Contact:9999782755/ 7678689062

PAY NOW

Acharya Mukesh

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌॥

Acharya Mukesh...Astro Nakshatra 27

“कुछ अलग करना है, तो भीड़ से हट कर चलो, भीड़ साहस तो देती है, पर पहचान छिन लेती है।”

True remedies by Dr.Mukesh

Contact e-mail: astronakshatra27@gmail.com

Contact e-mail: astronakshatra27@gmail.com

Kundli analysis, Vastu, Palmistry and effective Remedies.

Monday, 22 October 2018

क्या आपके पास भी पैसा नहीं टिकता ? करें इस दिवाली ये चमत्कारी उपाय ASTRO NAKSHATRA 27 : ACHARYA MUKESH



कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके पास कभी पैसा टिकता नहीं है। वे कितना भी कोशिश कर लें मगर पैसा आते ही चला जाता है। ऐसे लोगों के घरों में बरकत भी नहीं होती तथा वे हमेशा पैसों की तंगी में ही जीते हैं। अगर आपके साथ भी यही समस्या है तो इसका निदान मोती शंख से संभव है। 

ऐसा माना जाता है कि मोती शंख की पूजा की करने से धन में वृद्धि होती है। तंत्र शास्त्र के अनुसार मोती शंख एक विशेष प्रकार का शंख होता है, ये आम शंख से थोड़ा अलग दिखाई देता है और थोड़ा चमकीला भी होता है। इस शंख को विधि-विधान से पूजन कर यदि तिजोरी में रखा जाए तो घर, कार्यस्थल, व्यापार स्थल और भंडार में पैसा टिकने लगता है। आमदनी बढऩे लगती है। 

मोती शंख एक बहुत ही दुर्लभ प्रजाति का शंख माना जाता है। तंत्र शास्त्र के अनुसार यह शंख बहुत ही चमत्कारी होता है। दिखने में बहुत ही सुंदर होता है। मोती जैसी चमकीली आभा के कारण इसे मोती शंख कहते हैं।

जिस प्रकार पूजन शंख को विष्णु और दक्षिणावर्ती शंख को लक्ष्मी स्वरुप माना जाता है। उसी प्रकार मोती शंख को सौभाग्य लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है।

मोती शंख का प्रयोग इस प्रकार करें- 


प्रयोग- किसी बुधवार को सुबह स्नान कर साफ कपड़े में अपने सामने इस शंख को रखें और उस पर केसर से स्वस्तिक का चिह्न बना दें। इसके बाद नीचे लिखे मंत्र का जप करें :-


 श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मयै नम: - मंत्र का जप स्फटिक माला से ही करें।

मोती शंख को " दरिद्र-निवारक" कहा जाता है ! अतः यदि इस शंख को कारखाने में स्थापित किया जाए तो स्वतः ही उसकी दरिद्रता समाप्त हो जाती है तथा व्यापार में आशातीत वृद्धि होने लग जाती है * यदि मन्त्र सिद्ध प्राण-प्रतिष्ठित मोती-शंख अपने पूजा स्थान में स्थापित किया जाए तथा उसमें जल भरकर लक्ष्मी के चित्र पर चढाया जाए तो लक्ष्मी प्रसन्न होती है और आर्थिक उन्नति होना प्रारंभ हो जाती है !

                                       


विविध प्रयोग :

1. किसी शुभ नक्षत्र या दीपावली में मोती- शंख को घर में स्थापित कर दें , तथा नित्य " ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मये नमः " ११ बार बोलकर एक-एक चावल का दाना शंख में भरते रहें ! इस प्रकार १०८ दाने इस शंख में डालें और इस प्रकार ११ दिन तक प्रयोग करें ! यह प्रयोग इतना शक्ति-शाली है कि यदि इसे लगातार किया जाए तो व्यक्ति कि जन्म-जन्म कि दरिद्रता दूर हो जाती है !



