक लोट जल चढ़ाएं. 
- फिर वट वक्ष को हल्‍दी, रोली और अक्षत लगाएं. 
- अब फल और मिठाई अर्पित करें. 
- इसके बाद धूप-दीप से पूजन करें. 
- अब वट वृक्ष में कच्‍चे सूत को लपटते हुए 12 बार परिक्रमा करें. 
- हर परिक्रमा पर एक भीगा हुआ चना चढ़ाते जाएं. 
- परिक्रमा पूरी होने के बाद सत्‍यवान व सावित्री की कथा सुनें. 
- अब 12 कच्‍चे धागे वाली एक माला वृक्ष पर चढ़ाएं और दूसरी खुद पहन लें. 
- अब 6 बार माला को वृक्ष से बदलें और अंत में एक माला वृक्ष को चढ़ाएं और एक अपने गले में पहन लें. 
- पूजा खत्‍म होने के बाद घर आकर पति को बांस का पंख झलें और उन्‍हें पानी पिलाएं.
- अब 11 चने और वट वृक्ष की लाल रंग की कली को पानी से निगलकर अपना व्रत तोड़ें. 

इसके पीछे यह मिथक है कि सत्यवान जब तक मरणावस्था में थे तब तक सावित्री को अपनी कोई सुध नहीं थी लेकिन जैसे ही यमराज ने सत्यवान को जीवित कर दिए तब सावित्री ने अपने पति सत्यवान को जल पिलाकर स्वयं वटवृक्ष की बौंडी खाकर जल ग्रहण की थी।

                           

वट सावित्री व्रत कथा

कथा के अनुसार सावित्री ने अपने पति की प्राण रक्षा के लिए निराहार व्रत किया और विष्णु की आराधना करने लगी। अमावस्या के दिन सत्यवान का प्राण लेने यमराज आए, लेकिन सावित्री की भक्तिसे प्रसन्न होकर सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दे दिया। जब यमराज पति का प्राण लेकर जाने लगे, तो वह पीछे लग गई। आखिरकार यमराज ने प्राण लौटाना पड़ा | 

सावित्री सत्यवान कथा | 

महाभारत के वनपर्व में सावित्री और सत्यवान की कथा का वर्णन मिलता है। वन में युधिष्ठिर मार्कण्डेय मुनि से पूछते है कि क्या कोई अन्य नारी भी द्रोपदी की जैसे पतिव्रता हुई है जो पैदा तो राजकुल में हुई है पर पतिव्रत धर्म निभाने के लिए जंगल-जंगल भटक रही है। तब मार्कण्डेय मुनि युधिष्ठर से कहते है की पहले भी सावित्री नाम की एक कन्या हुई थी जो इससे भी कठिन पतिव्रत धर्म का पालन कर चुकी है तब युधिष्ठिर मुनि से आग्रह करते है की कृप्या वह कथा मुझे सुनाये —

मुनि कथा सुनाते हुए कहते है —

मद्र देश में अश्वपति नाम का एक बड़ा ही धार्मिक राजा हुआ करता था। जिसकी पुत्री का नाम सावित्री था। सावित्री जब विवाह योग्य हो गई तब महाराज उसके विवाह के लिए बहुत चिंतित थे। महाराज अपनी पुत्री के लिए योग्य वर ढूंढने के लिए बहुत प्रयास किये परन्तु अपनी पुत्री के लिए योग्य वर नहीं ढूंढ सके। तब अन्ततः उन्होंने सावित्री से कहा बेटी अब आप विवाह के योग्य हो गयी है इसलिए स्वयं ही अपने योग्य वर चुनकर उससे विवाह कर लें।तब राजकुमारी शीघ्र ही वर की तलाश में चल दी। तलाश करते करते वह शाल्व देश के राजा के पुत्र सत्यवान जो जंगल में ही पले बढे थे को अपने पति के रूप में स्वीकार की।

