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Acharya Mukesh

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌॥

Acharya Mukesh...Astro Nakshatra 27

“कुछ अलग करना है, तो भीड़ से हट कर चलो, भीड़ साहस तो देती है, पर पहचान छिन लेती है।”

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Saturday, 26 October 2019

मान्यताएं : धनतेरस पर खरीदें झाड़ू: होगी धन की बरसात | ACHARYA MUKESH


धनतेरस या धन त्रयोदशी पर खरीदारी की परंपरा है। मान्यता है कि धनतेरस पर खरीदी गयी वस्तु का नाश नहीं होता और इसमें तेरह गुना वृद्धि हो जाती है। आम लोग इसलिए धनतेरस पर सोना, चांदी, भूमि, वाहन और घर में इस्तेमाल होने वाली चीजों की खरीदारी करते हैं। इन वस्तुओं के साथ झाड़ू खरीदने की भी अनोखी परंपरा है। लोग सोना-चांदी या उसके गहने खरीदें या नहीं पर झाड़ू जरूर खरीदते हैं। दीपावली के दिन झाड़ू का पूजन करके अगले दिन उसका इस्तेमाल करना चाहिए.

सफेद रंग का धागा: 
धनतेरस पर खरीदी गर्इ झाड़ू से जुड़ा पहला नियम कहता है कि जब आप उसे खरीदकर अपने घर लायें तो उसके हैंडल पर एक सफेद रंग का धागा बांध लें. ऐसा करने से मां लक्ष्मी आपके घर में स्थिर बनी रहती हैं.




 मत्स्य पुराण के अनुसार झाड़ू को मां लक्ष्मी का रूप माना गया है। 

बृहत संहिता में झाड़ू को सुख की वृद्धि करने वाला और दुष्ट शक्तियों का नाश करने वाला बताया गया है।

 धर्मग्रंथ मनुस्मृति में झाड़ू को घर में दरिद्रता को हटाने का कारक कहा गया है। इसके इस्तेमाल से मनुष्य की दरिद्रता दूर होती है। घर में झाड़ू से झाड़ लगाने से कर्ज से भी मुक्ति मिलती है। 

झाड़ू के चलते हुई द्रौपदी की शादी 

झाड़ू की चर्चा महाभारत में भी मिलती है। भगवान श्रीकृष्ण ने झाड़ (झाड़ू) से अर्जुन-द्रौपदी की शादी होने, दुर्बलता से शक्ति प्राप्त करने और धनाढ्य होने की कहानी बतायी है। आचार्य के अनुसार महाभारत के नायक अर्जुन और द्रौपदी की शादी होने में झाड़ू की अहम भूमिका रही थी। दंत कथाओं के अनुसार द्रौपदी की शादी अर्जुन से नहीं हो पा रही थी। तब एक टोटका किया गया। घर में झाड़ू से झाड़ लगायी गयी। इसके बाद द्रौपदी और अर्जुन की शादी हो गयी।

झाड़ू खड़ा रखने से शत्रु बाधा पैदा करते हैं


झाड़ू को घर में छिपा कर रखने और सही स्थान पर रखने की परंपरा है। मान्यता है कि झाड़ू को खड़ा रखने से शत्रु बाधा से परेशानी होती है। झाड़ू को लिटा कर या छुपा कर रखने से दुष्ट शक्ति और शत्रु की परेशानी नहीं झेलनी पड़ती है। 

                            तीन तरह की होती है झाड़ू 

कुश की झाड़ू:-पूजा स्थल और तंत्र शक्तियों में इस्तेमाल किया जाता है .

मोरपंख की झाड़ू:-देवताओं की बलैया और न्योछावर करने में इस्तेमाल

फूल-परागन झाड़ू: इस झाड़ू से घर को झाड़ने पर दरिद्रता का नाश होता है|


एक साथ तीन झाड़ू: 

आपने हमेशा अपने बड़ों के मुंह से यह करते सुना होगा कि कभी भी कोई चीज तीन नहीं खरीदनी चाहिये| यहां तक कि कोई भी चीज कभी तीन लेकर भी नहीं बैठनी चाहिये. लेकिन धनतेरस वाले दिन यह कोशिश करनी चाहिए कि झाडू हमेशा तीन से सेट में ही खरीदें कभी भी दो या चार के सेट में ना खरीदें.

झाड़ू ढककर रखें: 

झाड़ू को हमेशा ढककर रखें. अगर आप झाड़ू को खुले में कहीं भी उठाकर रख देते हैं तो याद रखें कि यह आपके घर में कलह की बड़ी वजह तक बन सकता है. इससे परिवार के कर्इ लोगों में मनमुटाव या झगड़े तक की नौबत आ जाती है.

मंदिर में झाड़ू दान: 

झाडू से जुड़ी एक और भी मान्यता है कि दिवाली वाले दिन झाडू मंदिर में दान में देने से मां की कृपा होती है. लेकिन, यह भी ध्यान रखें के दिवाली के दिन सूर्योदय से पहले ही झाडू मंदिर में दान करें. लेकिन, आपको इस सभी बातों के साथ एक और बात का भी ध्यान रखना होगा वह है कि आपको धनतेरस से पहले से झाडू खरीद लेनी होगी.

                                            सावधानियां :--


हिंदू धर्म में झाडू को देवी लक्ष्मी का सूचक माना जाता है इसलिए कभी भी झाडू को पैर से नहीं लगाना चाहिए। क्योंकि ऐसा करना देवी लक्ष्मी का अपमान माना जाता है.. इससे आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता है।साथ ही झाड़ू को ऐसे स्थान पर भी नही रखना चाहिए जहां जूते, चप्पल रखे हों।


घर में झाड़ू रखने के समय ये ध्यान रखना चाहिए कि झाड़ू कभी भी ऐसे स्थान पर ना हो जहां बाहरी लोगों की सीधी नजर उस पर पड़ें..इसे हमेशा छुपा कर रखना चाहिए। साथ ही ये भी ध्यान रहे कि इसे घर के ईशान कोण में नहीं रखनी चाहिए क्योंकि इससे देव आगमन में बाधाएं आती हैं और दुर्भाग्य स्वयं चलकर घर में प्रवेश करता है। झाड़ू को रखने का सबसे उचित स्थान घर का दक्षिण पश्चिम कोण बताया गया है।


सूर्यास्त के पश्चात घर में झाडू नहीं लगाना चाहिए.. ऐसा करने से लक्ष्मी रुष्ट हो जाती है।घर में झाड़ू लगाने का उचित समय दिन के पहले चार पहर बताए गए हैं। रात के चार पहरों में झाड़ू लगाने से दरीद्रता अपने पैर पसारती है।


कई बार लोग घर में झाड़ू को खड़ा कर रख देते हैं लेकिन वास्तु की दृष्टि से ये बेहद हानिकारक है इससे घर में बेवजह कलह होता रहता है…साथ ही इससे भाग्य के मार्ग में अनेक बाधाएं आने लगती हैं तथा देवी लक्ष्मी रुष्ट होती हैं.. इसलिए झाड़ू को हमेशा लेटाकर ही रखें।

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1. मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए किसी भी मंदिर में ब्रह्म मुहूर्त में तीन झाड़ुओं का गुप्त दान करें। साथ ही झाड़ू दान करने के पहले शुभ मुहूर्त अवश्य देख लें। अगर उस दिन कोई शुभ योग, त्योहार हो तो इस दान की महत्ता बढ़ जाती है और घर में स्थाई लक्ष्मी का वास होता है।

2. आप अगर किसी नए घर में प्रवेश करें, तो ये ध्यान रहे कि नई झाड़ू लेकर ही घर के अंदर जाए.. यह शुभ शकुन माना जाता है.. इससे नए घर में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहेगी।

3. शनिवार वाले दिन नई झाडू का उपयोग करना शुभ माना जाता है।

ACHARYA MUKESH
ASTRO NAKSHATRA 27

Thursday, 24 October 2019

धन-धान्य, सुख-संपदा के लिए दिवाली के 11 सरलतम टोटके: Aacharya Mukesh /Astro Nakshatra 27