2. कांच के एक कटोरे में लघु मोती शंख रख कर उसे अपने बिस्तर के नजदीक रखें। इससे कमरे के आस-पास की नकारात्मक ऊर्जा दूर होगी और पति-पत्नी में प्रेम बढ़ेगा।




3. मोती शंख में चावल भरकर मानसिक रोग से ग्रस्त व्यक्ति के सिर के ऊपर से सात बार उतार कर जल में प्रवाहित कर देने से उसे रोग से मुक्ति मिल सकती है।

                                         



4. मोती शंख को रात्रि में पानी से भरे किसी कांच के बर्तन में रखें। प्रातः उस पानी को पी लें। यह क्रिया रोज करें, चेहरे पर चमक व कांति आएगी और आंतों के रोग दूर होंगे। इसके अतिरिक्त इस शंख को रोज चेहरे पर हल्के-हल्के फेरें, चेहरा मोती की तरह चमकने लगेगा। यह क्रिया करने से लड़कियों के चेहरों पर पड़ने वाले दाग व मुंहासे शीघ्र दूर होने लगते हैं।



5. जिस फसल की पैदावार में वृद्धि की कामना हो, उसके कुछ बीज एक मोती शंख में डालकर अपने पूजा स्थल पर रखें, पैदावार भरपूर होगी।



6. यदि घर में कोई बहुत बीमार हो, तो मोती शंख में जल भर कर पूजा घर में रखें और दवाई का सेवन मोती शंख के जल से करवाएं। बीमार के स्वास्थ्य में सुधार आने लगेगा और वह शीघ्र ही पूरी तरह ठीक हो जाएगा।

7. गृह कलह नाश और घर में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाने के लिए इसे एक ताम्बे के पात्र में जल भरकर उसके बीचों बीच घर के ईशान कोण या ब्रह्मस्थल में स्थापित करे।

8. यदि गुरु पुष्य योग में मोती शंख को कारखाने में स्थापित किया जाए तो कारखाने में तेजी से आर्थिक उन्नति होती है।

9. मोती शंख में जल भरकर लक्ष्मी के चित्र के साथ रखा जाए तो लक्ष्मी प्रसन्न होती है।

10. अक्षय तृतीया पर एक लाल कपड़े में मोती शंख , गोमती चक्र, लघु नारियल, पीली कौड़ी और चाँदी के सिक्के का माँ लक्ष्मी के सामने पूजन कर 21 पाठ श्री सूक्त का करे और पोटली बना कर मन्दिर में स्थापित कर दें। पोटली खोले बिना नित्य ऊपर से ही धूप दीप करें। थोड़े ही दिनों में आर्थिक समस्या समाप्त होने लगेगी।

11.यदि व्यापार में घाटा हो रहा है तो एक मोती शंख धन स्थान पर रखने से व्यापार में वृद्धि होती है।

12. रात्रि में इसमें जल भरकर रख दें और सुबह उससे चेहरे पर मसाज करने से चेहरे के दाग धब्बे खत्म हो जाते हैं और चेहरा कांतियुक्त हो जाता है।



13.देशी चिकित्सा पद्धति में इससे नाद करने से फेफड़े और हृदय रोग में लाभ होना बताया गया है।

14. अन्न-भण्डार में स्थापित करने पर वो सदैव परिपूर्ण रहता है।

15.रोगी व्यक्ति को इसमें रखा जल पिलाने से वो शीघ्र स्वास्थ्य लाभ करता है।

अन्य किसी जानकारी, समस्या समाधान, कुंडली विश्लेषण हेतु सम्पर्क कर सकते हैं।

Acharya Mukesh   M -7678689062  Mail:  astronakshatra27@gmail.com

                                                             ।।जय श्री राम।।
                           


Thursday, 18 October 2018

Wishing you a very Happy Durga Puja (AN27 Team)


Wednesday, 17 October 2018

माता का प्रसाद खेत्री : जानें सही उपयोग और माता के संकेतों को



हमारे सनातन धर्म के किसी भी प्रक्रिया के साथ  कोई न कोई वैज्ञानिक कारण जुड़ा होता है ! बात करतें हैं माता की खेत्री की जो नवरात्रे में हर घर में बोई जाती है ! लेकिन बहुत कम ही लोग इसका सही उपयोग जानते हैं, ज्यादातर लोग इसे हवन के बाद विसर्जित कर देते हैं !

आइये जानें क्या है इसका सही उपयोग: 

१. कुछ ज्वारे माता के चरणों में  अर्पित करने   के बाद  आशीर्वाद रूप में सभी के मस्तक पे लगाएं तथा कुछ अपनी तिजोरी,पर्श,गल्ले इत्यादि में भी रखें !


२. हवन एवं पूजा के बाद ज्वार का रस निकाल कर घर के सदस्यों के बीच प्रसाद के रूप में वितरित कर देना चाहिए! इसका रस हमारे शरीर को डिटॉक्सिफाई तो करता ही है साथ में इसे प्रसाद रूप में पीने से माता की असीम शक्ति भी मिलती है और हमारे शरीर में उपस्थित नकरात्मक ऊर्जा को खत्म करने की ताकत भी रखती है ! अगर आपके घर में ज्यादा ज्वारे न भी निकली हो तो निराश न हों , उसे शुद्ध जल में मिला कर पीस लें और उसका रस सभी परिवारजनों में वितरित  कर दें !