राजकुमारी अपने देश लौटकर दरबार में पहुंची तो और राजा देवर्षि नारद जी से मंत्रणा कर रहे थे राजा ने अपनी पुत्री से वर के चुनाव के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि उन्होंने शाल्वदेश के राजा के पुत्र को पति रूप में स्वीकार किया है। जिसका नाम सत्यवान है। तब नारदमुनि बोले राजन ये तो बहुत ही दुःख की बात है क्योंकि इस वर में एक दोष है तत्क्षण राजा ने पूछा भगवन बताये वो कौन सा दोष है ? तब नारदजी ने कहा जो वर सावित्री ने चुना है उसकी आयु बहुत ही कम है। वह सिर्फ एक वर्ष के बाद मरने वाला है। उसके बाद वह अपना देहत्याग देगा। तब सावित्री ने कहा पिताजी कन्यादान एक बार ही किया जाता है जिसे मैंने एक बार वरण कर लिया है। मैं उसी से विवाह करूंगी आप उसे कन्यादान कर दें। उसके बाद सावित्री के द्वारा चुने हुए वर सत्यवान से धुमधाम और पूरे विधि-विधान से विवाह करवा दिया गया।

सत्यवान व सावित्री के विवाह के कुछ समय बीत जाने के बाद जिस दिन सत्यवान मरने वाला था वह दिन नजदीक आ चुका था । सावित्री एक-एक दिन गिनती रहती थी। उसके दिल में नारदजी का वचन सदा ही बना रहता था। जब उसने देखा कि अब इन्हें चौथे दिन मरना है। उसने तीन दिन तक व्रत धारण किया। जब सत्यवान जंगल में लकड़ी काटने गया तो सावित्री ने उससे कहा कि मैं भी साथ चलुंगी। तब सत्यवान ने सावित्री से कहा तुम व्रत के कारण कमजोर हो रही हो। जंगल का रास्ता बहुत कठिन और परेशानियों भरा है। इसलिए आप यहीं रहें। लेकिन सावित्री नहीं मानी उसने जिद पकड़ ली और सत्यवान के साथ जंगल की ओर चल दी ।

सत्यवान जब लकड़ी काटने लगा तो एकदम उसकी तबीयत खराब होने लगी तब वह सावित्री से बोला मेरी तबियत खराब हो रही है अब मई बैठ भी नहीं सकता हू तब सावित्री ने सत्यवान का सिर अपनी गोद में रख लिया। पुनः वह नारदजी की बात स्मरण कर मन ही माह दिन व समय का विचार करने लगी। वैसे ही वहां एक भयानक पुरुष दिखाई दिया जिसके हाथ में पाश था। वे यमराज थे। सावित्री पूछी आप कौन है तब यमराज ने कहा मैं यमराज हूं। इसके बाद यमराज ने सत्यवान के शरीर में से प्राण निकालकर उसे पाश में बांधकर दक्षिण दिशा की ओर चल दिए। सावित्री बोली मेरे पतिदेव को जहां भी ले जाया जाएगा मैं भी वहां जाऊंगी। तब यमराज ने उसे समझाते हुए कहा मैं उसके प्राण नहीं वापस नहीं लौटा सकता हू पतिव्रता स्त्री होने के कारण मझसे मनचाहा वर मांग लो।

सावित्री ने वर में अपने श्वसुर के आंखे मांग ली। यमराज ने कहा तथास्तु। उसके बाद भी सावित्री उनके पीछे-पीछे चलने लगी। तब यमराज ने उसे पुनःसमझाया और वर मांगने को कहा उसने दूसरा वर मांगा कि मेरे श्वसुर को उनका पूरा राज्य वापस मिल जाए। उसके बाद तीसरा वर मांगा मेरे पिता जिन्हें कोई पुत्र नहीं हैं उन्हें सौ पुत्र हों। यमराज कहा तथास्तु।