दिवाली के दिन धन-धान्य की कामना की जाती है। पुराने समय से जहां इस दिन साधु लोग सिद्धि की कामना करते हैं तो वहीं तंत्र-मंत्र को मनाने वाले टोटकों में श्रृद्धा रखते हैं। इस दीपावली आप भी इन टोटकों को अपनाकर अपनी आर्थिक समस्याओ से छुटकारा पा सकते हैं।

यदि आप चाहते है कि आपकी आय में वृद्धि हो तो दिवाली को साबुत उड़द, दही और सिंदूर लेकर पीपल की जड़ में रखें और एक दीपक जलाएं।

यदि आप चाहते है कि आपको जल्दी धन लाभ हो उसके लिए दीपावली की शाम में किसी बरगद के पेड़ की जटा में गांठ लगाएं और धन लाभ मिलने के बाद इस गांठ को खोल दें।

देवी लक्ष्मी की पूजा के समय गोमती चक्र को पूजा की थाली में रखकर मां की पूजा करें। ऐसा करने से आपका धन बढ़ेगा।

दीपावली की रात उल्लू की तस्वीर तिजोरी पर लगाएं। माना जाता है कि उल्लू हर पूर्णिमा को पीपल के चक्कर लगाता है जहां लक्ष्मी विराजती हैं और कहा भी जाता है कि उल्लू की तस्वीर यहां पर होने से देवी लक्ष्मी आपकी तिजोरी में हमेशा बनी रहेगीं।

देवी लक्ष्मी को दिवाली के दिन काली हल्दी अर्पित करें और पूजा के बाद हल्दी को लाल कपड़े में बांधकर धन रखने के स्थान पर रखें।

तुलसी के पौधे पर लाल या पीले रंग का वस्त्र चढ़ाएं और इसकी जड़ में एक घी का दीप जलाकर रखें।

ब्रह्म मुहूर्त में लक्ष्मीजी के मंदिर में जाकर पूजन-अर्चन कर, गुलाब का इत्र, गुलाब की अगरबत्ती, कमल पुष्प, लाल गुलाबी वस्त्र तथा खीर का नैवेद्य लगाएं। माता लक्ष्मी की कृपा वर्षभर बनी रहेगी। 

लक्ष्मी पूजन में गन्ना, कमल पुष्प, कमल गट्टे, नागकेसर, आंवला, खीर का प्रयोग धन प्राप्ति के मार्ग प्रशस्त करता है। 

 दीपावली पूजन में कुछ नागकेसर, कमल तथा लाल वस्त्र में बांधकर धन रखने की जगह रख दें। धन प्राप्ति सुगम होगी।

दीपावली को किसी युवा सुहागन स्त्री को घर पर भोजन-मिष्ठान्न करवाकर लाल वस्त्रादि भेंट करें। 

भाग्योदय नहीं हो रहा हो तो लक्ष्मीजी को चने की दाल कच्ची चढ़ाकर बाद में पीपल वृक्ष में चढ़ा दें।

Sunday, 20 October 2019

अहोई अष्टमी की पूजनविधि, महत्व और कथा, पार्वती माता के इस स्वरूप की होती है पूजा

कार्तिक मास प्रारंभ होते ही त्योहारों का सिलसिला शुरू हो जाता है, इसी क्रम में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को अहोई अष्टमी का त्योहार मनाया जाता है। हिंदू धर्म में इस दिन माता पार्वती के अहोई स्वरूप की पूजा का विधान है, इसीलिए इस तिथि को अहोई अष्टमी का व्रत पूजन किया जाता है। इस साल 21 अक्टूबर सोमवार के दिन अहोई अष्टमी पड़ रही है। इस दिन देश के कई भागों में महिलाएं संतान प्राप्ति और संतान के खुशहाल जीवन के लिए विधि विधान से व्रत करती हैं। धार्मिक मान्यतानुसार इस दिन सही विधि से पूजा और व्रत करने से अहोई माता संतान प्राप्ति का आशीर्वाद देती हैं।

निर्जल रखते हैं व्रतपूजा

अहोई अष्टमी का उपवास करने के लिए माताएं सुबह उठकर, एक सादे करवे अर्थात मिट्टी के बर्तन में पानी भर कर रखती हैं। इसके बाद माता अहोई का ध्यान करते हुए अपनी संतान की सलामती के लिए विधिविधान से पूजा करती हैं। इस दिन माताएं पूरा दिन निर्जल उपवास भी करती हैं।

मुसीबतें होंगी दूर


अहोई माता की पूजा करने के लिए गाय के घी में हल्दी मिलाकर दीपक तैयार करें, चंदन की धूप करें, देवी पर रोली, हल्दी और केसर चढ़ाएं। चावल की खीर का भोग लगाएं। पूजन के बाद भोग किसी गरीब कन्या को दान देने से सुफल मिलता है। इसके अलावा संतान के जीवन में आने वाली मुसीबतों से बचने के लिए मां गौरी पर पीले कनेर के फूल अवश्य चढ़ाएं।

तारों को देते हैं अर्घ्य


यथाशक्तिनुसार, गरीबों को दान दें या भोजन कराएं। पुरानी मान्यताओं के अनुसार, अहोई पूजन के लिए शाम के समय घर की उत्तर दिशा की दीवार पर गेरू या पीली मिट्टी से आठ कोष्ठक की एक पुतली बनाई जाती है। उसी के निकट सेह तथा उसके बच्चों की आकृतियां बनाई जाती हैं और विधि पूर्वक स्नान, तिलक आदि के बाद खाने का भोग लगाया जाता है।

चांदी की अहोई में करते हैं विशेष पूजा


कुछ लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार, चांदी की अहोई में दो मोती डालकर विशेष पूजा करने का भी विधान है। महिलाएं तारों या फिर चंद्रमा के निकलने पर महादेवी का षोडशोपचार पूजन करें। फिर तारों को जल का अर्घ्य देकर व्रत पूर्ण किया जाता है। कुछ महिलाएं चंद्रमा को अर्घ्य देकर भी व्रत खोलती हैं और भोजन करके व्रत का समापन करते हैं।

यह भी है प्रथा

वहीं कुछ लोग एक धागे में अहोई व दोनों चांदी के कुछ दाने डालते हैं। फिर हर साल इसमें दाने जोड़े जाने की भी परंपरा है। इसके अलावा पूजन के लिए घर की उत्तर दिशा में जमीन पर गोबर और चिकनी मिट्टी से लीपकर कलश स्थापना करते हैं। तत्पश्चात प्रथम पूज्य भगवान गणेश जी की पूजा के बाद अहोई माता की पूजा और उन्हें दूध, शक्कर और चावल का भोग भी लगाते हैं। फिर एक लकड़ी के पाटे पर जल से भरा कलश स्थापित करके अहोई की कथा सुनी-सुनाई जाती है।

साहूकार की पुत्री से होती है यह गलती


प्राचीन काल में एक साहूकार के सात बेटे और सात बहुएं और एक बेटी थी। साहूकार की बेटी विवाहित थी। वह दीवाली पर मायके आती है, दीवाली की साफ-सफाई के दौरान घर लीपने के लिए अपनी सातों भाभियों के साथ जंगल से मिट्टी लाने जाती है। जंगल में मिट्टी खोदते हुए साहूकार की बेटी के हाथ से साही (मिट्टी में घर बनाकर रहनेवाला जीव) के बच्चे मर जाते हैं। जहां वह खुरपी से मिट्टी खोद रही थी, उस जगह पर साही का घर था, जिसमें उसके सात बच्चे थे। खुरपी लगने से उन बच्चों की मृत्यु हो जाती है।

साही ने दिया शाप


तभी साही वहां आती है और अपने बच्चों को मरा हुआ देखकर दुखी होती है क्रोध में साहूकार की बेटी को शाप देती है कि जैसे मेरे बच्चों की मृत्यु से मैं निसंतान हो गई हूं ऐसे ही तुम भी निसंतान रहोगी, मैं तुम्हारी कोख बांध दूंगी। साहूकार की बेटी के कोई संतान नहीं थी और उसकी सभी भाभियों के बच्चे थे। इस पर वह अपनी सातों भाभियों से विनती करती है कि मेरी जगह आप अपनी कोख बंधवा लीजिए लेकिन कोई भी भाभी इसके लिए तैयार नहीं होती। आखिर में सबसे छोटी भाभी से अपनी ननद का दुख नहीं देखा नहीं जाता और वह उसकी जगह अपनी कोख बंधवा लेती है।