* नवरात्र के प्रथम दिन कलश की स्थापना की जाती है। कलश पूजन के बाद उसके नीचे खेत्री बोई जाती है। वैसे तो 2 या 3 दिन में ही जौ से अंकुर निकल आते हैं लेकिन खेत्री देर से निकले तो इसका अर्थ होता है कि देवी संकेत दे रही है कि आने वाले वर्ष में अधिक मेहनत करनी पड़ेगी। मेहनत करने पर उसका फल देर से प्राप्त होगा।


* खेत्री का रंग नीचे से पीला अौर ऊपर से हरा हो तो इसका अर्थ होता है कि वर्ष के 6 महीने व्यक्ति के लिए ठीक नहीं है परंतु बाद में सब कुशल मंगल होगा।


* खेत्री का रंग नीचे से हरा अौर ऊपर से पीला होने पर संकेत होता है कि वर्ष की शुरुआत अच्छी होगी लेकिन बाद में उलझन अौर परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।


* खेत्री का श्वेत या हरे रंग में उगना बहुत ही शुभ संकेत होता है। ऐसा होने पर माना जाता है कि पूजा सफल हो गई है। आने वाला पूरा वर्ष खुशहाल अौर सुख-समृद्धि वाला होगा।




संकट से मुक्ति के उपाय

* खेत्री के अशुभ संकेत होने पर मां दुर्गा से कष्टों को दूर करने के लिए प्रार्थना करें अौर दसवीं तिथि को नवग्रह के नाम से 108 बार हवन में आहुती दें। उसके पश्चात मां के बीज मंत्र 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमः स्वाहाका 1008 बार जाप करते हुए हवन करें। हवन के बाद मां की आरती करें अौर हवन की भभूत से प्रतिदिन तिलक करें।


* रोग की भविष्यवाणी होने पर प्रतिदिन नीचे लिखे मंत्र का जप करें।

"रोगान शेषान पहंसि तुष्‍टा रूष्‍टा तु कामान्‍सकलान भीष्‍टान्॥
   त्‍वामाश्रितानां न विपन्‍नराणां त्‍वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयांति॥ 

यदि इन सबके के लिए समय न हो तो नित्य कवच, कीलक, अर्गला और सिद्कुंजिका स्तोत्र का पाठ करने से भी नवग्रहों की कृपा बनी रहती है अौर व्यक्ति को कष्टों से मुक्ति मिलती है।

ASTRO NAKSHATRA 27
ACHARYA MUKESH

नवरात्री-हवन घर में स्वयं करें : सरलतम विधि

                             

नवरात्री-हवन 

नारदपुराण के अनुसार नवरात्र में मां दुर्गा की पूजा हवन के बिना अधुरी मानी जाती है। आज  विधि की जानकारी के अभाव  में अक्सर लोग मंत्रों के बिना ही यह हवन करते हैं।

अब बात करते हैं दैनिक हवन विधि का जिसका उपयोग आप नवरात्रों के दौरान स्वयं भी कर सकते हैं। सबसे पहले मां दुर्गा की पूजा के बाद एक पात्र (कड़ाही या मिट्टी के बर्तन) में अग्नि स्थापना करें। उसमें आम की लकड़ी व कपूर रखकर जला दें।

फिर पूरब दिशा की ओर मुंह करके बैठ जाये ! शुभ कार्यों के लिए हमारे हिंदू धर्म में पूर्व दिशा और उत्तर दिशा को शुभ माना गया है ! हवन करने के लिए हमें पूर्व दिशा या उत्तर दिशा की ओर मुंह कर बैठ जाना होगा !

ओं भूर्भुव: स्वः ।।

इस मंत्र का उच्चारण करके अग्नि जला अगले मंत्र से आह्वाहन करे। वह मंत्र यह है-

ओं भूर्भुवः स्वर्धौरिव भूम्ना पृथिवीव वरिम्णा ।
तस्यास्ते पृथिवी देवयजनि पृष्ठेऽग्निमन्नादमन्नाधायादधे ।।

ओम् उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टापूर्ते संसृजेथामयं च ।
आस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन् विश्वे देवा यजमानश्च सीदत ।।

इस मंत्र से जब अग्नि समिधाओं में प्रविष्ट होने लगे तब तीन लकड़ी आठ-आठ अंगुल की घृत में डूबो उनमें से नीचे लिखे एक-एक मंत्र से एक-एक समिधा को अग्नि में चढ़ावें। वे मंत्र ये हैं -