पुनः सावित्री उनके पीछे-पीछे चलने लगी यमराज ने कहा सावित्री तुम वापस लौट जाओ चाहो तो मुझसे कोई और वर मांग लो। तब सावित्री ने कहा मुझे सत्यवान से सौ यशस्वी पुत्र हों। यमराज ने कहा तथास्तु। यमराज फिर सत्यवान के प्राणों को अपने पाश में जकड़े आगे बढऩे लगे। सावित्री ने फिर भी हार नहीं मानी तब यमराज ने कहा तुम वापस लौट जाओ तब सावित्री ने कहा मैं कैसे वापस लौट जाऊं । आपने ही मुझे सत्यवान से सौ यशस्वी पुत्र उत्पन्न करने का आशीर्वाद दिया है। तब यमराज ने सत्यवान के प्राण वापस लौटा दिए और जीवित कर दिए। उसके बाद सावित्री जब सत्यवान के शव के पास पहुंची तो कुछ ही देर में सत्यवान के शव में चेतना आ गई और सत्यवान जीवित हो गया उसके बाद सावित्री अपने को पति को पानी पिलाकर पुनः पानी पीकर अपना व्रत तोड़ी।




Tuesday, 30 April 2019

सबसे अधिक शुभ मुहूर्त यानी अक्षय तृतीया, पढ़ें विशेष महत्व/ अक्षय तृतीया पर कर लें यह सरल उपाय, बन जाएंगे मालमाल




वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीया को ही अक्षय तृतीया कहते हैं। इस बार अक्षय तृतीया का महापर्व 7 मई 2019 को है। इस दिन मांगलिक कार्य, मुंडन, शादी-विवाह, बहू का प्रथम बार रसोई स्पर्श, दुकान का उद्घाटन, व्यापार का प्रारंभ और सारे शुभ कार्य किए जाते हैं.

अक्षय तृतीया पूजा मुहूर्त = 05:40 से 12:18 तक

अक्षय तृतीया का महत्व
   
अक्षय तृतीया का सर्वसिद्ध मुहूर्त के रूप में भी विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन बिना कोई पंचांग देखे कोई भी शुभ व मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह-प्रवेश, वस्त्र-आभूषणों की खरीददारी या घर, भूखंड, वाहन आदि की खरीददारी से संबंधित कार्य किए जा सकते हैं। नवीन वस्त्र, आभूषण आदि धारण करने और नई संस्था, समाज आदि की स्थापना या उदघाटन का कार्य श्रेष्ठ माना जाता है। पुराणों में लिखा है कि इस दिन पितरों को किया गया तर्पण तथा पिन्डदान अथवा किसी और प्रकार का दान, अक्षय फल प्रदान करता है। इस दिन गंगा स्नान करने से तथा भगवत पूजन से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। यहाँ तक कि इस दिन किया गया जप, तप, हवन, स्वाध्याय और दान भी अक्षय हो जाता है। यह तिथि यदि सोमवार तथा रोहिणी नक्षत्र के दिन आए तो इस दिन किए गए दान, जप-तप का फल बहुत अधिक बढ़ जाता हैं। इसके अतिरिक्त यदि यह तृतीयामध्याह्न से पहले शुरू होकर प्रदोष काल तक रहे तो बहुत ही श्रेष्ठ मानी जाती है। यह भी माना जाता है कि आज के दिन मनुष्य अपने या स्वजनों द्वारा किए गए जाने-अनजाने अपराधों की सच्चे मन से ईश्वर से क्षमा प्रार्थना करे तो भगवान उसके अपराधों को क्षमा कर देते हैं और उसे सदगुण प्रदान करते हैं, अतः आज के दिन अपने दुर्गुणों को भगवान के चरणों में सदा के लिए अर्पित कर उनसे सदगुणों का वरदान माँगने की परंपरा भी है।

अक्षय तृतीया के दिन दिया गया दान कभी नष्ट नहीं होता। उसका फल आपको इस जन्म के साथ साथ कई जन्मों तक मिलता रहता है। आइए जानें 18 ऐसे काम जिनमें से अगर आपने अपनी सुविधा के अनुसार 2 भी कर लिए तो हो जाएंगे मालामाल...