सुरही गाय सेवा से होती है प्रसन्न


घर जाकर सभी को लगता है कि इस तरह साही का शाप भी हो गया और उनकी ननद की गृहस्थी भी बच गई लेकिन जिस भाभी ने अपनी कोख बंधवाई थी, कुछ ही दिन में उसके बच्चों की मृत्यु हो गई। वह एक ज्ञानी पंडित को बुलाकर इसका कारण पूछती है तो पंडित उसे सुरही गाय की सेवा करने के लिए कहते हैं। वह पूरे मन से सुरही गाय की सेवा में जुट जाती है। इससे प्रसन्न होकर सुरही गाय उसे साही के पास ले जाती है। सुरही गाय साही से विनती करती है कि वह छोटी बहू को अपने शाप से मुक्त कर दे।

शाप से मिली मुक्ति


साही को छोटी बहू के बच्चों की मृत्यु के बारे में सुनकर बहुत दुख होता है, साथ ही वह उसके द्वारा सुरही गाय की सेवा देखकर भी खुश होती है। इसके बाद साही छोटी बहू को अपने शाप से मुक्त कर देती है। फिर सुरही गाय और साही दोनों उसे सौभाग्यवती रहने और संतान प्राप्ति का आशीर्वाद देती हैं। इनके आशीर्वाद से छोटी बहू की सारी समस्याएं दूर हो जाती हैं और उसे संतान सुख की प्राप्ति होती है।

पूरी होती है ये मनोकामना


मुख्य रूप से अहोई अष्टमी का व्रत संतान सुख व संतान की समृद्धि के लिए करते हैं।इस दिन निःसंतान दंपत्ति भी संतान प्राप्ति की कामना के साथ इस व्रत का पालन करते हैं। दरअसल, इस दिन लोग देवी पार्वती के अहोई स्वरूप से अपनी संतान की सुरक्षा, लंबी आयु, उसके अच्छे स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। निसंतान लोग संतान प्राप्ति की कामना के लिए पूरी निष्ठा और श्रद्धा से पूजा-पाठ करते हैं। इस दिन अधिकतर घरों में महिलाएं कच्चा खाना (उड़द-चावल, कढ़ी-चावल इत्यादि) बनाती हैं।

Thursday, 17 October 2019

धनतेरस के दिन खरीदें धनिया:माता लक्ष्मी देंगीं धन का संकेत


धनतेरस के दिन साबुत धनिया खरीदें, दीपावली की रात लक्ष्मी जी के सामने साबुत धनिया रखे रहने दें। अगले दिन प्रातः साबुत धनिए को गमले में बो दें। ऐसी मान्यता है कि अगर साबुत धनिए से हरा-भरा स्वस्थ पौधा निकले तो आर्थिक स्थिति सुदृढ़ रहती है। अगर धनिए का पौधा पतला है तो सामान्य आय होती है। पीला व बीमार पौधा निकले या पौधा नहीं निकले तो आर्थिक परेशानियां आती हैं।
Acharya Mukesh
Astro Nakshatra 27

Sunday, 6 October 2019

महाअष्टमी नारियल बलि 06 October 2019 : चमकेगा भाग्य, माता करेंगी सभी मनोरथ पूर्ण



हिन्दू धर्म में नारियल को मंगल-सूचक माना गया है। पूजा-पाठ अथवा मांगलिक कामों में शुभता के प्रतीक रूप में नारियल को रखा जाता है। इसे नकारात्मक शक्तियों को दूर करने और भाग्य सूचक माना जाता है। 

नारियल का प्रयोग हिंदू धर्म में प्रत्येक शुभ काम के लिए किया जाता है इसलिए इसे श्रीफल भी कहा जाता है। भगवान को श्रीफल अर्पित करने का तात्पर्य है की हम भगवान को अपना सिर भेंट कर रहे हैं। नारियल में दो आंखे और एक मुंह होता है।नारियल को तोड़ने का कारण है अनिष्ट शक्तियों के संचार पर अंकुश लगाना। तभी तो नारियल फोडकर स्थान देवता का आवाहन कर वहां की स्थानीय अनिष्ट शक्तियों को नियंत्रित करने की उनसे प्रार्थना की जाती है। 



महिलाएं नहीं फोड़ती हैं नारियल

अब आपको बता दें कि आखिर क्या वजह है कि महिलाएं नारियल क्यों नहीं फोड़ती हैं:-

नारियल बीज रूप है, इसलिए इसे प्रजनन क्षमता से जोड़ा गया है। स्त्रियां प्रजनन की कारक हैं और इसी वजह से स्त्रियों के लिए बीज रूप नारियल को फोडऩा वर्जित किया गया है। इसके साथ ही नारियल बलि का प्रतीक है और बलि पुरुषों द्वारा ही दी जाती है। इस कारण से भी महिलाओ द्वारा नारियल नहीं फोड़ा जाता है

आपको बता दें कि नारियल ऊपर से जितना कठोर होता है अंदर से उतना मुलायम। नारियल को श्रीफल भी कहा जाता है। पूजा में हम भगवान को श्रीफल अर्पित करते हैं। नारियल का एक उपयोग देवी या देवता के स्थान पर फोड़ने में होता है, फोड़ने में ऎसी कुशलता होनी चाहिए चाहिए कि रस छलककर पूरा का पूरा देवता के चरणों पर पड़े, कहीं अन्यत्र नहीं।

कैसे अर्पित करें माता को बलि ?  

ASTRO NAKSHATRA २७ से आचार्य मुकेश बताते हैं की महाअष्टमी  को  नारियल बलि का बहुत ही ख़ास  महत्व है ! पुराने ज़माने में लोग जानवरों की बलि देते थे जो पूजा पाठ  के सन्दर्भ में मार्कण्डेय  पुराण के दुर्गा सप्तशती में भी वर्जित कहा गया है !

                                 बलि से माता प्रसन्न  हो भक्तों के सभी मनोरथ पूर्ण करती हैं !

आज रात संधि-पूजा काल में ( 06`/10/2019 समय : 10:30 से 11:18 ) के बीच  एक पानीवाला नारियल लें ! उसे गंगा जल से पवित्र कर रोली से ५ टीके लगायें,मिश्री, अक्षत और फूल  चढाने के बाद उसे दाहिने हाथ में लेकर घुटने पर बैठ जाएँ और नारियल को मस्तक से लगा के जोर से जय  माँ अंबे का उच्चारण करते हुए जमीन पर फोड़ दें, याद रहे नारियल पर पकड़ मजबूत बानी रहे ताकि एक बार में ही ओ टूट जाये ! टूटते ही उसके पानी को माता के ऊपर और कलश के ऊपर छिड़क कर नारियल माता की गोद में ही रख दें ! 

फिर वहीँ  बैठकर थोड़ी देर माता में ही मन लगा कर अपनी मनोकामना बोले तथा ऐसे आवाज लगाएं जैसे आप अपनी माता को पुकारते हो ! माँ , माँ , माँ और आवाज में इतनी करुणा हो की माँ का दिल पिघल जाये और बोले "तथास्तु " !  