इस मंत्र से एक समिधा अग्नि में चढ़ाएं :-


ओम् अयं त इध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वर्धस्व चेद्ध वर्धय चास्मान् प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन समेधय स्वाहा ।

इदमग्नये जातवेदसे-इदं न मम् ।

इससे और अगले अर्थात् दोनों मन्त्रों से दूसरी समिधा अग्नि में चढ़ावें :-

ओं समिधाग्निं दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथिम् ।
आस्मिन् हव्या जुहोतन, स्वाहा ।।

इस मंत्र से तीसरी समिधा अग्नि में चढ़ावें :-

ओं तं त्वां समिदि्भरड़ि्गरो घृतेन वर्द्धयामसि ।
बृहच्छोचा यविष्ठय स्वाहा ।। 


इदमग्नयेऽड़ि्रसे-इदन्न मम ।।


जलप्रोक्षण-मन्त्र

ओम् आदितेऽनुमन्यस्व । इससे पूर्व दिशा में
ओम् अनुमतेऽनुमन्यस्व । इससे पश्चिम दिशा मे
ओं सरस्त्वयनुमन्यस्व । इससे उत्तर दिशा मे जल छिड़कें ।
 तत्पश्चात अंजलि में जल लेके वेदी के पूर्व दिशा आदि चारों ओर छिड़कें ।


इसके मंत्र है :-

ओं देव सवित: प्रसुव यज्ञं प्रसुव यज्ञोपतिं भगाय ।
दिव्यो गन्धर्व: केतपू: केतं न: पुनातु वाचस्पतिर्वाचं न: स्वदतु ।।





शुद्ध देशी घी का प्रयोग करें। उसके बाद निम्न मंत्रों से हवन शुरू करें:

   ऊं आग्नेय नम: स्वाहा (ओम अग्निदेव ताम्योनम: स्वाहा),

ऊं गणेशाय नम: स्वाहा 11 आहुति


ऊं गौरियाय नम: स्वाहा, 

ऊं वरुणाय नम: स्वाहा, 

ऊं सूर्यादि नवग्रहाय नम: स्वाहा, 

ऊं दुर्गाय नम: स्वाहा, 

ऊं महाकालिकाय नम: स्वाहा


ऊं हनुमते नम: स्वाहा, 



ऊं भैरवाय नम: स्वाहा, 



ऊं कुल देवताय नम: स्वाहा, 



ऊं स्थान देवताय नम: स्वाहा 


ऊं ब्रह्माय नम: स्वाहा, 



ऊं विष्णुवे नम: स्वाहा, 


ऊं शिवाय नम: स्वाहा

  सप्तशती  पूर्णाहुति  हवन के लिए अर्गला स्त्रोत्र में जो मंत्र आये हैं उनसे हवन करें :

(हवन-सामग्री: काली तिल,शहद,अनार के दाने और घी को  खीर में मिला लें और इसी से हवन करें)






ॐ नमश्‍चण्डिकायै॥  स्वाहा:

मार्कण्डेय उवाच  स्वाहा:

ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥१॥ स्वाहा:

जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि।
जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते॥२॥ स्वाहा:

मधुकैटभविद्राविविधातृवरदे नमः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥३॥ स्वाहा:

महिषासुरनिर्णाशि भक्तानां सुखदे नमः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥४॥ स्वाहा:

रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥५॥ स्वाहा:

शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥६॥ स्वाहा:

वन्दिताङ्‌घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥७॥ स्वाहा:

अचिन्त्यरुपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥८॥ स्वाहा:

नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥९॥ स्वाहा:

स्तुवद्‌भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१०॥ स्वाहा:

चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह भक्तितः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥११॥ स्वाहा:

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१२॥ स्वाहा:

विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१३॥ स्वाहा:

विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१४॥ स्वाहा:

सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१५॥ स्वाहा:

विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१६॥ स्वाहा:

प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१७॥ स्वाहा:

चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंस्तुते परमेश्‍वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१८॥ स्वाहा:

कृष्णेन संस्तुते देवि शश्‍वद्भक्त्या सदाम्बिके।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१९॥ स्वाहा:

हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्‍वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥२०॥ स्वाहा:

इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्‍वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥२१॥ स्वाहा:

देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥२२॥ स्वाहा:

देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥२३॥ स्वाहा:

पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्॥२४॥ स्वाहा:

इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः।
स तु सप्तशतीसंख्यावरमाप्नोति सम्पदाम्॥२५॥ स्वाहा:

सप्तशती के साथ यदि आपने गायत्री-मंत्र का जाप भी किया है तो जाप संख्या के दशांश का हवन गायत्री-मंत्र के साथ स्वाहा  लगाकर करें !  