1. इस दिन लोगों को मीठा खिलाएं और शीतल जल पिलाएं।

2. साथ ही गर्मी से बचने के लिए जरूरतमंदों को छाता, मटकी और पंखे का दान करें।

3. मंदिरों में वॉटर कूलर लगवाएं और भंडारा करवाते हुए मिठाई खिलाइएं। इससे आपको उस पुण्य की प्राप्ति होगी जिसका कभी क्षय नहीं हो सकता है।

4. अक्षय तृतीया को श्री विष्णु भगवान की पूजा माता लक्ष्मी के साथ साथ करना चाहिए।

5. श्री विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ और श्री सूक्त का पाठ जीवन में धन, यश, पद और प्रतिष्ठा की प्राप्ति कराएगा।

6. अक्षय तृतीया की पूजा में भगवान विष्णु को पीला पुष्प अर्पित करें और पीला वस्त्र धारण कराकर घी के 9 दीपक जलाकर पूजा प्रारंभ करें।

7. जो लोग बीमारियों से ग्रस्त हैं उनको आज के दिन रामरक्षा स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए।

8. अक्षय तृतीया के दिन चांदी के सिक्के और स्वर्ण आभूषणों की खरीददारी कीजिए।

9. नए वस्त्र धारण करें और मंदिर में अन्न और फल का दान करें।

10.अस्पतालों में मीठा,जल और फल का वितरण करने से अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है।

11. इस दिन अपने मित्रों को और विद्वानों को धार्मिक पुस्तक का दान करने से देव गुरु बृहस्पति प्रसन्न होते हैं।

12. विद्यार्थियों को इस दिन कठिन परिश्रम का प्रतिज्ञा करना चाहिए। छात्रों को दृढ़ संकल्पित होकर आज ईश्वर के सामने यह संकल्प लेना चाहिए कि हम आज से कठिन परिश्रम करेंगे और माता पिता का चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करने के साथ साथ गुरु का भी आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए क्योंकि माता, पिता और गुरु का आशीर्वाद आज के दिन अनंत गुना फलदायी होता है।

13.इस महापर्व पर कोई भी शुभ कार्य प्रारम्भ कर सकते हैं। वाहन खरीद सकते हैं। विवाह और कोई भी शुभ मांगलिक कार्य इत्यादि कर सकते हैं।

14. इस दिन छाते का दान अवश्य करें। जगह-जगह लोगों को जल पिलाने की व्यवस्था करें।

15. भोजन में सत्तू का प्रयोग करें। इस दिन सत्तू दान का बहुत महत्व है।

16. मंदिर में जल का पात्र और पूजा की थाल, घंटी इत्यादि का दान करें।

17. लोगों में धार्मिक पुस्तक बांटें और अपने घर के मंदिर में पूरे 24 घंटे घी का दीपक जलाएं।

18. इस दिन श्री रामचरितमानस के अरण्य काण्ड का पाठ करना चाहिए। इस काण्‍ड में भगवान राम ऋषियों और महान संतों को दर्शन देते हैं और उनके जन्म जन्मान्तर के पुण्य का फल प्रदान करते हैं। इस काण्ड का पाठ करने से भगवान श्री राम की भक्ति प्राप्त होती है।