                                                                        आचार्य मुकेश

Thursday, 3 October 2019

धनतेरस 2019 पूजा विधि | जानें पूजा का शुभ मुहूर्त |


हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष 
की त्रयोदशी तिथि को मनाए जाने वाले इस महापर्व के बारे में स्कन्द पुराण में लिखा है कि इसी दिन देवताओं के वैद्य धन्वंतरि अमृत कलश सहित सागर मंथन से प्रकट हुए थे, जिस कारण इस दिन धनतेरस के साथ-साथ धन्वंतरि जयंती भी मनाई जाती है। 

धनतेरस को धन त्रयोदशी व धन्वन्तरी त्रयोदशी के नाम से भी जाना जाता है। 


धनतेरस पर पांच देवताओं, गणेश जी, मां लक्ष्मी, ब्रह्मा,विष्णु और महेश की पूजा होती है। यह नई चीजों के शुभ आगमन का दिन है, इस दिन मुख्य रूप से नए बर्तन या सोना-चांदी खरीदने की परंपरा है। चूंकि जन्म के समय धन्वंतरि जी के हाथों में अमृत का कलश था, इसलिए इस दिन बर्तन खरीदना अति शुभ माना जाता है। विशेषकर पीतल के बर्तन खरीदना बेहद शुभ माना जाता है। धन तेरस के दिन धन के देवता कुबेर और मृत्यदेव यमराज की पूजा-अर्चना को विशेष महत्त्व दिया जाता है।धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी इस दिन का विशेष महत्व है। शास्त्रों में इस बारे में कहा गया है कि जिन परिवारों में धनतेरस के दिन यमराज के निमित्त दीपदान किया जाता है, वहां अकाल मृत्यु नहीं होती।

घरों में दीपावली की सजावट भी इसी दिन से प्रारंभ हो जाती है। इस दिन घरों को स्वच्छ कर, रंगोली बनाकर सांझ के समय दीपक जलाकर लक्ष्मी जी का आवाहन किया जाता है। इस दिन पुराने बर्तनों को बदलना व नए बर्तन खरीदना शुभ माना गया है।

धनतेरस को चांदी के बर्तन खरीदने से तो अत्यधिक पुण्य लाभ होता है। इस दिन कार्तिक स्नान करके प्रदोष काल में घाट, गौशालाएं, कुआं, बावली, मंदिर आदि स्थानों पर तीन दिन तक दीपक जलाना चाहिए।
                                    
धनतेरस पूजा शुक्रवार, अक्टूबर 25, 2019 पर
धनतेरस पूजा मुहूर्त - 07:08 PM से 08:15 PM
अवधि - 01 घण्टा 07 मिनट्स
यम दीपम शनिवार, अक्टूबर 26, 2019 को

प्रदोष काल - 05:42 PM से 08:15 PM
वृषभ काल - 06:50 PM से 08:45 PM
त्रयोदशी तिथि प्रारम्भ - अक्टूबर 25, 2019 को 07:08 PM बजे
त्रयोदशी तिथि समाप्त - अक्टूबर 26, 2019 को 03:46 PM बजे


                                                धनतेरस की पौराणिक कथा

यह तिथि विशेष रूप से व्यापारियों के लिए अति शुभ माना जाता है। महर्षि धन्वंतरि को स्वास्थ्य के देवता के रूप में पूजा जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार सागर मंथन के समय महर्षि धन्वंतरि अमृत कलश लेकर अवतरित हुए थे। इसीलिए इस दिन बर्तन खरीदने की प्रथा प्रचलित हुई। यह भी माना जाता है कि धनतेरस के शुभावसर पर चल या अचल संपत्ति खरीदने से धन में तेरह गुणा वृद्धि होती है।

एक और कथा के अनुसार एक समय भगवान विष्णु द्वारा श्राप दिए जाने के कारण देवी लक्ष्मी को तेरह वर्षों तक एक किसान के घर पर रहना था। माँ लक्ष्मी के उस किसान के रहने से उसका घर धन-संपत्ति से भरपूर हो गया। तेरह वर्षों उपरान्त जब भगवान विष्णु माँ लक्ष्मी को लेने आए तो किसान ने माँ लक्ष्मी से वहीँ रुक जाने का आग्रह किया। इस पर देवी लक्ष्मी ने किसान से कहा कि कल त्रयोदशी है और अगर वह साफ़-सफाई कर, दीप प्रज्वलित करके उनका आह्वान करेगा तो किसान को धन-वैभव की प्राप्ति होगी। जैसा माँ लक्ष्मी ने कहा, वैसा किसान ने किया और उसे धन-वैभव की प्राप्ति हुई। तब से ही धनतेरस के दिन लक्ष्मी पूजन की प्रथा प्रचलित हुई।

कैसे करें धनतेरस की पूजा

धनतेरस की संध्या में यमदेव निमित्त दीपदान किया जाता है। फलस्वरूप उपासक और उसके परिवार को मृत्युदेव यमराज के कोप से सुरक्षा मिलती है। विशेषरूप से यदि गृहलक्ष्मी इस दिन दीपदान करें तो पूरा परिवार स्वस्थ रहता है।

बर्तन खरीदने की परंपरा को पूर्ण अवश्य किया जाना चाहिए। विशेषकर पीतल और चाँदी के बर्तन खरीदे क्योंकि पीतल महर्षि धन्वंतरी का अहम धातु है। इससे घर में आरोग्य, सौभाग्य और स्वास्थ्य लाभ की प्राप्ति होती है। व्यापारी इस विशेष दिन में नए बही-खाते खरीदते हैं जिनका पूजन वे दीवाली पर करते हैं।

धनतेरस के दिन चाँदी खरीदने की भी विशेष परंपरा है। चन्द्रमा का प्रतीक चाँदी मनुष्य को जीवन में शीतलता प्रदान करता है। चूंकि चाँदी कुबेर की धातु है, धनतेरस पर चाँदी खरीदने से घर में यश, कीर्ति, ऐश्वर्य और संपदा की वृद्धि होती है।

संध्या में घर मुख्य द्वार पर और आँगन में दीप प्रज्वलित किए जाते हैं और दीवाली का शुभारंभ होता है।


सामग्री:-

• एक गेहूँ के आटे से बना हुआ दीपक ,तीन मिट्टी के दीपक(धन्वन्तरि,गणेश जी और लक्ष्मी जी के लिये) 
• बत्ती रूई की
• सरसों का तेल/घी
• माचिस
• एक छेद वाली कौड़ी
• फूल, चावल, रोली
• गंगाजल
• चम्मच
• चीनी/शक्कर
• आसन
• मिठाई/नैवैद्य
• धूप और धूपदान
• एक चौकी
धनतेरस पूजा की विधि

धनतेरस पूजा में सबसे पहले संध्या को यम दीप की पूजा की जाती है उसके बाद भगवान धन्वन्तरि की पूजा होती है और फिर गणेश लक्ष्मी की पूजा की जाती है
यम दीप पूजन विधि:-

चौकी को धो कर सुखा लें। उस चौकी के बीचोंबीच रोली घोल कर 卐(स्वास्तिक या सतिया) बनायें ।अब इस 卐(स्वास्तिक या सतिया) पर सरसों तेल का दीपक (गेहूँ के आटे से बना हुआ )जलायें । उस दीपक में छेद वाली कौड़ी को डाल दें। अब दीपक के चारों ओर गंगा जल से तीन बार छींटा दें।अब हाथ में रोली लें और रोली से दीपक पर तिलक लगायें । अब रोली पर चावल लगायें। अब दीपक के अंदर थोड़ी चीनी/शक्कर डाल दें।अब एक रुपए का सिक्का दीपक के अंदर डाल दें।दीपक पर फूल समर्पित करें । सभी अपस्थित जन दीपक को हाथ जोड़कर प्रणाम करें हे यमदेव हमारे घर पे अपनी दयादृष्टि बनाये रखना और परिवार के सभी सदस्यों की रक्षा करना । फिर सभी सदस्यों को तिलक लगाए ।अब दीपक को उठा कर घर के मुख्य दरवाजे के बाहर दाहिनी ओर रख दे (दीपक का लौ दक्षिण दिशा की ओर होनी चाहिए)।

धन्वन्तरि पूजन विधि:-

यम दीप की पूजा के बाद धन्वन्तरि पूजा की जाती है ।
अब पूजा घर मे बैठ कर धूप,दीप(घी का दिया मिट्टी की दिये में),अक्षत,चंदन और नैवेद्य के द्वारा भगवान धन्वन्तरि का पूजन करें । पूजन के बाद धन्वन्तरि के मंत्र का 108 बार जप करें:- 

“ॐ धं धन्वन्तरये नमः”

जाप के पूर्ण करने के बाद दोनों हाथों को जोड़कर प्रार्थना करें कि “ हे भगवान धन्वन्तरि ये जाप मैं आपके चरणों में समर्पित करता हूँ। कृप्या हमें उत्तम स्वास्थ प्रदान करे ।“


विलक्षण कुबेर मंत्र इस प्रकार है- 
मंत्र- ॐ श्रीं, ॐ ह्रीं श्रीं, ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय: नम:। 

कुबेर का विलक्षण सिद्ध मंत्र-

* मनुजवाह्य विमानवरस्थितं गुरुडरत्नानिभं निधिनाकम।
शिव संख युक्तादिवि भूषित वरगदे दध गतं भजतांदलम।।

* कुबेर का अष्टाक्षर मंत्र-

 ॐ वैश्रवणाय स्वाहा:

* कुबेर का षोडशाक्षर मंत्र-

 ॐ श्री ॐ ह्रीं श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय नम:।

* कुबेर का प्राचीन दिव्य मंत्र- 

ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन धान्याधिपतये धनधान्या समृद्धिम् देहि दापय दापय स्वाहा।




धन-कामना करते हुए कुबेर -यन्त्र की पूजा अवश्य करें. कुबेर की फोटो उत्तर दिशा में रखें तथा उनके सामने यन्त्र स्थापित कर गंगाजल , रोली, अक्षत , फूल एवं नवैद्य इत्यादि से पूजन करें अतः धूप-दीप दिखाएँ !