‘ऊँ भूर्भव स्व: तत्सवितुर्वरेण्यम् भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात।’ स्वाहा :

इदं  गायत्री इदं  न मम् !!


अब सुखद स्वास्थ्य हेतु महामृत्युंजय-मंत्र से ५ आहुति  डालें :



ॐ त्र्यम्बक यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धन्म। उर्वारुकमिव बन्धनामृत्येर्मुक्षीय मामृतात् !! स्वाहा :



इदं महामृत्युंजाये  इदं  न मम्  

अंत में :  

                      ॐ ऐं ह्लीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमः 11 आहुति



ऊं जयंती मंगलाकाली भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा शिवाधात्री स्वाहा, स्वधा नमस्तुति स्वाहा:, 



ओम ब्रह्मामुरारी त्रिपुरांतकारी भानु: क्षादी: भूमि सुतो बुधश्च: गुरुश्च शक्रे शनि राहु केतो सर्वे ग्रहा शांति कर: स्वाहा:,



ओम गुर्रु ब्रह्मा, गुर्रु विष्णु, गुर्रु देवा महेश्वर: गुरु साक्षात परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नम: स्वाहा !



उपरोक्त मंत्रो का जप करने के बाद नारियल में हवन की बची  सामग्री डाल ,कलावा बांधकर उसे अग्नि में समर्पित कर दें, इस विधि को वोलि कहते हैं। फिर पूर्ण आहूति के रूप में नारियल, घी, लाल धागा, पान, सुपारी, लौंग, जायफल आदि स्वाहा करें।

स्विष्टकृतहोम:- चमच्च में मीठा और घी लेकर अग्निदेव को अर्पित करें।



पूर्णाहुति मंत्र: गड़ी गोला काट कर उसमें बची हवन सामग्री,घी, पान पत्ता , सुपारी इत्यादि डाल ये मंत्र बोलते हुए अर्पित करें:-


वसोरधारा:-
इस मंत्र से घी नीचे से ऊपर धार बनाते हुए गोले पर डाल दें:-




अब अंत में पानी की सहायता से आचमनी  करेंगे ! जो कि कम से कम तीन बार होनी चाहिए ! आचमनी करने के लिए पानी को आम के पत्ते से लेकर तीन बार हवन के ऊपर से घुमा कर बगल में गिरा देंगे. यह प्रक्रिया तीन बार करेंगे उसके बाद हमारी हवन की प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है. इसके बाद हम माताजी की आरती कर सकते हैं और हमारा पूजन विधि पूर्वक संपन्न हो जाता है !

वैसे तो हवन की विधि बहुत ही विस्तृत होती है परन्तु मैंने इसे आपकी सुविधा हेतु काफी सरल कर दिया  है पर आपसे निवेदन है की इससे कम करने पर कहीं न कहीं कुछ कमी रह जाएगी इसलिए मैंने जितना लिखा है उतना तो अवश्य ही करें ! मैंने उतना ही लिखा है जो बिलकुल नहीं छोड़ा जा सकता ! आपने पूजा काफी मेहनत से की है तो बस पूर्णाहुति भी बड़े प्यार से करें !

इसके अतिरिक्त  आप इस प्रयोग को भी इस हवन प्रक्रिया में जोड़ सकते हैं :-

दरिद्रता नाश एवं अकूट लक्ष्मी की प्राप्ति हेतु आप श्री सूक्त  के सोलह ऋचाओं का कमलगट्टे से भी हवन  कर सकते हैं ( यह एक वैकल्पिक प्रयोग है, यदि समय हो तो नवमी के दिन इसे करनेवाला कभी भी आर्थिक संकट में नहीं सकता ! यह आचार्य मुकेश के द्वारा सफलतापूर्वक किये गए शोध के सकरात्मक परिणाम पर आधारित है )यह आप अर्गला-मंत्र आहूति बाद कर सकते हैं, क्योंकि माता दुर्गा साक्षात् महालक्ष्मि  ही हैं ! इस प्रयोग को लगातार हर महीने शुक्ल पंचमी को करने पर भिखारी भी धनवान बन सकता है ! कमलगट्टे को घी में डुबो कर हर श्लोक के साथ स्वाहा बोल आहुति दें।

ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं, सुवर्णरजतस्त्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आ वह।।१।। स्वाहा:

तां म आ वह जातवेदो, लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं, गामश्वं पुरूषानहम्।।२।। स्वाहा:

अश्वपूर्वां रथमध्यां, हस्तिनादप्रमोदिनीम्।
श्रियं देवीमुप ह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम्।।३।। स्वाहा:

कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहोप ह्वये श्रियम्।।४।। स्वाहा:

चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम्।
तां पद्मिनीमीं शरणं प्र पद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे।।५।। स्वाहा:

आदित्यवर्णे तपसोऽधि जातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽक्ष बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु या अन्तरा याश्च बाह्या अलक्ष्मीः।।६।। स्वाहा:

उपैतु मां दैवसखः, कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्, कीर्तिमृद्धिं ददातु मे।।७।। स्वाहा:

क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्।
अभूतिमसमृद्धिं च, सर्वां निर्णुद मे गृहात्।।८।। स्वाहा:

गन्धद्वारां दुराधर्षां, नित्यपुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरीं सर्वभूतानां, तामिहोप ह्वये श्रियम्।।९।। स्वाहा:

मनसः काममाकूतिं, वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रूपमन्नस्य, मयि श्रीः श्रयतां यशः।।१०।। स्वाहा:

कर्दमेन प्रजा भूता मयि सम्भव कर्दम।
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम्।।११।। स्वाहा:

आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे।
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले।।१२।। स्वाहा:

आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिंगलां पद्ममालिनीम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आ वह।।१३।। स्वाहा:

आर्द्रां य करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह।।१४।। स्वाहा:

तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम्।।१५।। स्वाहा:

य: शुचि: प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम्।
सूक्तं पंचदशर्चं च श्रीकाम: सततं जपेत्।।१६।। स्वाहा:


अग्नि में जो भी वस्तु डाली जाती है, उसे वह अपने पास नहीं रखती, वरन् उसे सूक्ष्म बनाकर वायु को, देवताओं को, बाँट देती है। हमें जो वस्तुएँ ईश्वर की ओर से, संसार की ओर से मिलती हैं, उन्हें केवल उतनी ही मात्रा में ग्रहण करें, जितने से जीवन रूपी अग्नि को ईंधन प्राप्त होता रहे। शेष का परिग्रह, संचय या स्वामित्व का लोभ न करके उसे लोक-हित के लिए ही अर्पित करते रहें।


आचार्य मुकेश 
ऐस्ट्रो नक्षत्र २७ से 

Tuesday, 16 October 2018

धन प्राप्ति हेतु सरल उपाय :अष्टमी को माता की करें गोद भराई

धन प्राप्ति हेतु सरल उपाय :अष्टमी को माता की करें गोद भराई


 सामग्री : पीला कपडा - १.२५ मीटर ,
 पान के पत्ते - ९,
 सुपारी-९,
  द्रव्य -९,
 दुर्बा,
 हल्दी की गांठ -९,
 बताशे - ९ 




 अब घर की सुहागिन स्त्री चौके पर पीला कपडा बिछा कर उसमे 9 माता के नाम से 9 पान के पत्ते रखे ! 


फिर बारी-बारी से  9 माता के नाम से इन 9 पत्तों पर दोनों हाथों से अक्षत अर्पित करें ! अर्पित करते समय सभी माता के नाम भी बोलते जाएँ जैसे : जय माता शैलपुत्री, जय माता ब्रह्मचारिणी, जय माता चंद्रघंटा इत्यादि !


फिर बारी-बारी से द्रव्य यानि सिक्के, दुर्बा, हल्दी की गांठ, सुपारी और बताशे अर्पित करें ! 


फिर माता से मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना करते हुए गोद में रखे इन सामग्रियों को उसी पीले कपडे में मोड़ कर 2 गांठ लगा वहीँ गोद में ही रख दें तत्पश्चात माता का श्रृंगार करें ! काजल,इत्र,सिन्दूर तथा भांति-भांति के श्रृंगार और वस्त्र अर्पित कर के पूजा प्रारम्भ करें ! 