इस व्रत अनुष्ठान करने वाले के संतान अक्षय हो जाती है । इसी तिथि को सत्ययुग का आरम्भ हुआ था, इसी दिन नर-नारायण, परशुराम और हयग्रीव का अवतार हुआ था।इनकी जयंतियाँ भी अक्षय तृतीया को मनायी जाती है।
अक्षय तृतीया का कभी क्षय नहीं होता। यह पूर्णता के साथ आती है। पूरे वर्ष के किसी भी तिथि का क्षय हो सकता है किंतु अक्षय तृतीया का क्षय नहीं होता। यह तिथि सभी कार्य के लिये शुभ कही गयी है। इसी तिथि को श्री बदरीनारायण के पट खुलते हैं। इसी तिथि को बांके बिहारी जी के चरणों के दर्शन वर्ष में एक बार होते हैं। इस दिन गंगा जी में स्नान का बड़ा भारी महात्म्य है। जो व्यक्ति इस तिथि को गंगा-स्नान करता है, उसे सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है।

इस तिथि को ब्राह्मणों को जल से भरा हुआ कलश, पंखा, जूता एवं गर्मी में उपयोग में आने वाली वस्तुएँ दान की जाती है जिससे कि ये वस्तुएँ हमारे पूर्वज के पास स्वर्ग में पहुँच जाये। सुहागन स्त्रियाँ और कन्याएँ इस तिथि को गौरी की पूजा भी करती है एवं भींगे हुये चने, मिष्ठान और फल बाँटती है। इस तिथि के महात्म्य के श्रवण के बाद अन्य कोई महात्म्य के श्रवण की आवश्यकता नहीं रह जाती। यह अत्यन्त महिमामयी एवं परम सौभाग्यदायिनी है।
अक्ष य तृतीया को स्नान कर विष्णु भगवान का लक्ष्मी सहित पूजन करें। उसके बाद जल से भरा हुआ घड़ा, अन्य दान की सामग्री, गर्मी में उपयोग होने वाले वस्तुओं के साथ किसी योग्य ब्राह्मण को दान करें।


अक्षय तृतीया के दिन दान करने वाली वस्तुएँ:-

गन्ने के रस से बने हुये मिष्ठान, दूध से बने हुये खाद्य पदार्थ, दही, चावल, खीरा, ककड़ी, खरबूज, लड्डू, नमक, घी, पंखा, वस्त्र, जूता, सत्तू , जल से भरा हुआ घड़ा इत्यादि ब्राह्मणों को दान देना चाहिये।
अक्षय तृतीया पूजन विधि:-


अक्षय तृतीया को प्रात: काल उठ कर नित्य कर्म से निवृत हो जायें । यदि सम्भव हो तो किसी पवित्र नदी में स्नान करें अन्यथा घर में ही गंगाजल मिलाकर स्नान कर लें। पूजा स्थल को स्वच्छ कर लें। सभी पूजन सामग्री के साथ आसन पर बैठ जायें। चौकी या लकड़ी के पटरे पर विष्णु भगवान और माता लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें।


गणेश पूजन:- 

सबसे पहले गणेश जी का पूजन पंचोपचार विधि से करें। चौकी के पास हीं किसी पात्र में गणेश जी के विग्रह को रखकर पूजन करें। यदि गणेश जी की मूर्ति उपलब्ध न हो तो सुपारी पर मौली लपेट कर गणेशजी बनायें। 
                                 
अब विधिपूर्वक भगवान विष्णु की पूजा करें। धूप,दीप, पुष्प अर्पित करें। नैवेद्य के रूप में मिष्ठान के साथ जौ, गेहूँ के दाने, सत्तू, चने की दाल, अक्ष त इत्यादि अर्पित करें। साथ में तुलसी दल भी अर्पित करें। विष्णु भगवान के “ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नम:” मंत्र का 108 बार जाप करें अथवा विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। अक्षय तृतीया की कथा एवं महात्म्य को सुने अथवा सुनायें। इसके बाद आरती करें। आरती के बाद प्रभु को आरती दें। तत्पश्चात सभी उपस्थित जन को आरती दें एवं स्वयं भी लें ।

Acharya Mukesh

AKSHAYA TRITIYA 2019/ Shubh Muhurat


Tuesday, 
7 May  2019
The word Akshaya (अक्षय) means never diminishing. Hence the benefits of doing any Japa, Yajna, Pitra-Tarpan, Dan-Punya on this day never diminish and remain with the person forever.