धन्वन्तरि की पूजा हो जाने पर अंत में गणेश लक्ष्मी की पूजा करे

गणेश लक्ष्मी पूजन विधि:-

धन्वन्तरि पूजन के बाद गंणेश लक्ष्मी जी की पूजा धूप,दीप(घी का दिया मिट्टी की दिये में),अक्षत,चंदन और नैवेद्य के द्वारा पंचोपचार विधि से करें :- 

सर्वप्रथम गणेश जी की पूजा की जाती है।पहले गणेश जी के आगे दीप प्रज्वल्लित करें।अब धूप दिखायें, उसके बाद इत्र समर्पित करें।भगवान को फूल समर्पित करें।अब गणेश जी को भोग लगायें। अंत में जल समर्पित करें।
इसी प्रकार से माँ लक्ष्मी की भी पंचोपचार विधि से पूजा करें ।

॥ इति धनतेरस पूजन ॥

समुद्र मंथन से उत्पन्न लक्ष्मी को धन-धान्य की अधिष्ठात्री कहा गया है। धन न केवल जीने के लिए आवश्यक है, बल्कि मात्र दुनिया में यही ऐसा है, जो करोड़ों दोषों को दूर करता है और समाज में प्रसिद्धि व यश भी दिलाता है। धनतेरस के दिन श्री की साधना के लिए किए जाने वाले कुछ अनुभूत प्रयोग जो आपके लिए निश्चय ही आपके लिए परम लाभदायी सिद्ध होंगे —  


ऐसे करें श्री की साधना


धनतेरस के दिन किसी भी स्थिर लग्न में पूजा घर को साफ-सुथरा कर, भक्ति व श्रद्धापूर्वक महालक्ष्मी से यह प्रार्थना करें कि हे जगत जननी! आप मुझ पर प्रसन्न होवे। मैं किसी विधि-विधान से परिचित नहीं हूं। अतः यदि मुझसे कोई त्रुटि हो तो क्षमा करिएगा। यह मन में संकल्प लेकर निश्चित कर लें कि दीपावली के महानिशीथ काल तक मैं ‘श्री सूक्तम् ’ का 108 बार जाप करूंगा।


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Acharya Mukesh
Astro Nakshatra 27
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Monday, 16 September 2019

विश्वकर्मा पूजा 17 सितंबर 2019


अश्विन माह की कन्या संक्रांति के दिन विश्वकर्मा पूजा की जाती है। इसी दिन भगवान विश्वकर्मा का जन्म हुआ था। शास्त्रों में ऐसी मान्यता है कि विश्वकर्मा जयंती पर भगवान विश्वकर्मा की पूजा करने से कारोबार में वृद्धि होती है। धन-धान्य और सुख-समृद्धि के लिए भगवान विश्वकर्मा की पूजा करना आवश्यक और मंगलदायी है। इस दिन उद्योगों, फैक्ट्रियों और मशीनों की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस दिन विश्वकर्मा पूजा करने से खूब तरक्की होती है और कारोबार में मुनाफा होता है। यह पूजा विशेष तौर पर सभी कलाकारों, बुनकर, शिल्पकारों और औद्योगिक क्षेत्रों से जुड़े लोगों द्वारा की जाती है।

पूजन हेतु आपके वाहन या मशीन या आज के परिवेश में कहें तो लैपटॉप , मोबाइल , फ्रीज़ की सफाई इत्यादि कर गंगा जल से पवित्र कर के पंचोपचार पूजन करें और भक्ति भाव से अपने तथा परिवारजनों के प्रगति एवं सुविधाओं हेतु उनका सम्मान हृदयपूर्वक करें। 17 सितंबर 2019 का पूरा ही दिन राहु काल को छोड़ पूजा के लिए उपयुक्त है।

आचार्य मुकेश
Astro Nakshatra 27


शारदीय नवरात्र 2019/ इस बार हाथी पर हो रहा है माता का आगमन, 2019 नवरात्र हर तरह से शुभ कल्याणकारी


अश्विन शुक्ल पक्ष प्रतिपदा 29 सितंबर से शारदीय नवरात्र शुरू हो रहा है। इस बार किसी तिथि का क्षय नहीं है, इसलिए पहली बार कलश स्थापित कर माता की आराधना करने वाले भक्तों के लिए इस बार का नवरात्र हर तरह से शुभ कल्याणकारी रहेगा। 29 सितंबर को विधि विधान से कलश स्थापना के साथ मां दुर्गा का आवाह्न होगा।

ज्योतिषाचार्य मुकेश  के अनुसार इस बार शारदीय नवरात्र पर मां दुर्गा का आगमन हर तरह से शुभ है। क्योंकि माता दुर्गा का आगमन हाथी पर हाे रहा है।

मां दुर्गा के  हाथी पर आने से अच्छी वर्षा होती है, घोड़े पर आने से राजाओं में युद्ध होता है। नाव पर आने से सब कार्यों में सिद्ध मिलती है और यदि डोले पर आती है तो उस वर्ष में अनेक कारणों से बहुत लोगों की मृत्यु होती है।



यूं तो मां दुर्गा का वाहन सिंह को माना जाता है। लेकिन हर साल नवरात्रि के समय तिथि के अनुसार माता अलग-अलग वाहनों पर सवार होकर धरती पर आती हैं। यानी माता सिंह की बजाय दूसरी सवारी पर सवार होकर भी पृथ्वी पर आती हैं।

इस संदर्भ में शास्त्रों में कहा गया है कि 'शशिसूर्ये गजारूढ़ा शनिभौमे तुरंगमे। गुरौ शुक्रे च दोलायां बुधे नौका प्रकी‌र्त्तिता' इसका अर्थ है सोमवार व रविवार को प्रथम पूजा यानी कलश स्थापना होने पर मां दुर्गा हाथी पर आती हैं।

मां की सवारी दिन के हिसाब से तय होती है– 
सोमवार को मां की सवारी : हाथी। 
मंगलवार को मां की सवारी : अश्व यानी घोड़ा।
बुधवार को मां की सवारी : नाव। 
गुरूवार को मां की सवारी : डोली।
शुक्रवार को मां की सवारी : डोली।
शनिवार को मां की सवारी : अश्व यानी घोड़ा।
रविवार को मां की सवारी : हाथी।


Sunday, 15 September 2019

पितृपक्ष / किस दिन किसका श्राद्ध/ / पूर्वजों के प्रति श्रद्धा से पितृ होते हैं तृप्त/ पितृ-पक्ष - श्राद्ध पर्व तिथि व मुहूर्त 2019

                             
श्रद्धया इदं श्राद्धम्‌
पित्त्तर के निमित्त, उनकी आत्मा की तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक जो अर्पित किया जाए वह श्राद्ध है।

जिस किसी के परिजन चाहे वह विवाहित हों या अविवाहित, बच्चा हो या बुजुर्ग, स्त्री हो या पुरुष उनकी मृत्यु हो चुकी है उन्हें पितर कहा जाता है। पितृपक्ष में मृत्युलोक से पितर पृथ्वी पर आते हैं और आशीर्वाद देते हैं। पितृपक्ष में पितरों की आत्मा की शांति के लिए उनको तर्पण किया जाता है। पितरों के प्रसन्न होने पर घर पर सुख शांति आती है।