Monday, 15 October 2018

नवरात्री सप्तमी "माता कालरात्रि" करेंगी "शनि" के अशुभ प्रभावों को नष्ट




माँ कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक है, लेकिन ये सदैव शुभ फल ही देने वाली हैं। इसी कारण इनका एक नाम 'शुभंकारी' भी है। अतः इनसे भक्तों को किसी प्रकार भी भयभीत अथवा आतंकित होने की आवश्यकता नहीं है।

माँ कालरात्रि दुष्टों का विनाश करने वाली हैं। दानव, दैत्य, राक्षस, भूत, प्रेत आदि इनके स्मरण मात्र से ही भयभीत होकर भाग जाते हैं। ये ग्रह-बाधाओं को भी दूर करने वाली हैं। इनके उपासकों को अग्नि-भय, जल-भय, जंतु-भय, शत्रु-भय, रात्रि-भय आदि कभी नहीं होते। इनकी कृपा से वह सर्वथा भय-मुक्त हो जाता है।

माँ कालरात्रि के स्वरूप-विग्रह को अपने हृदय में अवस्थित करके मनुष्य को एकनिष्ठ भाव से उपासना करनी चाहिए। यम, नियम, संयम का उसे पूर्ण पालन करना चाहिए। मन, वचन, काया की पवित्रता रखनी चाहिए। वे शुभंकारी देवी हैं। उनकी उपासना से होने वाले शुभों की गणना नहीं की जा सकती। हमें निरंतर उनका स्मरण, ध्यान और पूजा करना चाहिए।

माता कालरात्रि का संबंध शनि ग्रह से है। जिन व्यक्तियों की कुंडली में शनि नीच, या राहु के साथ युतिगत हो पितृ दोष बना रहा हो या पीड़ित हो तो कालरात्रि की साधना से ये दोष कम होते जाते हैं। आलस्य में कमी आती है।कर्म भाव मजबूत होता है , आय बढ़ती है तथा शत्रुओं का नाश होता है।

अंधकारमय स्थितियों का विनाश करने वाली और काल से भी रक्षा करने मां कालरात्रि और शनिदेव का गहरा संबंध है। शनिदेव का रंग काला है और मां कालरात्रि का स्वरूप भी काले रंग का है। मां कालरात्रि असुरों का विनाश करने वाली है तथा शनिदेव भी दुष्टों व अत्याचारियों को दण्ड देने के लिए जाने जाते हैं। सप्तमी तिथि के स्वामी सूर्य भगवान हैं और शनिदेव के पिता भी सूर्य देव हैं। अतः मां कालरात्रि एंव शनि देव का आपस में भाई-बहन का रिश्ता हुआ।  जानते हैं इस शुभ संयोग में कैसे करें मां कालरात्रि का पूजन जिससे शनिदेव की कृपा भी बनी रहे।


ऐसे करें पूजा-पाठ :
1- सप्तमी के दिन मां कालरात्रि गुड़ अर्पित करें और गुड़ को प्रसाद रूप में गरीबों को वितरित करें जिससे शनि देव का कुप्रभाव नष्ट होगा।


 2- इस मन्त्र ‘‘या देवी सर्वभूतेषु मां कालरात्रि रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो मनः'' का जाप करने मात्र से ही शनि देव बुरा असर समाप्त हो जायेगा। 

3- दुर्गा सप्तमी के दिन मां कालरात्रि को दूध में शहद मिलाकर भोग लगाने से शनिदेव बुरा प्रभाव शान्त होता है।

4- आज के दिन शप्तशती का विधिवत पाठ करने से शनि की साढ़ेसाती व ढैय्या का प्रभाव भी कम हो जाता है।


5- दुर्गा सप्तमी के दिन नावार्ण मन्त्र- "ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै" की कम से कम 9 माला जाप करने से शनि देव का बुरा असर कम होने लगता है।







नवरात्रि की सप्तमी के दिन माँ कालरात्रि की आराधना का विधान है। इनकी पूजा-अर्चना करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है व दुश्मनों का नाश होता है, तेज बढ़ता है। प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में सातवें दिन इसका जाप करना चाहिए।

                                                 मंत्र



या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता। 
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और कालरात्रि के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे पाप से मुक्ति प्रदान कर।

                 ॐ ऐं ह्रीं क्रीं कालरात्रै नमः |

देवी कालरात्रि के मंत्र

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

एक वेधी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकणी तैलाभ्यक्तशरीरिणी।।

वामपदोल्लसल्लोहलताकण्टक भूषणा।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी।।

देवी कालरात्रि के स्तोत्र पाठ
हीं कालरात्रि श्री कराली च क्लीं कल्याणी कलावती।
कालमाता कलिदर्पध्नी कमदीश कुपान्विता॥