Akshaya Tritiya Puja Muhurat = 05:40 to 12:18
Duration = 6 Hours 37 Mins
Auspicious time to buy Gold
Tritiya Tithi Begins = 03:17 on 7/May/2019
Tritiya Tithi Ends = 02:17 on 8/May/2019

Akshaya Tritiya is a very popular festival that the Hindus and Jains celebrate every year. It is considered as one of the most important days for Hindu community as it is the day of the birth of the Lord Parasurama. The Hindu community considers this day as a lucky day and believes that any venture such as a business or the construction of a building started on that day will follow betterment and prosperity. Akshaya Tritiya is a one day event celebrated in late April or early May. Hindus celebrate this day because, according to them, Akshaya Tritiya is the day when the great God of Wisdom, God Ganesha, started writing the epic work called "Mahabharata". It is believed that when the Pandavas were in exile the Lord presented them a bowl which was named Akshaya Tritiya. That bowl was never empty and produces an unlimited amount of food on demand.

Akshaya Tritiya is considered as the most golden day of the year because the word Akshaya means the most "Eternal" that which never diminishes. Any initiative made on that day or anything bought on that day is considered to be good fortune. The most popular activity is the buying of gold and it is believed it will be a sign of good fortune for the buyer. In the Indian culture people typically starts a new business or begins a new venture on Akshaya Tritiya. This is also one of the most popular days for weddings to take plans as the spirit of this day bids them on a very long and fulfilling life journey. It was also believed that people born in that month will be very lucky and will shine bright throughout their life.

The most popular story regarding the celebration of Akshaya Tritiya is that Lord Karishna and Sudama were friends during their childhood. Sudama was poor and he went to Karishna to ask him for some financial help or to give him money as a gift as a friend. Sudama did not have anything else except the pouch of Poha and he felt ashamed when he gave it to Karishna as he treated Poha as a king. His poor friend was overwhelmed by the hospitality shown by the Lord Karishna that he could not ask his friend for financial support which led him to go home empty-handed. When he arrived at his home he saw that his run-down hut was converted into a palace and his family was wearing royal attire. Sudama knew that this was the blessing of his friend Krishna who blessed him with more wealth than he needed or could ever imagine. This is why Akshaya Tritiya is associated with material gains.

Akshaya Tritiya is believed to bring good luck and success. Most people purchase Gold on this day as it is believed that buying Gold on Akshaya Tritiya brings prosperity and more wealth in coming future. Being Akshaya day it is believed that Gold, bought on this day, will never diminish and would continue to grow or appreciate.

Akshaya Tritiya day is ruled by God Vishnu who is the preserver God in the Hindu Trinity. According to Hindu mythology Treta Yuga began on Akshaya Tritiya day. Usually Akshaya Tritiya and Parashurama Jayanti, birthday anniversary of 6th incarnation of Lord Vishnu, falls on the same day but depending on staring time of Tritiya Tithi Parashurama Jayanti might fall one day before Akshaya Tritiya day.

Acharya Mukesh

Thursday, 4 April 2019

6 April, 2019 चैत्र नवरात्र में घट-स्‍थापना इस बार दोपहर में, पुरे दिन रहेगा अशुभ योग, जाने शुभ मुहूर्त्त एवं समय


घट स्‍थापना का शुभ मुहूर्त 
पंचांग के अनुसार, 5 अप्रैल 2019 के दिन शुक्रवार दोपहर 1 बजकर 36 मिनट से ही प्रतिपदा लग जाएगी, जो कि अगले दिन यानी 6 अप्रैल को दोपहर 2 बजकर 58 मिनट तक रहेगी। मगर नवरात्र का आरंभ 6 अप्रैल को सूर्योदय के बाद से ही माना जाएगा। इसी दिन कलश स्‍थापना भी की जाएगी। माना जा रहा है कि 6 अप्रैल को दोपहर 3 बजकर 24 मिनट पर प्रतिपदा तिथि समाप्त हो जाएगी इसके बाद द्वितीया तिथि का आरंभ होगा।