पितृ पक्ष को मनाने का ज्योतिषीय कारण भी है। ज्योतिषशास्त्र में पितृ दोष काफी अहम माना जाता है। जब जातक सफलता के बिल्कुल नज़दीक पंहुचकर भी सफलता से वंचित होता हो, संतान उत्पत्ति में परेशानियां आ रही हों, धन हानि हो रही हों तो ज्योतिषाचार्य पितृदोष से पीड़ित होने की प्रबल संभावनाएं बताते हैं। इसलिये पितृदोष से मुक्ति के लिये भी पितरों की शांति आवश्यक मानी जाती है।

किस दिन किसका श्राद्ध

1. पंचमी श्राद्ध -
जिनकी मृत्यु पंचमी तिथि को हुई हो या जिनकी मृत्यु अविवाहित स्थिति में हुई है उनके लिए पंचमी तिथि का श्राद्ध किया जाता है।

2. नवमी श्राद्ध - इसे मातृनवमी के नाम से भी जाना जाता है। इस तिथि पर श्राद्ध करने से कुल की सभी दिवंगत महिलाओं का श्राद्ध हो जाता है।

3. चतुर्दशी श्राद्ध -
इस तिथि उन परिजनों का श्राद्ध किया जाता है जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो जैसे कि दुर्घटना से, हत्या, आत्महत्या, शस्त्र के द्वारा आदि।

4. सर्वपितृ अमावस्या - जिन लोगों के मृत्यु के दिन की सही-सही जानकारी न हो, उनका श्राद्ध आमावस्या को किया जाता है।

हिन्‍दू पंचांग के मुताबिक पितृ पक्ष अश्विन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ते हैं. इसकी शुरुआत पूर्णिमा तिथि से होती है, जबकि समाप्ति अमावस्या पर होती है. अंग्रेजी कैलेंडर के मुताबिक हर साल सितंबर महीने में पितृ पक्ष की शुरुआत होती है. आमतौर पर पितृ पक्ष 16 दिनों का होता है.


एकैकस्य तिलैर्मिश्रांस्त्रींस्त्रीन् दद्याज्जलाज्जलीन्। यावज्जीवकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति। 
अर्थात् जो अपने पितरों को तिल-मिश्रित जल की तीन-तीन अंजलियाँ प्रदान करते हैं, उनके जन्म से तर्पण के दिन तक के पापों का नाश हो जाता है। हमारे हिंदू धर्म-दर्शन के अनुसार जिस प्रकार जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है; उसी प्रकार जिसकी मृत्यु हुई है, उसका जन्म भी निश्चित है.

हिन्दू धर्म में माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ी पूजा माना गया है। इसलिए हिंदू धर्म शास्त्रों में पितरों का उद्धार करने के लिए पुत्र की अनिवार्यता मानी गई हैं। जन्मदाता माता-पिता को मृत्यु-उपरांत लोग विस्मृत न कर दें, इसलिए उनका श्राद्ध करने का विशेष विधान बताया गया है। भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के सोलह दिनों को पितृपक्ष कहते हैं जिसमे हम अपने पूर्वजों की सेवा करते हैं।

आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक ब्रह्माण्ड की ऊर्जा तथा उस उर्जा के साथ पितृप्राण पृथ्वी पर व्याप्त रहता है। धार्मिक ग्रंथों में मृत्यु के बाद आत्मा की स्थिति का बड़ा सुन्दर और वैज्ञानिक विवेचन भी मिलता है। मृत्यु के बाद दशगात्र और षोडशी-सपिण्डन तक मृत व्यक्ति की प्रेत संज्ञा रहती है। पुराणों के अनुसार वह सूक्ष्म शरीर जो आत्मा भौतिक शरीर छोड़ने पर धारण करती है प्रेत होती है। प्रिय के अतिरेक की अवस्था "प्रेत" है क्यों की आत्मा जो सूक्ष्म शरीर धारण करती है तब भी उसके अन्दर मोह, माया भूख और प्यास का अतिरेक होता है। सपिण्डन के बाद वह प्रेत, पित्तरों में सम्मिलित हो जाता है।

पितृपक्ष भर में जो तर्पण किया जाता है उससे वह पितृप्राण स्वयं आप्यापित होता है। पुत्र या उसके नाम से उसका परिवार जो यव (जौ) तथा चावल का पिण्ड देता है, उसमें से अंश लेकर वह अम्भप्राण का ऋण चुका देता है। ठीक आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से वह चक्र उर्ध्वमुख होने लगता है। 15 दिन अपना-अपना भाग लेकर शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से पितर उसी ब्रह्मांडीय उर्जा के साथ वापस चले जाते हैं। इसलिए इसको पितृपक्ष कहते हैं और इसी पक्ष में श्राद्ध करने से पित्तरों को प्राप्त होता है।

पुराणों में कई कथाएँ इस उपलक्ष्य को लेकर हैं जिसमें कर्ण के पुनर्जन्म की कथा काफी प्रचलित है। एवं हिन्दू धर्म में सर्वमान्य श्री रामचरित में भी श्री राम के द्वारा श्री दशरथ और जटायु को गोदावरी नदी पर जलांजलि देने का उल्लेख है एवं भरत जी के द्वारा दशरथ हेतु दशगात्र विधान का उल्लेख भरत कीन्हि दशगात्र विधाना तुलसी रामायण में हुआ है।

पितृ-पक्ष - श्राद्ध पर्व तिथि व मुहूर्त 2019

Sunday, 8 September 2019

भगवान विष्णु लेंगे करवट--पार्श्व एकादशी/ परिवर्तिनी एकादशी व्रत 9 सितम्बर 2019 जानिए शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, कथा और महत्‍व

भाद्रपद के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी को पद्मा एकादशी और परिवर्तिनी एकादशी कहते हैं। इस बार यह एकादशी 9 सितंबर दिनसोमवार को है। पद्म पुराण के अनुसार चतुर्मास के दौरान आनेवाली एकादशी का महत्व देवशयनी और देवप्रबोधिनी एकादशी के समान है। इस दिन भगवान विष्णु चतुर्मास के शयन के दौरान करवट लेते हैं इसलिए देवी-देवता भी इनकी पूजा करते हैं।

 एकादशी व्रत व पूजा विधि

नारदपुराण  के अनुसार, जातक ब्रह्म मुहूर्त में स्नान आदि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लें। इसके बाद घट स्थापना करें और उसके ऊपर भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर रखें और गंगाजल के छींटे दें। भगवान की तस्वीर या मूर्ति पर रोली और अक्षत से तिलक करें और सफेद फूल चढ़ाएं। इसके बाद घी का एक दीपक जलाएं और उनकी आरती उतारें। इसके बाद उनका भोग लगाएं। फिर ब्राह्मण को भोजन कराकर दान व दक्षिणा देते हैं। इस दिन किसी भी एक समय फलाहार किया जाता है।

पार्श्व एकादशी (परिवर्तिनी एकादशी) सोमवार, सितम्बर 9, 2019 को

10 सितम्बर को, पारण (व्रत तोड़ने का) समय - 07:04 से 08:33 AM

पारण तिथि के दिन हरि वासर समाप्त होने का समय - 07:04 AM

एकादशी तिथि प्रारम्भ - सितम्बर 08, 2019 को 10:41 PM बजे
एकादशी तिथि समाप्त - सितम्बर 10, 2019 को 12:31 PM बजे


आचार्य मुकेश के अनुभवों के आधार पर कुछ सुझाव:


एकादशी के व्रत की तैयारी दशमी तिथि को ही आरंभ हो जाती है। उपवास का आरंभ दशमी की रात्रि से ही आरंभ हो जाता है। इसमें दशमी तिथि को सायंकाल भोजन करने के पश्चात अच्छे से दातुन कुल्ला करना चाहिये ताकि अन्न का अंश मुंह में शेष न रहे। इसके बाद रात्रि को बिल्कुल भी भोजन न करें। अधिक बोलकर अपनी ऊर्जा को भी व्यर्थ न करें। रात्रि में ब्रह्मचर्य का पालन करें। एकादशी के दिन प्रात:काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सबसे पहले व्रत का संकल्प करें। नित्य क्रियाओं से निपटने के बाद स्नानादि कर स्वच्छ हो लें। भगवान का पूजन करें, व्रत कथा सुनें। दिन भर व्रती को बुरे कर्म करने वाले पापी, दुष्ट व्यक्तियों की संगत से बचना चाहिये। रात्रि में भजन-कीर्तन करें। जाने-अंजाने हुई गलतियों के लिये भगवान श्री हरि से क्षमा मांगे। द्वादशी के दिन प्रात:काल ब्राह्मण या किसी गरीब को भोजन करवाकर उचित दान दक्षिणा देकर फिर अपने व्रत का पारण करना चाहिये। इस विधि से किया गया उपवास बहुत ही पुण्य फलदायी होता है।


एकादशी करते हों तो ध्यान रखें कुछ बातों का :


🚫1. एकादशी के दिन सुबह दातुन या ब्रश न करें!नींबू, जामुन या आम के पत्ते लेकर चबा लें और अंगुली से कंठ साफ कर लें, वृक्ष से पत्ता तोड़ना भी ‍वर्जित है। अत: स्वयं गिरा हुआ पत्ता लेकर सेवन करें। * यदि यह संभव न हो तो पानी से बारह बार कुल्ले कर लें।

🚫2. एकादशी के दिन झाड़ू पोछा इत्यादि बिलकुल न करें! क्योंकि चींटी आदि सूक्ष्म जीवों की मृत्यु का भय रहता है।

🚫3. एकादशी के दिन तुलसीदल न तोड़ें, भगवन को भोग लगाने हेतु एक दिन पहले ही तोड़ कर रख लें।

🚫4. अगर घर में दक्षिणावर्ती शंख हो तो उसमे जल लेकर भगवान शालिग्राम को स्नान करवाएं, या पंचामृत से स्नान करवाएं!इस से सारे पाप उसी समय नष्ट हो जाते हैं तथा माता लक्ष्मी के साथ भगवान् हरि भी अति प्रशन्न होते हैं।

🚫5.एकादशी के दिन भगवान् श्री हरि को पीली जनेऊ अर्पित करें। पान के पत्ते पर एक सुपारी, लौंग, इलायची, द्रव्य, कपूर, किसमिस तुलसीदल के साथ इत्यादि अर्पित करें, साथ ही ऋतुफल भी अर्पित करें! एक तुलसीदल भगवान् पर भी चढ़ाएं पर रात्रि में उसे हटाना न भूले।

🚫6.एकादशी के दिन सुबह संकल्प लें, मन में मनोकामना करते हुए श्री हरि से व्रत में रहने का संकल्प करें!

🚫7. एकादशी के दिन रात्रि जागरण का विशेष महत्व है, कोशिश करें की इस एकादशी जरूर जागरण करें, इस से व्रत फल 100 गुणा बढ़ जाता है!

🚫8. एकादशी के दिन चावल भूल से भी न छुएं, न ही घर में चावल बनें, इस दिन चावल खाने से बेहद नकरात्मक फल प्राप्त होते हैं, भाग्य खंडित होता है! एकादशी (ग्यारस) के दिन व्रतधारी व्यक्ति को गाजर, शलजम, गोभी, पालक, इत्यादि का सेवन नहीं करना चाहिए। * केला, आम, अंगूर, बादाम, पिस्ता इत्यादि अमृत फलों का सेवन करें। * प्रत्येक वस्तु प्रभु को भोग लगाकर तथा तुलसीदल छोड़कर ग्रहण करना चाहिए।

🚫9. एकादशी के दिन कम से कम बोलें, पापी लोगों से बात न करें, जिनके मन में लालच, पाप या कोई भी अनैतिक तत्व दिखे कम से कम इस दिन उन सभी से दूर रहने का प्रयत्न करें! परनिंदा से बचें!

🚫10.श्री हरि की विशेष कृपा हेतु ॐ नमो भगवते वासुदेवाय की 11 माला सुबह और 11 माला शाम में करें, साथ ही विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ जरूर करें! एकादशी व्रत कथा कहे या सुनें।

🚫11. शाम में केले के पेड़ के नीचे एवं तुलसी में दीपक जलाना न भूले, इसे दीप-दान कहते हैं!

🚫12. माता लक्षमी के बिना विष्णु अधूरे हैं इसलिए माता की भी आरती अवश्य करें, सुबह और शाम शंखनाद एवं घंटियों की ध्वनि में ॐ जय जगदीश हरे की आरती करना न भूले!

🚫13. एकादशी के दिन केले के पेड़ की 7 परिक्रमा करने से धन में बढ़ोतरी होती है!

🚫14. व्रत पंचांग के समयानुसार ही खोलें अन्यथा लाभ की जगह नुक्सान भी हो सकता है, व्रत एवं पूजा के नियमों में करने से ज्यादा कुछ बातें जो हमे नहीं करनी चाहिए वो ही ज्यादा महत्व रखती है. अतः सावधानी से की गई पूजा सर्वश्रेष्ठ फल प्रदान करती है.

🚫15 .आज के दिन किसका त्याग करें- 

🍁मधुर स्वर के लिए गुड़ का। 
🍁दीर्घायु अथवा पुत्र-पौत्रादि की प्राप्ति के लिए तेल का। 🍁शत्रुनाशादि के लिए कड़वे तेल का। 
🍁सौभाग्य के लिए मीठे तेल का। 
🍁स्वर्ग प्राप्ति के लिए पुष्पादि भोगों का। 

प्रभु शयन के दिनों में सभी प्रकार के मांगलिक कार्य जहाँ तक हो सके न करें। पलंग पर सोना, भार्या का संग करना, झूठ बोलना, मांस, शहद और दूसरे का दिया दही-भात आदि का भोजन करना, मूली, पटोल एवं बैंगन आदि का भी त्याग कर देना चाहिए।


🚫16. दोनों ही दिन शाम में संध्या आरती कर दीपदान करें। अखंड लक्षमी प्राप्त होगी। पैसा घर में रुकेगा।

🚫17. शंख ध्वनि से भी माता लक्ष्मी के साथ भगवान् हरि भी अति प्रसन्न होते हैं। अतः पूजा के समय जरूर शंख का उपयोग करें । पूजा के पहले शुद्धिकरण मंत्र तथा आचमन करना न भूलें क्योंकि इसके बिना पूजा का फल प्राप्त नहीं हो पाता।

🚫18. तुलसी की विधिवत पूजा करके उसकी 7 
परिक्रमा करें। श्री हरि की तुलसी की मंजरी से पूजा करें |



एकादशी - आरती 

ॐ जय एकादशी, जय एकादशी, जय एकादशी माता।
विष्णु पूजा व्रत को धारण कर, शक्ति मुक्ति पाता॥
ॐ जय एकादशी...॥

तेरे नाम गिनाऊं देवी, भक्ति प्रदान करनी।
गण गौरव की देनी माता, शास्त्रों में वरनी॥
ॐ जय एकादशी...॥

मार्गशीर्ष के कृष्णपक्ष की उत्पन्ना, विश्वतारनी जन्मी।
शुक्ल पक्ष में हुई मोक्षदा, मुक्तिदाता बन आई॥
ॐ जय एकादशी...॥

पौष के कृष्णपक्ष की, सफला नामक है।
शुक्लपक्ष में होय पुत्रदा, आनन्द अधिक रहै॥
ॐ जय एकादशी...॥

नाम षटतिला माघ मास में, कृष्णपक्ष आवै।
शुक्लपक्ष में जया, कहावै, विजय सदा पावै॥
ॐ जय एकादशी...॥

विजया फागुन कृष्णपक्ष में शुक्ला आमलकी।
पापमोचनी कृष्ण पक्ष में, चैत्र महाबलि की॥
ॐ जय एकादशी...॥

चैत्र शुक्ल में नाम कामदा, धन देने वाली।
नाम बरुथिनी कृष्णपक्ष में, वैसाख माह वाली॥
ॐ जय एकादशी...॥

शुक्ल पक्ष में होय मोहिनी अपरा ज्येष्ठ कृष्णपक्षी।
नाम निर्जला सब सुख करनी, शुक्लपक्ष रखी॥
ॐ जय एकादशी...॥

योगिनी नाम आषाढ में जानों, कृष्णपक्ष करनी।
देवशयनी नाम कहायो, शुक्लपक्ष धरनी॥
ॐ जय एकादशी...॥

कामिका श्रावण मास में आवै, कृष्णपक्ष कहिए।
श्रावण शुक्ला होय पवित्रा आनन्द से रहिए॥
ॐ जय एकादशी...॥

अजा भाद्रपद कृष्णपक्ष की, परिवर्तिनी शुक्ला।
इन्द्रा आश्चिन कृष्णपक्ष में, व्रत से भवसागर निकला॥
ॐ जय एकादशी...॥

पापांकुशा है शुक्ल पक्ष में, आप हरनहारी।
रमा मास कार्तिक में आवै, सुखदायक भारी॥
ॐ जय एकादशी...॥

देवोत्थानी शुक्लपक्ष की, दुखनाशक मैया।
पावन मास में करूं विनती पार करो नैया॥
ॐ जय एकादशी...॥

परमा कृष्णपक्ष में होती, जन मंगल करनी।
शुक्ल मास में होय पद्मिनी दुख दारिद्र हरनी॥
ॐ जय एकादशी...॥

जो कोई आरती एकादशी की, भक्ति सहित गावै।
जन गुरदिता स्वर्ग का वासा, निश्चय वह पावै॥

ॐ जय एकादशी...॥

आरती श्री जगदीशजी 

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी ! जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥
ॐ जय जगदीश हरे।

जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का।
स्वामी दुःख विनसे मन का।
सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥
ॐ जय जगदीश हरे।

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी।
स्वामी शरण गहूँ मैं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥
ॐ जय जगदीश हरे।

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी।
स्वामी तुम अन्तर्यामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥
ॐ जय जगदीश हरे।

तुम करुणा के सागर, तुम पालन-कर्ता।
स्वामी तुम पालन-कर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥
ॐ जय जगदीश हरे।

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
स्वामी सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति॥
ॐ जय जगदीश हरे।

दीनबन्धु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
स्वामी तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठा‌ओ, द्वार पड़ा तेरे॥
ॐ जय जगदीश हरे।

विषय-विकार मिटा‌ओ, पाप हरो देवा।
स्वमी पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ा‌ओ, सन्तन की सेवा॥
ॐ जय जगदीश हरे।

श्री जगदीशजी की आरती, जो कोई नर गावे।
स्वामी जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख संपत्ति पावे॥
ॐ जय जगदीश हरे।




भाद्रपद शुक्ल परिवर्तिनी एकादशी व्रत एकादशी की पौराणिक कथा 

युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवान! भाद्रपद शुक्ल एकादशी का क्या नाम है? इसकी विधि तथा इसका माहात्म्य कृपा करके कहिए। तब भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि इस पुण्य, स्वर्ग और मोक्ष को देने वाली तथा सब पापों का नाश करने वाली, उत्तम वामन एकादशी का माहात्म्य मैं तुमसे कहता हूं तुम ध्यानपूर्वक सुनो।

यह पद्मा/परिवर्तिनी एकादशी जयंती एकादशी भी कहलाती है। इसका यज्ञ करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। पापियों के पाप नाश करने के लिए इससे बढ़कर कोई उपाय नहीं। जो मनुष्य इस एकादशी के दिन मेरी (वामन रूप की) पूजा करता है, उससे तीनों लोक पूज्य होते हैं। अत: मोक्ष की इच्छा करने वाले मनुष्य इस व्रत को अवश्य करें।

जो कमलनयन भगवान का कमल से पूजन करते हैं, वे अवश्य भगवान के समीप जाते हैं। जिसने भाद्रपद शुक्ल एकादशी को व्रत और पूजन किया, उसने ब्रह्मा, विष्णु सहित तीनों लोकों का पूजन किया। अत: हरिवासर अर्थात एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए। इस दिन भगवान करवट लेते हैं, इसलिए इसको परिवर्तिनी एकादशी भी कहते हैं।

भगवान के वचन सुनकर युधिष्ठिर बोले कि भगवान! मुझे अतिसंदेह हो रहा है कि आप किस प्रकार सोते और करवट लेते हैं तथा किस तरह राजा बलि को बांधा और वामन रूप रखकर क्या-क्या लीलाएं कीं? चातुर्मास के व्रत की क्या ‍विधि है तथा आपके शयन करने पर मनुष्य का क्या कर्तव्य है। सो आप मुझसे विस्तार से बताइए।
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श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे राजन! अब आप सब पापों को नष्ट करने वाली कथा का श्रवण करें। त्रेतायुग में बलि नामक एक दैत्य था। वह मेरा परम भक्त था। विविध प्रकार के वेद सूक्तों से मेरा पूजन किया करता था और नित्य ही ब्राह्मणों का पूजन तथा यज्ञ के आयोजन करता था, लेकिन इंद्र से द्वेष के कारण उसने इंद्रलोक तथा सभी देवताओं को जीत लिया।

इस कारण सभी देवता एकत्र होकर सोच-विचारकर भगवान के पास गए। बृहस्पति सहित इंद्रादिक देवता प्रभु के निकट जाकर और नतमस्तक होकर वेद मंत्रों द्वारा भगवान का पूजन और स्तुति करने लगे। अत: मैंने वामन रूप धारण करके पांचवां अवतार लिया और फिर अत्यंत तेजस्वी रूप से राजा बलि को जीत लिया।


इतनी वार्ता सुनकर राजा युधिष्ठिर बोले कि हे जनार्दन! आपने वामन रूप धारण करके उस महाबली दैत्य को किस प्रकार जीता? 
श्रीकृष्ण कहने लगे- मैंने (वामन रूपधारी ब्रह्मचारी) बलि से तीन पग भूमि की याचना करते हुए कहा- ये मुझको तीन लोक के समान है और हे राजन यह तुमको अवश्य ही देनी होगी।

राजा बलि ने इसे तुच्छ याचना समझकर तीन पग भूमि का संकल्प मुझको दे दिया और मैंने अपने त्रिविक्रम रूप को बढ़ाकर यहां तक कि भूलोक में पद, भुवर्लोक में जंघा, स्वर्गलोक में कमर, मह:लोक में पेट, जनलोक में हृदय, यमलोक में कंठ की स्थापना कर सत्यलोक में मुख, उसके ऊपर मस्तक स्थापित किया।

सूर्य, चंद्रमा आदि सब ग्रह गण, योग, नक्षत्र, इंद्रादिक देवता और शेष आदि सब नागगणों ने विविध प्रकार से वेद सूक्तों से प्रार्थना की। तब मैंने राजा बलि का हाथ पकड़कर कहा कि हे राजन! एक पद से पृथ्वी, दूसरे से स्वर्गलोक पूर्ण हो गए। अब तीसरा पग कहां रखूं?

तब बलि ने अपना सिर झुका लिया और मैंने अपना पैर उसके मस्तक पर रख दिया जिससे मेरा वह भक्त पाताल को चला गया। फिर उसकी विनती और नम्रता को देखकर मैंने कहा कि हे बलि! मैं सदैव तुम्हारे निकट ही रहूंगा। विरोचन पुत्र बलि से कहने पर भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन बलि के आश्रम पर मेरी मूर्ति स्थापित हुई।

इसी प्रकार दूसरी क्षीरसागर में शेषनाग के पष्ठ पर हुई! हे राजन! इस एकादशी को भगवान शयन करते हुए करवट लेते हैं, इसलिए तीनों लोकों के स्वामी भगवान विष्णु का उस दिन पूजन करना चाहिए। इस दिन तांबा, चांदी, चावल और दही का दान करना उचित है। रात्रि को जागरण अवश्य करना चाहिए।

जो विधिपूर्वक इस एकादशी का व्रत करते हैं, वे सब पापों से मुक्त होकर स्वर्ग में जाकर चंद्रमा के समान प्रकाशित होते हैं और यश पाते हैं। जो पापनाशक इस कथा को पढ़ते या सुनते हैं, उनको हजार अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

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