कामबीजजपान्दा कमबीजस्वरूपिणी।
कुमतिघ्नी कुलीनर्तिनाशिनी कुल कामिनी॥

क्लीं हीं श्रीं मन्त्र्वर्णेन कालकण्टकघातिनी।
कृपामयी कृपाधारा कृपापारा कृपागमा॥

देवी कालरात्रि के कवच

ऊँ क्लीं मे हृदयं पातु पादौ श्रीकालरात्रि।
ललाटे सततं पातु तुष्टग्रह निवारिणी॥


0टिप्पणियांरसनां पातु कौमारी, भैरवी चक्षुषोर्भम।
कटौ पृष्ठे महेशानी, कर्णोशंकरभामिनी॥

वर्जितानी तु स्थानाभि यानि च कवचेन हि।
तानि सर्वाणि मे देवीसततंपातु स्तम्भिनी॥

आचार्य मुकेश

________________________________________

Sunday, 14 October 2018

GAYATRI MANTRA

astro nakshatra 27

Sanskrit transcript:
ॐ भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्॥

Transliteration:
oṃ bhūrbhuvaḥ svaḥ। tatsaviturvareṇyaṃ bhargo devasya dhīmahi।
dhiyo yo naḥ pracodayāt॥

Hindi Translation:

ॐ हम उस दिव्य सूरज का ध्यान करतें हैं, जो सभी को प्रकाशित करता है, जिनसे सभी आगे बढ़ते हैं। हे प्रभु, क्रिपा करके हमारी बुद्धि को उजाला प्रदान कीजिये और हमें धर्म का सही रास्ता दिखाईये।

English translation:


We meditate on the glory of that being (Savitur, the sun) who has produced this universe, who is the essence of our life existence; May we imbibe his divinity and brilliance within us.

The purpose of Gayatri mantra is to offer prayers to the sun god, Savitur. The god which has given us everything, which has made life possible on this planet, which grants us light and energy. The sun which always gives and never asks for anything in return, the Gayatri mantra is a way of giving back in the form of prayer and respect to that ever-giving entity. This mantra invokes a sense of inclusiveness; imagine you offering respects to the sun on behalf of all the beings in this world, wouldn’t that make you think much larger than just yourself? The correct mindset that we all need when we begin our day.

Why Gayatri Mantra is so popular?


Gayatri Mantra is from one of the oldest texts ‘Rig Veda’, composed by Sage Vishwamitra. It is a popular belief that Vishwamitra after long practice and penance discovered Gayatri mantra which according to him was not just a boon for himself but for the entire mankind. Upon chanting this mantra, the chanter and the listener both are most benefited with the vibrational positive energy of the mantra. And the fact that many practitioners have found Gayatri mantra so enriching, it has become popular over the centuries.

The Analysis (Dissection) of the Gayatri Mantra:


ॐ (OM): The primeval sound
भूः (Bhur): Earth = Mooladhara;  the physical body/physical realm
भुवः (Bhuvah): Akash; the life force/the mental realm
स्वः (Swah): Heaven= Swadhishthana; the soul/spiritual realm
महः (Maha): Heart region.
जनः (Jana): To say ‘no’ for life and death.
तपः (Tapa): Ascetic practices in vishuddhi & Agnya.
सत्यम् (Satyam): Up to the Third Eye ( Brahma-Randhra ).
तत् (Tat): That – situated as it is; That (God)
सवितुर् (Savitur/Savita): Sa + Va + Ta = Sun, Ganges, Fire, Earth etc. including those endowed with knowledge and yoga.
र्वरेण्यं (Vareñyam): Va + Re + N + Ya + M : God Varuna; adore
भर्गो (Bhargo): Bha + Ra + Ga; effulgence (divine light)
देवस्य (Devasya): Da + Va + S + Ya; Supreme Lord
धीमहि (Dhīmahi): Dha + Ma + Ha; meditate
धियो (Dhiyo/Dhiya): Dha + Ya; the intellect
यो नः (Yo Nah): Ya + Na; May this light, Nah: Our
प्रचोदयात् (Prachodayāt): Pa + Ra + Cha + Da + Ya + T; illumine/inspire

When to chant the Gayatri Mantra?

It is advised to repeat Shanti (peace) thrice at the end of the chanting of the Mantra, which will give peace to three entities – body, mind, and soul. During the three positions of sun namely lower sky in the east (morning), mid sky (noon) and lower sky in the evening (dusk), are the best times to chant Gayatri Mantra.
Therefore, the day is divided into three parts:
  • 4 am to 8 am and 4 pm to 8 pm have the Sātvic quality
  • 8 am to 4 pm are Rājasic
  • 8 pm and 4 am are Tāmasic