दोपहर में घट स्‍थापना 
चैत्र प्रतिपदा यानी नवरात्र के पहले दिन शाम 9 बजकर 47 मिनट तक वैघृति योग है। शास्त्रों में बताया गया है कि इस योग को छोड़कर कलश स्थापित स्थापित करना चाहिए। लेकिन जब पूरे दिन वैधृति योग हो तब स्थिति में पूर्वार्ध भाग को छोड़कर कलश स्थापित करना चाहिए। ऐसे में 9 बजकर 57 मिनट के बाद कलश बैठाया जा सकता है।लेकिन इसके लिए शुभ मुहूर्त दोपहर 11 बजकर 59 मिनटसे लेकर 12 बजकर 49 मिनट तक उत्तम है क्योंकि इस समय अभिजित मुहूर्त होगा।


Tuesday, 2 April 2019

चैत्र नवरात्र: इस बार घोड़े पर आएंगी मां भगवती और हाथी पर विदा होंगी

चैत्र नवरात्र जो कि इस वर्ष छह अप्रैल को प्रारंभ होगा। यह 14 अप्रैल तक जारी रहेगा। इस वर्ष मां भक्तों को दर्शन देने के लिए घोड़े पर सवार होकर आ रही है और हाथी पर विदा होंगी। यूं तो सभी को पता है कि मां दुर्गा का वाहन सिंह है परंतु नवरात्रि को तिथि और दिन के अनुसार मां भक्तों को अलग-अलग सवारी के साथ दर्शन देती है। 
धर्म शास्त्रों के अनुसार वर्ष में चार बार नवरात्रि का पर्व आता है, किन्तु इनमें से दो नवरात्रि - चैत्र और आषाढ़ ही लोगों के बीच लोकप्रिय है। पुराणों के अनुसार चैत्र नवरात्रों का समय बहुत ही भाग्यशाली बताया गया है। इसका एक कारण यह भी है कि प्रकृति में इस समय हर और नये जीवन का, एक नई उम्मीद का बीज अंकुरित होने लगता है। जनमानस में भी एक नई उर्जा का संचार हो रहा होता है।
हिन्दू धर्म में प्रत्येक देवी-देवता की एक सवारी (वाहन) है। हर देवी-देवता से जुड़े वाहन का महत्व एवं उसके पीछे एक अर्थ भी छिपा है। मां भगवती की सवारी शेर (बाघ) है। हर देवी मंदिर में आप ने मां दुर्गा को शेर की सवारी करते हुए ही पाएंगे। किन्तु नवरात्रि पर्व की बात करें तो इस दौरान अपने भक्तों को दर्शन के लिए देवी अलग-अलग वाहनों पर सवार होकर आती हैं।
चैत्र नवरात्रि 2019 के पावन पर्व के लिए मां भगवती 'घोड़े' की सवारी करके आएंगी। चैत्र नवरात्रि जो कि इस वर्ष 6 अप्रैल 2019, दिन शनिवार से प्रारम्भ होकर 14 अप्रैल 2019, दिन रविवार तक चलेंगे, देवी 'हाथी' की सवारी करते हुए पृथ्वी से विदा लेंगी।

धर्म ग्रंथो में कहा गया है - 'शशिसूर्ये गजारूढ़ा शनिभौमे तुरंगमे। गुरौ शुक्रे च दोलायां बुधे नौका प्रकी‌र्त्तिता', इस कथन में कलश स्थापन के प्रथम दिन के हिसाब से ही देवी के वाहन का पता लगाया जाता है। वे क्या दिन हैं, आगे जानें: